<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814</id><updated>2012-01-29T23:42:07.585+05:30</updated><title type='text'>क़िस्सागोई...</title><subtitle type='html'>कहानी अपनी-अपनी.....</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>136</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-4797412530793219151</id><published>2010-11-13T01:53:00.005+05:30</published><updated>2010-11-13T02:00:52.203+05:30</updated><title type='text'>काबुल वाया नई दिल्ली</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5538761687148284994" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 214px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/TN2iaKoETEI/AAAAAAAAB8E/UuTJrlafz28/s320/106626022a.jpg" border="0" /&gt;बराक ओबामा जा चुके हैं। जाते-जाते वो हमारी कानों को वो बातें सुना गए जिसे सुनने के लिए हम कब से व्याकुल थे। लेकिन शोर-शराबा खत्म होने के बाद अब वक्त आ गया है जब हम गिफ्ट बॉक्स को खोलें और देखें कि दिया गया आश्वासन हमारे कितने काम का है। सबसे पहले बात सुरक्षा परिषद में भारत के स्थाई सदस्यता की, ओबामा और उनके सलाहकार जानते है कि भारत के लिए स्थाई सीट का रास्ता काफी लंबा और मुश्किल भरा है। सिर्फ अमरीका के समर्थन से कुछ नहीं होगा। मान लीजिए चीन तैयार भी हो जाता है लेकिन जापान, जर्मनी, दक्षिण अफ्रिका और ब्राजील का क्या होगा जिनका दावा भारत से कम मजबूत तो नहीं ही है। ये देश भारत को रोकने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं बशर्ते इन्हें भी स्थाई सीट दे दी जाए।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अगर अमरीका, भारत से रिश्तों के प्रति सचमुच गंभीर है तो उसे हमारे अफगनिस्तान संबंधित चिंताओं पर ज्याद गौर करना चाहिए था। भारतीय सांसदों को संबोधित करते हुए अगर ओबामा कहते कि "अब से वाशिंगटन अपनी अफगानिस्तान संबंधित निति और फ़ैसलों में भारत को पाकिस्तान से कम तव्वजो नहीं देगा", तो ये बात सुरक्षा परिषद के लॉलीपाप से बेहतर और ज्यादा मुक्कमल होता। अफगानिस्तान से हमारा रिश्ता पाकिस्तान से कहीं कमतर नहीं रहा है। ऑपरेशन इनड्युरिंग फ्रिडम के शुरुआत से ही भारत करजई सरकार को हर तरह से मदद देती आ रही है। वो चाहे अफगानिस्तान को फिर से खड़ा करने के लिए बुनियादी जरूरतों का सामान हो, या फिर पेट भरने के लिए खाना। भारत हर संभव वहां के नागरिकों को मदद देता रहा है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अमरीका, अफगानिस्तान में तालिबान से युद्ध लड़ रहा है। और इस लड़ाई को जीतने के लिए वो सिर्फ़ और सिर्फ़ पाकिस्तान पर निर्भर है। अमरीकी ड्रोन से मारे गए हर एक तलिबानी का जगह लेने के लिए अल-कायदा और जवाहरी जैसे आतंकी संगठन भष्मासुर की तरह सैकड़ों लड़ाकों को खड़ा कर देता है। अमरीका, अफगानिस्तान में बुरी तरह फंस चुका है और इस लड़ाई का अंत दूर-दूर तक नहीं दिख रहा है। वह यह भी जानता है कि आतंकी संगठनों का मुख्यालय पाकिस्तान सीमा के अंदर फाटा क्षेत्र में है, जहां से इनके आका इन्हें संचालित कर रहे हैं। इन आतंकी संगठनों को आईएसआई से मिल रहे खुले समर्थन की बात भी अमरीका से छिपी नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;पाकिस्तान का यह दोहरा खेल तब तक चलेगा जब तक उसे लगता रहेगा कि अमरीका के पास पाकिस्तान के साथ और उसकी शर्तों पर काम करने के अलावा कोई विक्लप नहीं है। जरदारी सरकार, ख़ासकर पाकिस्तानी सेना को जिस दिन अंदाजा लग जाएगा कि अमरीका पाकिस्तान के बिना भी अफगानिस्तान में ज़ंग जीत सकता है उसी दिन आईएसएआई पर लगाम लग जाएगी और अमरीका के लिए अफगानिस्तान में रास्ता आसान हो जाएग। भारत अमरीका के लिए यहां अच्छा विकल्प मुहैया कराता है। अमरीका को भारत के साथ-साथ रूस से भी बात करनी चाहिए। भारत और रूस को साथ लेकर अमरीका निश्चित रूप से यह जंग जीत सकता है। मुझे नहीं लगता कि मौजूदा परिस्थियों में रूस अमरीका का साथ देने को तैयार नहीं होगा।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;कुछ विशेषज्ञ की राय हो सकती है कि इसके बाद पाकिस्तान अमरीकी ड्रोन को पाकिस्तान के अंदर घुस कर अतंकी ठिकनों का सफाया करने से रोक सकता है और यहां तक कि खुल कर तालिबान के समर्थन में आ सकता है। जब पाकिस्तान तालिबान द्वारा इस्तेमाल की जा रही पुरानी तकनीक को मुकाबला नहीं कर सकती, तब ड्रोन की उन्नत तकनीक से मुकाबला पाकिस्तान के बस की बात नहीं है। जहां तक तलिबान के समर्थन में खुल कर आने की बात है, पाकिस्तान को इसके खतरे का पूरा एहसास है । अभी कुछ महीनों पहले ही तालिबान राजधानी इस्लामाबाद से मात्र 60 किलोमीटर दूर बुनेर तक आ पहुंची थी। पाकिस्तान के पसीने छूटने लगे थे, और इस घटना की याद अभी तक वहां के हुक्मरानों को होगी।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में ओबामा प्रशासन अगर भारत से रिश्तों के प्रति सचमुच गंभीर है तो दिसंबर में होने वाली अपनी अफगानिस्तान समीक्षा बैठक में भारत की अफगानिस्तान में रोल पर फिर से गौर करेगी। अगर इस समीक्षा बैठक में अमरीका पाकिस्तान को साफ-साफ संदेश देने में सफ़ल हो जाती है तो अफगनिस्तान में उसके लिए चीजें काफी आसान हो सकती है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-4797412530793219151?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/4797412530793219151/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=4797412530793219151&amp;isPopup=true' title='18 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/4797412530793219151'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/4797412530793219151'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='काबुल वाया नई दिल्ली'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/TN2iaKoETEI/AAAAAAAAB8E/UuTJrlafz28/s72-c/106626022a.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-4372643968441951976</id><published>2010-10-24T23:35:00.001+05:30</published><updated>2010-10-24T23:39:15.633+05:30</updated><title type='text'>मैं भी ओलंपिक की बात क्यों करने लगा हूं....</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/TMR1x9QDFuI/AAAAAAAAB70/QRcLCB51orc/s1600/kalmadi.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5531675743433725666" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 290px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/TMR1x9QDFuI/AAAAAAAAB70/QRcLCB51orc/s320/kalmadi.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;कॉमनवेल्थ गेम तो खत्म हो गया लेकिन इसके साथ ही बहुत कुछ भी बदल गया लगता है। गेम्स से कुछ दिन पहले तक जो लोगों में आक्रोश था वो गेम शुरु होने के बाद में खत्म होने लगा। मेडलों की चकाचौध में लोग भूलने लगे कि कुछ दिन पहले तक कलमाड़ी खलनायक जैसा लगता था। सोने और चांदी की खनक ने कलमाड़ी का भी बॉडी लैग्वेज बदल कर रख दिया था। हमारे पालिटिकल क्लास ने इसे बेहतरीन मौके के रुप में भुनाया। सरकार ने गेम खतम होने के तुरंत बाद इसके जांच की घोषणा कर दी। इससे फायदा ये होना था कि अब लोग सरकार को परम इमानदार मान लेते और कुछेक लोगों को बंद कर दिया जाता। हाल तक जनता की याददाश्त कमजोर होती थी, अब थोड़ी बढ़ी है-लेकिन आम जनता जो गांवो कस्बों  में रहती है वो अब दूसरे मसलों की बात करने लगी है। मैं खुद एक महीना पहले तक जितना कलमाड़ी के बहाने भ्रष्टाचार को गरियाता था वो अब खत्म हो गया है। मेरे दोस्तों से मेरी बातचीत में अब कलमाड़ी नहीं आता। बल्कि मैं अक्सर अपने खिलाड़ियों पर गर्व करने लगता हूं। ज्यादा वक्त ऐसे ही बीतने लगा है। मुझे वो हसीन सपने आने लगे हैं कि हम ओलंपिक में चीन को पछाड़ देंगे। हम एक दिन ओलंपिक की तैयारी करेंगे। अपने मुल्क में ओलंपिक करवाएंगे। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;यहीं से कलमाड़ी की संभावनाएं फिर से शुरु होती है। कलमाड़ी कह चुके हैं कि भारत को ओलंपिक करवाना चाहिए। मेरी सोच, जो मेरे जैसे करोड़ो युवाओं की सोच है उसे कलमाड़ी फिर से कैश करने के लिए तैयार बैठा है। बहुत जल्दी, शायद साल भर के भीतर ही जांच एजेंसिया कलमाड़ी को क्लीन चिट भी दे देगी। मुझे यकीन हो चला है कि वो इतना कच्चा खिलाड़ी नहीं है कि उसने पेपर वर्क में कोई कसर छोड़ी होगी।  &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;कॉमनवेल्थ गेम में हमारा प्रदर्शन, वाकई अद्भुद था। हमारी पुलिस, हमारी व्यवस्था और हमारा व्यवहार सुचारु ही था। हमारे खिलाड़ियों ने बहुत अच्छा किया। लेकिन क्या वाकई इसमें कलमाड़ी का कोई योगदान था?? खिलाड़ियों की ट्रेनिंग या शहर की सुरक्षा उसके जिम्मे तो कतई नहीं थी। उस पर जो आरोप लगे वो अभी भी मौंजूं है। कलमाड़ी को इसका जवाब देना चाहिए। कॉमनवेल्थ गेम की ओपनिंग और क्लोजिंग सेरीमॉनी ने लोगों का मिजाज ही बदल दिया। कलमाड़ी पर लगे सारे आरोप धुंए की तरह उड़ गए।  &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;लेकिन कलमाड़ी अभी भी चालें चल रहे है। शायद अगली बार पूरे देश के बजट का आधा वो ओलंपिक पर झोंकवा दे। गेम के बाद मेरे पापा भी ओलंपिक की बात करने लगे है, और अक्सर मैं भी। लेकिन मैं चाहता हूं कि सिस्टम ठीक हो जाए। वो कलमाड़ी जैसे लोगों के हाथों में न हो।  &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-4372643968441951976?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/4372643968441951976/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=4372643968441951976&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/4372643968441951976'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/4372643968441951976'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='मैं भी ओलंपिक की बात क्यों करने लगा हूं....'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/TMR1x9QDFuI/AAAAAAAAB70/QRcLCB51orc/s72-c/kalmadi.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-3881093611791727384</id><published>2010-06-21T01:13:00.004+05:30</published><updated>2010-06-21T01:23:47.263+05:30</updated><title type='text'>के पतिया लय जाओत रे मोरा प्रियतम पासे...</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/TB5vxPW0e_I/AAAAAAAAB6M/FA0_yTcqJw4/s1600/vidyapati.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5484944287910362098" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 276px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/TB5vxPW0e_I/AAAAAAAAB6M/FA0_yTcqJw4/s320/vidyapati.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;पिताजी पटना से मैथिली लोक संगीत की कुछ सीडी लाए थे। उससे पहले मैथिली गीतों में मुझे वो क्लास नजर नहीं आता था या हमने उस क्लास को खोजने की ही कोशिश नहीं की थी। मैथिली के गीतों को मैं एक अरसे के बाद सुन रहा था। दिल्ली में मीडिया की, और वो भी एक अंग्रेजी चैनल की नौकरी आपको किस कदर अपनी जड़ों से काट देने के लिए उकसाती है इसका एहसास मुझे अचानक ही हुआ। मैथिली भक्ति संगीत का वो गाना जो भगवान शिव को समर्पित था-वो इस हद तक क्सासिकल था कि मुझे लगा कि अगर ये बंगाली या कन्नड़ में होता वहां के लोग इसे न्यूयार्क तक बेच आते। लेकिन नहीं, शायद मैथिली, अवधी या ब्रज जैसी भाषाओं को ये नसीब नहीं। वहां का संगीत, वहां का साहित्य और वहां की संस्कृति किस कदर एक स्लो डेथ की तरफ बढ़ रही है इसका विश्लेषण शायद बड़े विमर्श की मांग करता है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;जब दुनिया ग्लोबल नहीं हुई थी शायद मेरी भाषा इतनी नीरीह नहीं थी। उसमें काफी दम था, वो खिलखिलाती थी तो लोगबाग जरुर ध्यान देते थे। हिंदुस्तान के सतरंगी बगिया में बंगाली, उडिया, कन्नड़, अवधी और ब्रजभाषा की तरह वो भी एक खूबसूरत फूल थी। लेकिन जमाने ने जब करवट ली तो ये तय हो गया कि देश में छोटी-2 भाषाओं के लिए कोई जगह नहीं है। बात करें उत्तर भारत की तो मेरी भाषा हिंदी के विस्तारवाद का शिकार हो गई, ये कहने में मुझे कोई झिझक नहीं। मैथिली हिंदी से मिलती जुलती तो है लेकिन वो भाषाई और सांस्कृतिक रुप से बंगाली के ज्यादा निकट है। मिथिला का क्लचर भी बंगाल से ज्यादा मिलता जुलता है। माछ- भात (मछली-चावल) अभी भी वहां का सर्वप्रिय भोजन है, लेकिन ग्लोबलाईजेशन के बाद करवाचौथ भी पहुंचने लगा है। मेरी इन पंक्तियों का करवाचौथ से कोई विरोध नहीं है, लेकिन दुख की बात ये कि लोग अपनी सांस्कृतिक प्रतीकों को तेजी से भूलते जा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैथिली की अपनी एक अलग लिपि थी, अपना व्याकरण था और खड़ी हिंदी से पुराना इतिहास भी। ये उत्तर भारत की एक क्लासिकल भाषा है जिसमें लेखन की एक प्राचीन परंपरा है। शायद इसी वजह से इसमें भोजपुरी की तरह अश्लीलता का पुट नहीं आ पाया। कवि कोकिल विद्यापति मिथिलांचल के ही थे। लेकिन मिथिलांचल का इलाका जब बंगाल के विभाजन के बाद बिहार का हिस्सा बना तो हिंदी के वर्चस्व के तले ये भाषा धीरे-धीरे अपना असर खोती गई है। मुझे याद आता है, मेरे बचपन के समय तक पटना की चेतना समिति एक बड़ा सांस्कृतिक केंद्र था और वहां बड़े आयोजन होते थे। लेकिन धीरे-धीरे लोग हिंदी अंग्रेजी की तरफ बढ़ते गये और मैथिली सिर्फ घरों में सिमट कर रह गई-वो भी मां के आंचल तले, पत्नी की बांहों में भी नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज मैथिलभाषी लोग अपनी भाषा बोलने में हीनता का अनुभव करने लगे हैं। सभी लोग तो नहीं लेकिन एक वर्ग ऐसा तो जरुर बन गया है। लोगों को ये बताते हुए शर्म आती है कि उनका घर सहरसा या दरभंगा है। मां-बाप की आंखे बच्चों को पॉप संगीत पर थिरकते देख चमक उठती है, मानो वे सदियों से इस इलाके में रहे पिछड़ेपन और गरीबी की जिल्लत से एकबारगी ही मुक्ति पा गए हों। लेकिन शायद ये मेरी भाषा के साथ ही नहीं हो रहा। ये त्रासदी उन सारी भाषाओं की है जो आकार में छोटी हैं, और नौकरी व कारोबार के अनुकूल नहीं है। हिंदुस्तान में जिंदा रहने के लिए हिंदी-अंग्रेजी का ज्ञान जरुरी हो गया है, कल्चर और मातृभाषा तो सेकेंडरी चीज हो गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद, ग्लोबलाईजेशन का ये जरुरी नतीजा है। आपको वहीं सोचना,खाना, ओढ़ना और पहनना है जो सुदूर अमेरिका में हो रहा है या कम से कम दिल्ली-मुम्बई में तो जरुर हो गया है। विडियोकॉन टॉवर के इस चमचमाते ग्लास हॉउस में बैठकर सोच रहा हूं कि क्या दरभंगा या मधुबनी का काली मंदिर चौक वाकई रहने के लिए बहुत नामाकूल जगह थी ? क्या आनेवाले वक्तों में हिंदुस्तान की सतरंगी बगिया वाकई सतरंगी रह पाएगी...।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-3881093611791727384?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/3881093611791727384/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=3881093611791727384&amp;isPopup=true' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/3881093611791727384'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/3881093611791727384'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2010/06/blog-post_21.html' title='के पतिया लय जाओत रे मोरा प्रियतम पासे...'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/TB5vxPW0e_I/AAAAAAAAB6M/FA0_yTcqJw4/s72-c/vidyapati.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-8959400301385532217</id><published>2010-06-13T13:52:00.002+05:30</published><updated>2010-06-13T13:54:54.542+05:30</updated><title type='text'>आपकी ईमानदारी एक ब्रांड तो है ही</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5482170850698583714" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 240px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/TBSVV8nj3qI/AAAAAAAAB58/xMEOHpkiiQU/s320/Photo-0226.jpg" border="0" /&gt;Honesty भले ही बेस्ट पालिसी नहीं रह गई हो......लेकिन आपकी ईमानदारी एक ब्रांड तो है ही...अब बलबीर भाटिया को ही देख लीजिए...ऑटो चलाते है, लेकिन अपनी ब्रांडिंग करना नहीं भूलते। ईमानदारी को ही अपना यूएसपी बना लिया....टाटा और रिलायंस का अंतर समझते हैं। ख़ैर तश्वीर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से ली गई है। दस लाख रूपए कम नहीं होते लेकिन ईमानदारी की भी भला कोई क़ीमत लगा पाया है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-8959400301385532217?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/8959400301385532217/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=8959400301385532217&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8959400301385532217'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8959400301385532217'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='आपकी ईमानदारी एक ब्रांड तो है ही'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/TBSVV8nj3qI/AAAAAAAAB58/xMEOHpkiiQU/s72-c/Photo-0226.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-1244702412697390302</id><published>2010-01-14T00:53:00.005+05:30</published><updated>2010-01-14T01:04:54.768+05:30</updated><title type='text'>हैती में कुदरत का कहर</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S04eEkAzLpI/AAAAAAAAB2c/0PTyS4umMfw/s1600-h/51617050.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5426307664763367058" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 214px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S04eEkAzLpI/AAAAAAAAB2c/0PTyS4umMfw/s320/51617050.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;ज़मींदोज शहर पोर्ट ओ प्रिंस- हैती की राजधानी...!&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S04eoofmewI/AAAAAAAAB2k/lPWznTokbuY/s1600-h/church_1558559i.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5426308284441590530" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 213px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S04eoofmewI/AAAAAAAAB2k/lPWznTokbuY/s320/church_1558559i.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt; तुम कैसे बच गए मसीहा..!&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S04eze0ywCI/AAAAAAAAB2s/ABGQIWYN4DU/s1600-h/collapsed-building_1558561i.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5426308470824681506" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 206px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S04eze0ywCI/AAAAAAAAB2s/ABGQIWYN4DU/s320/collapsed-building_1558561i.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;तबाही...सिर्फ़ तबाही..!&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S04fMCgZsuI/AAAAAAAAB20/8dvSmmyLIJE/s1600-h/51615251.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5426308892719690466" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 212px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S04fMCgZsuI/AAAAAAAAB20/8dvSmmyLIJE/s320/51615251.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;इंसान...कितना लाचार...!&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;br /&gt;© PICS COURTSEY – LA TIMES\ TELEGRAPH\ TIMES ONLINE&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-1244702412697390302?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/1244702412697390302/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=1244702412697390302&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/1244702412697390302'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/1244702412697390302'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2010/01/blog-post_14.html' title='हैती में कुदरत का कहर'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S04eEkAzLpI/AAAAAAAAB2c/0PTyS4umMfw/s72-c/51617050.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-5883804116443380656</id><published>2010-01-12T21:11:00.000+05:30</published><updated>2010-01-12T21:13:15.537+05:30</updated><title type='text'>चेक दे इंडिया...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S0yYZu8o1UI/AAAAAAAAB2U/R9J8DfJIQVA/s1600-h/cdimusicnewstop.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5425879218941121858" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S0yYZu8o1UI/AAAAAAAAB2U/R9J8DfJIQVA/s320/cdimusicnewstop.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-5883804116443380656?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/5883804116443380656/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=5883804116443380656&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/5883804116443380656'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/5883804116443380656'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2010/01/blog-post_12.html' title='चेक दे इंडिया...'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S0yYZu8o1UI/AAAAAAAAB2U/R9J8DfJIQVA/s72-c/cdimusicnewstop.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-534642334431882183</id><published>2010-01-09T15:44:00.003+05:30</published><updated>2010-01-09T15:49:58.285+05:30</updated><title type='text'>'कारपोरेट' चाय...!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S0hXRQhN1_I/AAAAAAAAB2M/pcLNGXYQfos/s1600-h/Photo-0055.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5424681705171441650" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S0hXRQhN1_I/AAAAAAAAB2M/pcLNGXYQfos/s320/Photo-0055.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;ये चाय मामूली चाय नहीं है। यह ठंढ़ी होने की वजह से केस स्टडी बन चुकी है। यह अपने आप में कॉरपोरेट जगत के महान सिद्धांतो को समेटे हुए है। कटवारिया सराय के मकान नंबर xyz के फोर्थ फ्लोर पर सैमसंग का एक सिस्टम है, जिसके सामने यह चाय रखी हुई है। 'कॉरपोरेट कुली' 10 बजे उठता है। उठते ही ऑफ़िस के बकाया कामों को निपटाने के लिए ‘सिस्टम’ से जा चिपकता है। बीच में लड़कियों के फ़ोन...न्यू ईयर विश, बर्थ डे की बधाईयां...। चाय ठंढ़ी हो गई है। मलाई तैरने लगी है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;44 रूपए किलो चीनी और 60 रू के लिप्टन के पैक से निकली चाय पत्ती...हमारे उदीयमान अर्थशास्त्री इस चाय की क़ीमत 3रु 45 पैसा कूतते हैं। चूंकि ये ठंढी हो गई है, इसलिए देश की जीडीपी साढ़े तीन रूपए घाटे में जा रही है। लेकिन इसी के साथ एक रिवाइवल पैकेज भी है जो सत्यम के रिवायवल पैकेज से कम नहीं है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;सवाल यह है कि हमारा Objective क्या है?&lt;br /&gt;“PRIMARY OBJECTIVE” – To re-instate the position of एक कप चाय without diluting the BRAND VALUE of same without un-altering the positioning. (कड़क चाय)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Secondary:- To increase the frequency of Tea drinkers (चाय पियक्कड़) and to have a positive rub off for our brands( फिर से कड़क)  with increased category penetration.( एक बट्टा दो कप)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“MISSION” – To protect and promote the interests of tea drinkers while serving the needs of its members. (चाय की तलब)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“VISION” – To strive for highest possible standards in day to day life and quality of products.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"GOAL" - To be on the top of the mind recall for every tea users, thus we need to be on every household. ( ताकि लोगों को ये एहसास रहे कि ये बर्बादी है और बिना किसी ग्लानि वोध के ऐसा सभी लोग करें)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रोजेक्ट रिपोर्ट में बहुत कम निवेश का जिक्र है-मसलन..चाय को फिर गर्म करने में लगा खर्च-30 पैसा और उसे एक बेहतरीन कप में बेहतरीन रोमांटिक गाना गुनगुनाते हुए पेश करना। इसे आप आपर्चुनिटी कोस्ट (यानी ऐसा काम जो आपने किया बिल्कुल नहीं है लेकिन अफसोस इस बात का कर रहे हैं कि अगर करते तो इतना फायदा होता) कह सकते हैं जो आपकी बीवी द्वारा चाय को फिर से बनाने की सूरत में 0 रुपया है जबकि रामपाल द्वारा बनाए जाने की सूरत में 7 पैसा प्रति कप बैठता है। प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने में कंपनी के बेहतरनी एक्जक्यूटिव का लगा वक्त और उसका ह्यूमेन रिसोर्स प्रति कप 3 पैसा बैठता है और अगर इस तरह के 5 करोड़ कप चाय को रिवाईव किया जाता है तो मुनाफा तकरीबन 18 करोड़ रुपये का है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो लीजिए तैयार है गरम चाय और इसका क़ॉरपोरेट रिवाईवल प्लान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;strong&gt;नोट- इस प्रोजेक्ट को तैयार करने में संजीव कुमार और सुशांत झा का अहम य़ोगदान है लेकिन मनेजमेंट के आला अधिकारियों ने उनका नाम चेतन भगत की तरह बेहद पतले अक्षरों में सिर्फ क्रेडिट रोल में दिया है। दरअसल, ऐसा कंट्रैक्ट में ही था!&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-534642334431882183?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/534642334431882183/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=534642334431882183&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/534642334431882183'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/534642334431882183'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2010/01/blog-post_09.html' title='&apos;कारपोरेट&apos; चाय...!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S0hXRQhN1_I/AAAAAAAAB2M/pcLNGXYQfos/s72-c/Photo-0055.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-8467770413482842309</id><published>2010-01-05T21:26:00.005+05:30</published><updated>2010-01-05T23:37:56.070+05:30</updated><title type='text'>पटना तू भी बदलने लगा...!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S0Ni9CmnceI/AAAAAAAAB1s/_1uMIMTHyyg/s1600-h/PATNA.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5423287177094590946" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S0Ni9CmnceI/AAAAAAAAB1s/_1uMIMTHyyg/s320/PATNA.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; आज ही अपने गृह शहर पटना से लौटा हूं। शीत-लहर के कारण कमोबेश सभी गाड़ियां देर से चल रही हैं। लेकिन इसे संयोग कहिए या कुछ और कि मेरी गाड़ी विक्रमशिला बिल्कुल नीयत समय पर दिल्ली पहुंच गई। वहां सब ठीक-ठाक चल रहा है। पिछड़ेपन के लबादे को पीछे छोड़ बिहार अब तेजी से विकास की ओर बढ़ रहा है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के नवीनतम आंकड़ों ने भी इसकी पुष्टि कर दी है। बिहार नई मिरेकल इकॉनमी बन गया है। पटना की सड़कों पर राज्य के बढ़े हुए कांफिडेंस की झलक दिख जाती है। कई नए शापिंग मॉल, नए मल्टीप्लेक्स, फाईव स्टार रेस्त्रां, सड़कों पर लंबी गाड़ियां, नियॉन लाईट्स से जगमगाते मल्टीनेशनल कंपनियों के दफ्तर और लोगों के अंदर नई ऊर्जा, ये सब मुझे पटना में दिखा। मोना टॉकिज अब मल्टीप्लेकस बन गया है। किसी ज़माने में 10 रू में डीसी की टिकट मिलती थी, वहीं 'थ्री इडियट्स' देखने के लिए मुझे इस बार डेढ़ सौ रूपए खर्च करना पड़ा। कई नए लोकल मीडिया संस्थान के ऑफिस खुल गए हैं। पिताजी के कई मित्रों से राज्य की स्थिति पर बात हुई। नीतीश कुमार के कई प्रशंसक मिले, कई आलोचक भी। लेकिन मुख्यमंत्री का कोई निंदक नहीं मिला..। कानून व्यवस्था भी की हालत भी पहले से काफी सुधर गई है। पहले जहां गोली-बम की आवाज़ आम सी हो गई थी, वहीं इस बार बम के धमाकों के बिना थोड़ा सूना-सूना लग रहा था! चौक-चौराहों पर पुलिस मुस्तैद दिखी। शराब के ठेकों की संख्या बढ़ गई है। लेकिन 1 जनवरी को कोई सड़क पर पी कर हंगामा करता नहीं दिखा। पटना कॉलेज में एक क्लास लेने का मौका मिला। बैचलर इन जर्नलिज्म के अंतिम वर्ष के छात्रों से बात करने पर उनके अंदर अंग्रेज़ी सीखने की लालसा दिखी। इंजीनयरिंग, मेडिकल के कोचिंग तो पहले से ही बहुत थे, इस बार अंग्रेज़ी सीखाने वाले कई नए संस्थान कुकुरमुत्तों की तरह उग आए हैं। बिहारी छात्र सिर्फ इंग्लिश में मार खा जाता है, लेकिन शायद अब मर्ज़ पकड़ में आ गया है। इधर फूड हैबिट भी तेज़ी से बदल रहा है। किसी ज़माने में लिट्टी-चोखा को राज्य के पिछड़ेपन का प्रतीक माना जाता था, लेकिन पटना में मुझे कई ऐसे रेस्त्रां मिले जहां बड़ी शान से लिट्टी-चोखा को मैन्यू में सबसे उपर जगह दिया गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S0NjMi45qEI/AAAAAAAAB10/gt-lwWB8gNE/s1600-h/Photo-0220.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5423287443459254338" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S0NjMi45qEI/AAAAAAAAB10/gt-lwWB8gNE/s320/Photo-0220.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;लेकिन विकास की इस बयार में कुछ चीजें छूट भी गई हैं। मसलन सड़क पर गाड़ियों की संख्या तो बढ़ गई हैं लेकिन रोड की चौड़ाई नहीं बढ़ पाई है। विकास के तमाम फायदे कहीं पटना में ही न सिमट कर रह जाएं ये खतरा बरकरार है। इसकी वजहें भी है। हाल के सालों में पटना में रीयल स्टेट की कीमतें दिल्ली-मुम्बई के बराबर होने लगी है। पटना उन कुछ चुनिंदा शहरों में शुमार हो गया है जहां से हवाई यात्रा करनेवाले लोगों की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी हुई है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;जाहिर है, ये चीजें एक खतरनाक ट्रेंड की तरफ इशारा कर रही है। इसका मतलब ये है कि पूरे बिहार में विकास के नाम पर पनपने वाला पैसा पटना में जमा होने लगा है-जो राज्य में आनेवाले वक्त में भारी आर्थिक असामनता का पूर्वाभ्यास है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;ये अच्छा है कि राज्य में 11 फीसदी जीडीपी बृद्धि उद्योंग या कारोबार की बदौलत नही आया है। इसमें कृषि और ग्रामीण क्षेत्र का भारी योगदान है। दूसरी बात ये कि राज्य में जीडीपी बृद्धि इतना ज्यादा इसलिए भी दिख रहा है कि बिहार की अर्थव्यवस्था का आकार बहुत ही छोटा है। सरकार अगर इसी तरह समाजिक क्षेत्रों, सड़क, बिजली और शिक्षा पर अपना ध्यान फोकस करती रहे तो बिहार को एक टिकाऊ विकास मिल पाएगा जो पूरे देश में एक मॉडल होगा। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-8467770413482842309?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/8467770413482842309/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=8467770413482842309&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8467770413482842309'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8467770413482842309'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='पटना तू भी बदलने लगा...!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/S0Ni9CmnceI/AAAAAAAAB1s/_1uMIMTHyyg/s72-c/PATNA.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-643325454437725658</id><published>2009-11-22T19:12:00.002+05:30</published><updated>2009-11-22T19:16:16.596+05:30</updated><title type='text'>अपने दादा को याद करिये राहुल गांधीजी !</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Swk_5RuNc7I/AAAAAAAAB1A/66rTFs4hqN8/s1600/FR.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5406923080877306802" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 210px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Swk_5RuNc7I/AAAAAAAAB1A/66rTFs4hqN8/s320/FR.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="color:#000066;"&gt;&lt;strong&gt;[सुशांत झा]&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;सीएनबीसी में बड़े पैमाने पर हुई छंटनी के बाद बरबस ही फिरोज गांधी की याद आ गई। फिरोज गांधी को भारतीय इतिहास में सार्वजनिक उपक्रमों की मजबूती के लिए आवाज उठानेवाले लोगों में से याद किया जाएगा जिन्होने संसद में जनहित के कई बड़े मुद्दे उठाए। लेकिन उससे भी ज्यादा फिरोज गांधी को जिस बात के लिए याद किया जाएगा वो है साल 1956 का वो कानून जिसने मीडिया वालों को विधायिका से संबंधित मामलों की रिपोर्टिंग करने में बड़ी मदद की। इससे पहले मीडिया के लोग अगर संसद में हो रही किसी कार्यवाही को छापते थे तो ये उनका निजी रिस्क होता था। सांसद उनपर विशेषाधिकार प्रस्ताव के तहत कार्रवाई कर सकते थे। ऐसा अक्सर होता था कि पत्रकार विवादास्पद मुद्दों की रिपोर्टिंग से बचने की कोशिश करते। लेकिन 1956 में फिरोज गांधी की कोशिशों से संसद ने एक कानून पास किया जिसके तहत पत्रकारों को संसदीय कार्यवाही को छापने का निर्भीक अधिकार दिया गया भले ही इसमें किसी पर कोई आरोप ही क्यों न लग रहा हो।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;फिरोज गांधी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा ही खोल रखा था। वे संसद के जिस कोने में बैठते थे उसे आज भी फिरोज कार्नर कहा जाता है। उन्होने एलआईसी में एक बड़े घोटाले को संसद में उठाया था जिसके तहत कलकत्ता के एक बड़े शेयर दलाल हरिदास मुंदरा की गिरफ्तारी हुई थी और नेहरु केबिनेट के कद्दावर मंत्री टी टी कृष्णमाचारी को इस्तीफा देना प़ड़ा था। न्यायमूर्ति एम सी चागला जांच आयोग ने पाया कि एलआईसी के पैसे का दुरुपयोग बड़े पैमाने पर मुंदरा के शेयरों की खरीद के लिए की गई थी जिसका बाजार भाव काफी नीचे था। ये नेहरुजी के काल में और आजाद भारत में सबसे बड़ा और पहला घोटाला था जिसको फिरोज गांधी ने उजागर किया था और नेहरु सरकार की काफी किरकिरी हुई थी। माना जाता है कि इस वजह से फिरोज गांधी और इंदिरा गांधी में और भी दूरी बढ़ गई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मुद्दे पर लौटते हुए बात करे तो फिरोज गांधी के पोते और राहुल गांधी में अपने दादा का कोई लक्षण नहीं दिखाई देता। आजकल राहुल गांधी को गौर से सुनता हूं। वे गरीबी, शिक्षा, रोजगार जैसे मुद्दों पर खूब बोलते हैं। कभी-कभी भ्रम होता है कि राहुल गांधी कहीं वामपंथी मिजाज के तो नहीं हो गए क्योंकि ये सब काम तो अमूमन वामपंथियों का होता था! राहुल गांधी मीडिया के बड़े हीरो हैं, उनकी तस्वीर लोग देखना चाहते हैं, कन्याएं उनपर फिदा हैं(एक मुम्बई में रहने वाले सलीम खान के बेटे पर भी लोग फिदा है)। हिंदुस्तान का विपक्ष एक नहीं है, वो साम्प्रदायिक और जातीय बातें करता है और लोग पिछले 20 सालों में उससे ऊब गए हैं। ऐसे में लोगों का कांग्रेस प्रेम स्वभाविक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन राहुल गांधी नौकरियों की हो रही छंटनी और महंगाई पर अपनी जुबान नहीं खोलते। इसे क्या माना जाए। सीएनबीसी में हुई बड़े पैमाने पर छंटनी तो महज एक नमूना भर है। देशभर में ऐसी छंटनियां हर रोज संगठित-असंगठित क्षेत्र में हो रही है लेकिन राहुल गांधी जिस युवाओं के आदर्श की बात करते हैं क्या उन्हे सचमुच कुछ नहीं दिखाई देता ? कम से कम मीडिया में हो रही छंटनी से ही वे इसकी शुरुआत करते जिसने उनकी इमेज बनाने में बड़ा रोल अदा किया है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-643325454437725658?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/643325454437725658/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=643325454437725658&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/643325454437725658'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/643325454437725658'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/11/blog-post_22.html' title='अपने दादा को याद करिये राहुल गांधीजी !'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Swk_5RuNc7I/AAAAAAAAB1A/66rTFs4hqN8/s72-c/FR.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-3528813345293414730</id><published>2009-11-20T16:04:00.004+05:30</published><updated>2009-11-20T16:19:24.800+05:30</updated><title type='text'>अगहन की रात, जेठ का मज़ा</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5406136052021671122" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 240px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SwZ0GKwvNNI/AAAAAAAAB04/ICPLVQIHYb8/s320/Photo-01456.JPG" border="0" /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;तारीख़ 20 नवंबर 2009&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;आज बहुत ही ख़ास दिन है और लंबे अंतराल के बाद हमारी मित्र मंडली ने मिलने का प्रोग्राम बनाया है। कुछ पुरानी यादों को ताज़ा करना है और कुछ नई ग्रामीण से लेकर अन्तरराष्ट्रीय समस्याओं की खाल खींचनी है। सारा बंदोबस्त हो चुका है। घास पात बिरादरी के लिए पनीर है, तो नॉन वेज के लिए देसी मुर्गे की आवाज़ अभी खामोश की गई है...साथ ही मदिरा के दौर का इंतजाम भी चौकस है। आज किसी भी तरह की कमी नहीं होगी पिछली बार की भूल का एहसास है, जब दारु बीच में ही खत्म हो गई थी और हमारे बौद्धिक ज्ञान का लेवल अचानक माइनस में चला गया था। लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा। जब जब हम ऐसी मुलाकात करते हैं तो लगता है कि ये हमारे सालाना जलसे का दिन है। आमंत्रण भी सबको दिया जा चुका है। ऋषि अपनी लंबी गाड़ी से अपने प्रिय सेवक रामफल के साथ आदतन देर रात को ही कदम रखेगा, जबकि सुशांत अपनी प्यारी बदरपुर बॉर्डर की ब्लू लाइन की सेवा का आनंद उठाते आ रहे हैं। मैंने और राजीव ने अवकाश ले लिया है ताकि आयोजन में कोई कमी ना हो। हम अपनी छुट्टी का पूरा सदुपयोग कर रहे हैं। अपनी ऊर्जा स्तर को बढ़ाना, बिना नहाए ही भोजन किया, धूप का सेवन कर खुद को तरोताजा करना। कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है कि नहाया क्यों नहीं तो भाइयों बता दें देश लोकतांत्रिक है सो ये अपन की मर्जी है। हमने कुछ तस्वीरें भी खिंचवाई है ताकि जब बड़े आदमी बन जाएं तो लोग इसे संभालकर इस्तेमाल करें। राजीव के यहां काम करने वाला लौंडा राजेश हमसे दुगुने उत्साह में है और इस बार पता लगा वो हमसे बड़ा पत्रकार है। किसी ज्ञान में कोई कमी नहीं और किसी खबर की फ्लैश चलते ही तुरंत खबर देना...सो हमने डिसाइड किया कि जब हम 'बास' बनेंगे तो इसे इनपुट में जगह दी जाएगी। घर के नीचे बैठी कुतिया भी सुबह से ही अंगड़ाई ले रही है कि आज तो अच्छी दावत मिलने वाली है शायद वो हमारे उत्साह को देखकर लबरेज है। सूरज भी आज आकाश से सलामी दे रहा था कि भाइयों रात को तो नहीं रहूंगा लेकिन मुझे भी याद रखना सो उसकी भी अर्जी रख ली गई है। पहले भी मैं कई दफा ज्यादा हो गया लिखता बहुत कम हूं लेकिन ये ज़िक्र कर चुका हूं कि सुशांत का कोई जोड़ नहीं जितनी कमनीय उनकी काया है वैसा ही दिमाग वो हमारे लिए बैटरी का काम करते हैं। जबकि काला साहेब हमारे कबीर हैं, 'नियरे निंदक राखिए'। हर बात पर सजग करने वाले यही उसकी बात है कि हमारे लिए वो दिलो जान से प्यारा है लेकिन कभी कभी कुछ अतिरेक उसके जरिए हो ही जाता है। राजीव अभी गुशलखाने में है और मुझे ये जिम्मेदारी दी गई है कि इसे लिखकर तुरत एक आमंत्रण सबको भेज दिया जाए। सो भाई लोग इस हुल्लड़बाज़ी संग्रह में आपका स्वागत है.... कार्यक्रम स्टार्ट आहे......आपको सादर इनिविटेशन....अपने खतरा उठाते हुए आइये...।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;विनीत&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजीव कुमार(पत्तरकार)&lt;br /&gt;राघवेंद्र(पत्तरकार)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;राघवेंद्र त्रिपाठी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-3528813345293414730?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/3528813345293414730/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=3528813345293414730&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/3528813345293414730'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/3528813345293414730'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/11/blog-post_20.html' title='अगहन की रात, जेठ का मज़ा'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SwZ0GKwvNNI/AAAAAAAAB04/ICPLVQIHYb8/s72-c/Photo-01456.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-688938996457135850</id><published>2009-11-15T17:06:00.003+05:30</published><updated>2009-11-15T17:12:39.869+05:30</updated><title type='text'>अजब गज़ब - हवा में आदमी</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sv_oZzYD1xI/AAAAAAAABz4/MVlGNDzW-l0/s1600-h/article-1227958-0736DC1E000005DC-475_634x411_popup.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5404293607853381394" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 222px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sv_oZzYD1xI/AAAAAAAABz4/MVlGNDzW-l0/s320/article-1227958-0736DC1E000005DC-475_634x411_popup.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;ये तश्वीर ब्रिटिश अख़बार डेली मेल से ली गई है। ब्रिटेन में इस साल के सबसे भयंकर तूफ़ान ने इस शख़्स को हवा में तीन फीट तक उठा दिया। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;ख़बर को विस्तार से यहां देख सकते हैं - &lt;a href="http://www.dailymail.co.uk/news/article-1227958/Biggest-storm-year-sweeps-Britain-feet-flooding-gales-lightning-strikes.html"&gt;http://www.dailymail.co.uk/news/article-1227958/Biggest-storm-year-sweeps-Britain-feet-flooding-gales-lightning-strikes.html&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-688938996457135850?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/688938996457135850/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=688938996457135850&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/688938996457135850'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/688938996457135850'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/11/blog-post_15.html' title='अजब गज़ब - हवा में आदमी'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sv_oZzYD1xI/AAAAAAAABz4/MVlGNDzW-l0/s72-c/article-1227958-0736DC1E000005DC-475_634x411_popup.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-5418796776731398942</id><published>2009-11-14T17:21:00.009+05:30</published><updated>2009-11-14T17:40:38.092+05:30</updated><title type='text'>सचिन ग्रेट हैं..लेकिन जीत का चस्का तो गावस्कर ने लगाया था।</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5403926261830074370" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 221px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sv6aTczJQAI/AAAAAAAABzI/k1pShe6oKBA/s320/sachin12-large.jpg" border="0" /&gt;आज सचिन अंतराष्ट्रीय क्रिकेट में 20 साल पूरा कर रहे हैं। इन 20 वर्षों में सचिन ने सफ़लता के कई मुकाम खड़े किये। कितनी ही रिकार्डें ध्वस्त की...कई नए कीर्तिमान बनाए...इस खेल की नई परिभाषाएं गढ़ीं। क्रिकेट प्रेमियों का भरपूर मनोरंजन भी किया। लेकिन क्या सचिन इतिहास के सबसे महान क्रिकेटर हैं?? सच है, सचिन ने वन डे और टेस्ट में जो रनों का पहाड़ खड़ा किया है, वो अपने आप में मिसाल है, और आने वाले सालों साल तक कोई खिलाड़ी उनके रिकार्ड के आसपास भी पहुंचता नहीं दिखाई दे रहा है। लेकिन व्यक्तिगत रन और महानतम होना, दो अलग-अलग बातें हैं। मेरे जेनरेशन के लोगों ने सुनिल गावस्कर को कम ही खेलते देखा है। लेकिन मुझे वो सचिन से महान और बेहतरीन बल्लेबाज लगते हैं। ये विचार बिल्कुल ही व्यक्तिगत हैं।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sv6b5avwX-I/AAAAAAAABzo/8Bo_tTdXS9Y/s1600-h/09pic2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5403928013625647074" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 233px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sv6b5avwX-I/AAAAAAAABzo/8Bo_tTdXS9Y/s320/09pic2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;सचिन अंतराष्ट्रीय क्रिकेट में 1989 में आए। ये वो समय था जब भारत में नेहरूवियन समाजवाद अपनी अंतिम दिनों को गिन रहा था। समाज व्यापक बदलावों के लिए कुलबुला रही थी। अगले कुछ ही सालों में मनमोहन सिंह ने भारतीय बाजार को धीरे-धीरे आर्थिक ताक़तों के लिए खोल दिया था। बाजार का दम भी सचिन को उस मुकाम तक पहुंचाने में मदद करने वाली थी, जहां वो आज हैं। हम गुलामी की मानसिकता से बाहर निकल रहे थे। दुनिया से दो-दो हाथ करने की हमारी बेताबी हिलोरें ले रही थी। सचिन, हमारी मानसिकता के इसी बदलाव के प्रतीक बने। मैं तो उस वक्त बहुत छोटा था, लेकिन आज मुड़ कर किताबों के माध्यम से उस वक्त को देखता हूं, तो बदलाव स्पष्ट दिखता है। उस समय विदेशों में हमारी दो तरह से पहचान होती थी। एक टैक्सी चलाने वाला हिन्दुस्तानी, दूसरा सीलिकन वैली में पहुंचे नए रंगरूटों की फौज, जो आने वाले समय में भारत की पहचान बनने वाले थे। विश्व मंच पर ‘ब्रांड इंडिया’ का आगाज़ हो चुका था। हमारी ये नई पोजीशन हमें सूकून भी दे रही थी। उससे पहले हमें ‘सपेरों के मुल्क’ का ही प्रतिनिधित्व करते थे। एक परसेपस्न थी कि हम आलसी हैं, जो कर्म से ज्यादा भाग्य पर यकीन रखते हैं। ये अलग बात थी की कर्म की सबसे बड़ी बाईबल ‘गीता’ हमारी धरती पर ही लिखी गई थी। किसी पश्चिम के विद्वान नें हमें विश्व का सबसे बड़ा ‘अराजक लोकतंत्र’ तक कहा था।&lt;br /&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5403926533580982178" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 300px; CURSOR: hand; HEIGHT: 300px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sv6ajRJnB6I/AAAAAAAABzY/t28Y7AMSplA/s320/sachin-tendulkar.jpg" border="0" /&gt;गावस्कर ने ऐसे तेज़ गेंदबाजों का सामना किया जो क्रिकेट इतिहास में पहले कभी नहीं देखा था, न ही आगे देखा। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह थी कि पहली बार कोई देशी जीतने की मांईडसेट से खेलने उतरा था। गावस्कर से पहले हम खेलने के लिए खेलत थे, जीतने के लिए नहीं। मैदान के चारों और लगने वाले गावस्कर के चौकों, छक्कों से कड़कड़ाहट से हमारी तंद्रा टूटी। खेल की भावना तो हमारे अंदर थी, लेकिन जीतने का ख़्वाब पहली बार हमने गावस्कर की आंखों से ही देखा था। गावस्कर पहले भारतीय क्रिकेटर थे, जिन्होंने विरोधी टीम की आंखों में घूरा। जिसकी शाट्स की चमक गेंदबाजों को विस्मृत कर देती...चौधिया देती। आप इसे मनोवैज्ञानिक इंजीयरिंग कह सकते हैं। आज हरभजन या सचिन अगर विरोधियों की आंखों में विजय भाव से घूर सकते हैं, तो इसका श्रेय गावस्कर को ही जाता है। ऐसा भी नहीं है कि उस वक्त हमारी टीम में गावस्कर से बेहतर खिलाड़ी नहीं थे...लेकिन हौसले का आभाव तो था ही। सैकड़ों वर्षों की गुलामी मानसिकता मैदान पर भी दिख जाती। गावस्कर ने इसी जिंक्स को तोड़ा था। पहला खिलाड़ी जिसने आस्ट्रेलिया में आस्ट्रेलिया के ख़िलाफ वॉक आउट करने की हौसला दिखलाया। भारतीय क्रिकेट का प्रथम पुरूष जो अपनी कमजोरियों को समझता था, फिर भी जीतने के लिए ही मैदान में उतरता था। वो विजय भाव से खेलता, हार उसे यकीनन मंजूर नहीं था। जीतने का चस्का हमें गावस्कर ने ही लगाया था।&lt;br /&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5403926941599628082" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 211px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sv6a7BI1ezI/AAAAAAAABzg/mpYfoWlFuIc/s320/sunil_gavaskar_2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;1989 में जब सचिन आए, उस वक्त तक गावस्कर ने उनके लिए ज़मीन तैयार कर दी थी। 84 में भारत विश्व कप जीत चुका था। क्रिकेट के मक्का लार्ड्स में तिरंगा लहराया जा चुका था। भारत अब जीतने लगा था। हम विरोधियों की आंखों में झांकने की हिम्मत करने लगे थे। एक देश और समाज के रूप में भारत कांफिडेंट हो गया था। हमारे अंदर औपनिवेशिक सोच की जगह वैश्विक सोच ने ले ली थी। दुनिया भी मानने लगी थी, हम किसी से कमतर नहीं हैं...हम भी जीत सकते हैं। सचिन इन्हीं लग्जरी के बीच ग्रांउड पर उतरे थे। गावस्कर ने अपनी ज़मीन ख़ुद ही तैयार की थी...नियम ख़ुद ही गढ़ा था। सचिन अपने लिए खेलने उतरे थे, गावस्कर ने देश के लिए ग्रांउड वर्क किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गावस्कर को क्रिकेट ही नहीं भारतीय मानसिकता के पुनर्जागरण का श्रेय भी जाता है। अगर हमारे लिए क्रिकेट धर्म है...सचिन भगवान हैं...तो गावस्कर निश्चित ही उस भगवान से बड़े हैं। क्रिकेट का पहला विद्रोही...और शायद सेट ट्रेंड से इसी बगावती सोच के कारण गावस्कर ने कभी हेलमेट पहन कर नहीं खेला...कभी नहीं। और कल्पना कीजिए उन्होंने किस तरह के गेदबाजों का सामन किया..माइकल होल्डिंग, एंडी राबर्टस, जोएल गार्नर, डेनिस लिली, जैफ थॉमसन, मैल्कम मार्शल, बॉब विल्स, सर रिचर्ड हैडली, इमरान ख़ान, सरफ़राज नवाज़, वसीम अकरम...। ये सब लगातार 90 की रफ़्तार से तेज़ गेदबाजी करने में सक्षम थे। और एक भी गेंद सन्नी को छू तक नहीं सकी...। क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि सचिन इन गेंदबाजों का सामना बिना हेलमेट के कर पाते। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;गावस्कर के मांइड सेट को इस उदाहरण से बेहतर समझा जा सकता है। 84 विश्व कप की फ़ाइनल में भारत के हाथों हारने के बाद वेस्ट इंडीज टीम भारत खेलने आई थी। मार्शल की टीम घायल शेर की तरह दहाड़ रही थी। कानपूर में मार्शल की बांउसर खेलते वक्त गावस्कर के हाथ से बल्ला फिसल गया...लोगों ने सोचा कि गावस्कर की क्रिकेट कैरियर खत्म होने वाली है। लेकिन दिल्ली में होने वाली अगले मैच में गावस्कर ने मार्शल को ऐसा धोया कि उनकी वो पारी क्रिकेट इतिहास बन गई। गावस्कर ने 96 रन बनाए थे, जो उस वक्त बहुत बड़ी बात थी। वो भी अगर सामने वेस्ट इंडीज जैसी टीम हो तो इतना रन सोचना भी गुनाह करने जैसा था। उनकी यही बागी तेवर उन्हें बाकी बल्लेबाजों से मीलों आगे ले जाती है। वो सचिन की तरह नहीं थे, जो दवाब में बुरी तरह लड़खड़ा जाते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;एक बात और, सचिन की टीम में हमेशा तीन-चार अच्छे बल्लेबाज रहे हैं। उनके समकक्ष खेलने वालों में राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली, लक्ष्मण, सहवाग, अजहर, मांजरेकर, कांबली जैसे बड़े नाम रहे हैं, जिनका सहयोग निश्चित रूप से सचिन को मैदान पर मिलता रहा है। वहीं गावस्कर की टीम में विश्वनाथ और मोहिंदर अमरनाथ जैसे कुछ ही गिने-चुने नाम थे। यहां तक कि उस वक्त हमारी टीम को ढ़ाई बल्लेबाज की टीम के नाम से बुलाया जाता था। काश....काश! गावस्कर के पास भी सचिन जैसे समकक्ष बल्लेबाज होते या फिर उनका भी जन्म सचिन के समय होता, जब भारत कांफिडेंट हो चुका था.....तो शायद ही कोई पूछता...क्या....सचिन क्रिकेट इतिहास के सबसे बेहतरीन बल्लेबाज है??&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-5418796776731398942?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/5418796776731398942/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=5418796776731398942&amp;isPopup=true' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/5418796776731398942'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/5418796776731398942'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/11/blog-post_14.html' title='सचिन ग्रेट हैं..लेकिन जीत का चस्का तो गावस्कर ने लगाया था।'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sv6aTczJQAI/AAAAAAAABzI/k1pShe6oKBA/s72-c/sachin12-large.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-492840052437357301</id><published>2009-11-12T17:08:00.003+05:30</published><updated>2009-11-12T17:14:37.861+05:30</updated><title type='text'>आज तो ख़ुश होगा भाई...!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5403180821645627826" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 300px; CURSOR: hand; HEIGHT: 210px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Svv0VHtkEbI/AAAAAAAABzA/29XVutlrhpg/s320/ed_imgSNN1314AN_119807a.jpg" border="0" /&gt;बिजनेस मैग्जीन फोर्ब्स ने आज दुनिया के 100 ताक़तवर लोगों की सूची जारी कर दी है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा नंबर 1 पर हैं। लेकिन पहली बार अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह और अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद इब्राहीम भी इस लिस्ट में आ गया है। वो भी 50 वें पायदान पर...। यह इसलिए भी आश्चर्यजनक है क्योंकि दाउद, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मात्र 14 पायनान नीचे है। प्रधानमंत्री 36वें नंबर पर हैं। दाउद, मुकेश अंबानी से सिर्फ़ 6 पायदान नीचे है। गौरतलब है कि इस सूची में लक्ष्मी मित्तल और रतन टाटा, दाउद से पिछड़ गए हैं। मित्तल और टाटा क्रमश: 55 वें और 59वें स्थान पर हैं। आज तो ख़ुश होगा भाई..।&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Svvz6BeEYSI/AAAAAAAABy4/p1ccbrhBOls/s1600-h/ed_imgSNN1314AN_119807a.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-492840052437357301?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/492840052437357301/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=492840052437357301&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/492840052437357301'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/492840052437357301'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/11/blog-post_12.html' title='आज तो ख़ुश होगा भाई...!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Svv0VHtkEbI/AAAAAAAABzA/29XVutlrhpg/s72-c/ed_imgSNN1314AN_119807a.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-2122953508674829054</id><published>2009-11-08T16:26:00.005+05:30</published><updated>2009-11-08T17:08:06.430+05:30</updated><title type='text'>गीयर वाला रिक्शा</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SvakCpofruI/AAAAAAAAByo/ZQ_GDw7RaxQ/s1600-h/RICKSHAW.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5401685168519884514" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 313px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SvakCpofruI/AAAAAAAAByo/ZQ_GDw7RaxQ/s320/RICKSHAW.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;मैट्रीक पास करने पर पिताजी ने गीयर वाली साईकल नहीं दिलाई थी। दो दिनों तक रूठा रहा। फिर समय के साथ स्मृतियां धूमिल होती चली गईं। कार ख़रीदने का प्लान कर रहा हूं। गीयर वाली कार...। दोस्तों नें बताया कि गीयर वाली साईकिल से हवाई जहाज को भी पछाड़ सकता हूं। शर्त यह की मेरे अंदर उतनी एनर्ज़ी होनी चाहिए। पटना में साईकिल चलाते वक्त बगल से गीयर वाली साईकल आगे निकल जाती तो मन में एक कुंठा घर जाती...काश! पिताजी ने यह साईकिल दिला दी होती, कम से कम बीच सड़क पर बेटे की नाक तो नहीं कटती। हां, बाकी कार, स्कूटर, बाईक को अपने साईकिल से आगे होता देख रेस लगा लेता, और पटना की तंग सड़कों ने हमेशा आगे रहने में मदद की। प्लान तो टूर द फ्रांस में हिस्सा लेने का भी था। लेकिन हालात और रोजी रोटी नें विचारों का दम कई साल पहले ही घोंट दिया। चलिए कोई ग़म नहीं...। आज अचानक रायपुर में चलने वाली इस रिक्शे पर नज़र चली गई। क्युट कंपनी का आण्डाकार गीयर...। अब रिक्शा भी तेज़ चलेगी। दो बीघा ज़मीन के शंभू महतो का दम भी नहीं निकलेगा। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-2122953508674829054?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/2122953508674829054/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=2122953508674829054&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2122953508674829054'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2122953508674829054'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html' title='गीयर वाला रिक्शा'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SvakCpofruI/AAAAAAAAByo/ZQ_GDw7RaxQ/s72-c/RICKSHAW.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-8363655990465391046</id><published>2009-11-06T03:22:00.004+05:30</published><updated>2009-11-06T03:39:15.369+05:30</updated><title type='text'>वरिष्ट पत्रकार प्रभाष जोशी का निधन..।</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SvNJnNiuSVI/AAAAAAAAByA/xeoAi8Gpv_U/s1600-h/544.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5400741316146383186" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 290px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SvNJnNiuSVI/AAAAAAAAByA/xeoAi8Gpv_U/s320/544.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;15 जुलाई, 1936-05 नवंबर, 2009&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अचानक रात के तीन बजे ऑफ़िस से एक दुखद ख़बर आई। शैलेंद्र नें बताया कि प्रभाष जोशी नहीं रहे। ख़बर फ्लैश करवा दी है। टीवी ऑन किया तो देखा....हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी का निधन हो गया। 73 साल के प्रभाष जोशी को गुरुवार का दिल का दौरा पड़ा। प्रभाष जोशी हिंदी की प्रमुख अख़बार जनसत्ता के कई साल तक संपादक रहे। वो बेबाक पत्रकारिता के लिए मशहूर थे। राजनीति और सामाजिक मुद्दों के अलावा प्रभाष जोशी क्रिकेट पर लेखन के लिए भी मशहूर रहे। हाल के दिनों में ही उन्होंने हिंदी के अख़बारों को चुनाव के दौरान कड़ी फटकार लगाई। मेरा सौभाग्य रहा कि जोशी जी 'अपन' के संस्थान में क्लास लेने आते थे। विराट व्यक्तित्व और शांत चित्त वाले पत्रकारिता के शलाका पुरुष, पंडित प्रभाष जोशी को मेरी भावभीनी श्रद्धांजली।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-8363655990465391046?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/8363655990465391046/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=8363655990465391046&amp;isPopup=true' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8363655990465391046'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8363655990465391046'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/11/blog-post_3459.html' title='वरिष्ट पत्रकार प्रभाष जोशी का निधन..।'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SvNJnNiuSVI/AAAAAAAAByA/xeoAi8Gpv_U/s72-c/544.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-2172998010356964819</id><published>2009-11-06T00:16:00.003+05:30</published><updated>2009-11-06T01:06:58.278+05:30</updated><title type='text'>थरूर साहब...यही तो हक़ीकत है।</title><content type='html'>&lt;p align="center"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SvMlaHbGodI/AAAAAAAABx4/ny1ymayn9tc/s1600-h/tharoor.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5400701508746912210" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 299px; CURSOR: hand; HEIGHT: 99px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SvMlaHbGodI/AAAAAAAABx4/ny1ymayn9tc/s320/tharoor.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-2172998010356964819?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/2172998010356964819/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=2172998010356964819&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2172998010356964819'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2172998010356964819'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/11/blog-post_06.html' title='थरूर साहब...यही तो हक़ीकत है।'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SvMlaHbGodI/AAAAAAAABx4/ny1ymayn9tc/s72-c/tharoor.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-2568638744920616964</id><published>2009-11-01T12:02:00.005+05:30</published><updated>2009-11-01T12:30:46.578+05:30</updated><title type='text'>'सुरसंग्राम' बनाम बिहारी उपराष्ट्रीयतावाद</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Su0rxVO_GRI/AAAAAAAABxY/-HSoN7FeJJA/s1600-h/sursangram.jpg"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5399019654800677138" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 288px; CURSOR: hand; HEIGHT: 232px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Su0rxVO_GRI/AAAAAAAABxY/-HSoN7FeJJA/s320/sursangram.jpg" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;[सुशांत झा, राजीव कुमार] &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;म&lt;/span&gt;हुआ चैनल पर सुरसंग्राम एक अच्छा प्रोग्राम है। नवंबर की 6 तारीख को सुरसंग्राम का फाईनल है जिसमें यूपी के मोहन राठौड़ और बिहार के आलोक पांडे में जबर्दस्त टक्कर होगी। ये टक्कर है दर्शकों के एसएमएस बटोरने का....कि कौन बाजी मारता है। सुरसंग्राम ने अच्छी पहल की है-इसने भोजपुरी गाने का बेहतरीन रुप सामने लाया है जिसमें बिरह की भावना प्रमुख है। इसने भोजपुरी संगीत को अश्लीलता के दायरे से बाहर लाया है जो पिछले सालों में कैसेटों-और सीडियों की बाढ़ में नहाया हुआ था।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;भोजपुरी&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;गानों के इस संग्राम में एक से एक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियां दी-लेकिन अतत: मोहन राठौड़ और आलोक पांडे ही अतिम दो में चुन कर आए। मेरी राय में, बल्कि ज्यादातर निरपेक्ष लोगों की मानें तो मोहन राठौड़ में जो बात है वो आलोक में नहीं। वैसे आलोक की गायिकी भी बेजोड़ है, लेकिन जो भोजपुरिया फील, दर्द और बिरह की अभिव्यक्ति मोहन राठौड़ की आवाज में है उसमें शायद आलोक थोड़ा कमजोर ठहरते हैं। लेकिन अभी तक का जो एसएमएस का रिजल्ट आया है उसमें आलोक पांड़े, मोहन राठौड़ से भारी अंतर से आगे हैं। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;आखिर&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;इसकी वजह क्या है? ऐसा कैसे हो गया ? भोजपुरी भाषाभाषी आबादी की बात करें तो भले ही भोजपुरी का नामकरण भोजपुर के नाम पर हुआ हो लेकिन भोजपुरी भाषी लोगों की संख्या यूपी में बिहार से कुछ ज्यादा है। इसके आलावा यूपी के भोजपुरी भाषी लोगों का पलायन भी बड़े शहरों खासकर मुम्बई में सबसे ज्यादा है। अगर प्रति व्यक्ति आय, साक्षरता, शहरीकरण और मोबाईल धारकों की फीसदी का अनुमान लगाया जाए तो भी यूपी की भोजपुरी आबादी बीस ठहरती है। यूपी के भोजपुरी इलाकों में बनारस, गोरखपुर, इलाहाबाद(लगभग) जैसे बड़े शहर आते है जबकि बिहार के बड़े शहरों में सिर्फ पटना है जिसे पूरे तौर पर भोजपुरी शहर नहीं कहा जा सकता।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5399022968090552002" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 213px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Su0uyMM2ZsI/AAAAAAAABxg/Y1NB1_4ysAQ/s320/wildcard-entry-sur-sangram.jpg" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तो फिर ऐसा क्या हो गया कि बिहार के आलोक पांडे एसएमएस रेस में आगे निकल गए?&lt;/strong&gt; सुरसंग्राम का एसएमएस पोल एक खतरनाक रुझान की तरफ इशारा कर रहा है। यह बताता है कि हाल के सालों में बिहार में क्षेत्रीय भावना किस कदर घर कर गई है। क्या इसे बिहार में पैदा होने वाली नई उपराष्ट्रीयता की भावना मानी जाए या यह वास्तव में एक स्वस्थ प्रतियोगी भावना है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;सुरसंग्राम&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; का यह एसएमएस पोल कई चीजों की ओर इशारा कर रहा है। पहला यह, भोजपुरी भाषा के साथ पूरा बिहार जिस तरह से अपने आपको कनेक्ट कर रहा है शायद पूरा यूपी नहीं। पश्चिमी यूपी के जाटलैंड को गाजीपुर के इस रतन मोहन राठौड़ में शायद कोई दिलचस्पी नहीं है। ऐसा ही शायद ब्रज और बुंदेलखंड में भी है-दरअसल पूरे यूपी में एक यूपी या यूपीबाद या रीजनल फीलिंग का अभाव दिखता है। यूपी अलग-2 खांचे में जीता है जिसकी वजहें इसकी विशालता, आर्थिक विषमता और बड़े स्टेट होने की वजह से एक संतृप्तता की भावना है। ऐसा बिहार में नहीं है, पूरा बिहार चाहे वो मिथिला हो, मगध हो, अंग हो या भोजपुर-अपने आपको एक बिहारी उपराष्ट्रीयता से ग्रस्त पा रहा है। वो आलोक पांडे के साथ खड़ा है। उसमें एक तरह की कम्यूनिटी फीलींग है, वो लगभग ‘घेटो’ की स्थिति में है। इसकी बड़ी वजह बिहार का घनघोर पिछड़ापन और उस वजह से बिहार से बाहर इस सूबे के लोगो का लांछन, अपमान और जिल्लत में जीना है। ये एक कड़वी सच्चाई है जिसकी वजहें बिहार में दशकों से चल रहा भ्रष्ट प्रशासन और कुछ हद तक ऐतिहासिक भौगोलिक परिस्थितियां हैं। बिहार और बिहारीपन सिर्फ संज्ञा नहीं है, बल्कि ये एक सर्वनाम बन चुका है-जिसका मतलब सभी प्रकार के पिछड़े, गरीब और मजदूर लोग होते हैं-भले ही वे किसी भी सूबे से ताल्लुक क्यों न रखते हों।(ये ठीक वैसे ही है जैसे वेस्ट का मतलब अमेरिका हो गया है, भले ही उसका व्यापक मतलब यूरोप और कनाडा भी क्यों न हो)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;दूसरी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; बात जो इस एसएमएस पोल से सामने आई है वो ये कि यूपी से भी आलोक पांडे को तकरीबन 5000 वोट मिले है। ये वे वोट हैं जो यूपी में रहनेवाले अप्रवासी बिहारियों ने आलोक को दिए हैं। जाहिर है, नोएडा, कानपुर, इलाहाबाद, बनारस, अलीगढ, मेरठ और लखनऊ में लाखों की तादाद में प्रवासी बिहारी रहते हैं जिनका सेंटीमेंट यूपी से जुड़ा न होकर बिहार के साथ है। जबकि एक सूबे के तौर पर बिहार चूंकि रोजगार का केंद्र नहीं है इसलिए प्रवासी यूपीवालों की बड़ी तादाद होने का वहां कोई प्रश्न नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;एक&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; बात और जो गौर करने लायक है वो ये कि हाल के दिनों में मुम्बई और दूसरे जगहों पर जो उत्तर भारतीयों के खिलाफ राज ठाकरे के गुंडों के हमले हुए थे उसमें भी उत्तरभारतीय शब्द फेड आउट होता गया और क्रमश: वो बिहारियों के खिलाफ हमला होता गया। जबकि हकीकत ये है कि मुम्बई में बिहारियों की तुलना में यूपीवालों की तादाद कई गुना ज्यादा है। जाहिर है, बिहारियों को पोलराईज करने में इन चीजों ने अप्रत्यक्ष रुप से ज्यादा योगदान दिया है। हाल के सालों में छठ के अवसर पर जिस तरह की दीवानगी देखने को मिली है वह एक सूबे के तौर पर ब्रांड बिहार और छठ के इमेज को ब्लर करता हुआ प्रतीत होता है-जिसकी अवहेलना बिहार का कोई भी मुख्यमंत्री नहीं कर सकता। छठ के मौके पर बिहार के मुख्यमंत्री का घाटों का परीक्षण करना उसी तरह फैशनेवल होता जा रहा है जिस तरह से नेताओं का इफ्तार में शामिल होना! बहुत संभव है आनेवाले वक्त में ऐसा दिल्ली-मुम्बई में भी दिखे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;एक&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; दूसरे नजरिये से देखें तो ये बिहार के लोगों का ‘खोल’ में सिमटने जैसा है, उनका ‘घेटोआईजेशन’ हुआ है। जो समाज कभी इतना उदार था कि थोक के भाव में गैर-बिहारी नेताओं को लोकसभा में चुनकर भेजता था उसके लिए ये संकेत बहुत खतरनाक और शर्मनाक स्थिति हो सकती है। एक सूबे के तौर पर ये बिहार के पतन की एक और सीढ़ी मानी जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5399025819926878594" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 213px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Su0xYMHnWYI/AAAAAAAABxo/lDeM8aLv5CE/s320/sursnagram-mahuaTV.jpg" border="0" /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;लेकिन&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;ये स्थिति एक दुधारी तलवार जैसी भी है। इसके फायदे भी हैं और नुकसान भी। फायदा ये हो सकता है कि बिहार की जनता जातीय भावना से ऊपर उठकर एक ‘पूरे बिहार’ के लिए भविष्य में प्रयास कर सकती है और भ्रष्ट राजनेताओं को सबक सिखा सकती है-ऐसा हाल तक नहीं देखने में मिला है जैसा बंगाल, तमिलनाडू या पंजाब में देखने को मिलता है। लेकिन इसका स्याह पक्ष ये है कि बिहार की जनता अखिल भारतीय रंगमंच पर क्रमश संकीर्ण हो सकती है और ज्यादा प्रतिक्रियावादी भी। वो पिछड़ेपन और असुरक्षा के माहौल में हर जगह और हर वक्त अपना ‘बिहारीपन’ अपने कलेजे से चिपकाए चलते रहने को मजबूर भी हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;बहरहाल,&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; इस विमर्श से अलग महुआ चैनल की प्रोगामिंग भी सवालों के घेरे में आते हैं। टीआरपी के चक्कर में प्रायोजित और भड़काऊ किस्म के बाईट कहां तक उचित हैं जो सरेआम क्षेत्रीय भावना उभाड़ते हैं? सरकार के लिए इस किस्म के प्रोग्राम भले ही मामूली हों लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि ऐसे ही ऋतिक रोशन के एक कथित बाईट के चलते कुछ सालों पहले नेपाल-भारत के रिश्तों में कड़वाहट घुल गई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;मुद्दे&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; पर लौटते हुए यहीं कहा जा सकता है कि ऐसी हालत वाकई एक सूबे के तौर पर बिहार के लिए ठीक नहीं होगा-जिसे देश के दूसरे हिस्सों में अपनी इस नस्लवादी-क्षेत्रवादी भावना के चलते अलग-थलग होना पड़ सकता है और कई फायदों से वंचित भी। दरअसल, बिहार की जनता का जो गुस्सा और आक्रोश बिहार की नेताओं के खिलाफ सामने आना चाहिए वो लगभग एक कुंठा के रुप में बिहारी उपराष्ट्रीयतावाद का रुप लेती जा रही है-जो चिंता की बात है। बिहार के नेताओं, युवाओं और बुद्धिजीवियों को इस विषय पर गंभीरता से सोचने की जरुरत है। &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:arial;font-size:78%;color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;© jhasushant\mahuatv.com\01-11-09\del&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-2568638744920616964?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/2568638744920616964/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=2568638744920616964&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2568638744920616964'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2568638744920616964'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='&apos;सुरसंग्राम&apos; बनाम बिहारी उपराष्ट्रीयतावाद'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Su0rxVO_GRI/AAAAAAAABxY/-HSoN7FeJJA/s72-c/sursangram.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-8816901401870527325</id><published>2009-10-28T21:42:00.002+05:30</published><updated>2009-10-28T21:43:50.039+05:30</updated><title type='text'>62 साल बाद....</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Suhtj31P-4I/AAAAAAAABxI/ESQpw77YoNc/s1600-h/Harasdfisdf123444-large.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5397684616453684098" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 262px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Suhtj31P-4I/AAAAAAAABxI/ESQpw77YoNc/s320/Harasdfisdf123444-large.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt; ये तो होना ही था....!&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-8816901401870527325?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/8816901401870527325/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=8816901401870527325&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8816901401870527325'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8816901401870527325'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/10/62.html' title='62 साल बाद....'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Suhtj31P-4I/AAAAAAAABxI/ESQpw77YoNc/s72-c/Harasdfisdf123444-large.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-646315624409244424</id><published>2009-10-28T00:58:00.004+05:30</published><updated>2009-10-28T01:10:09.796+05:30</updated><title type='text'>आह हिंदी! वाह अंग्रेज़ी!!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SudKKNyfd3I/AAAAAAAABw4/6RsH-6e3270/s1600-h/S6301837.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5397364217787414386" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 240px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SudKKNyfd3I/AAAAAAAABw4/6RsH-6e3270/s320/S6301837.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;सुशांत झा। मिथिला में जन्‍म। आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई। जुझारू युवा पत्रकार। आंदोलनी विरासत।&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;---------------------------------------------------&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;साल 2004, अगस्त की दूसरी तारीख। दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान के ऑडिटोरियम में हम हिंदी मीडियम वाले दबे-कुचले, दलित और पिछड़ों की तरह खड़े थे – अंग्रेज़ी वाले चुहलबाजी, मस्ती, उछलकूद और उन सारे कामों में लगे थे, जो ये एहसास दिला रहा था कि देश के असली मालिकान वहीं हैं। उसके बाद की घटनाओं ने हमें हिंदी, इसकी अहमियत, इसकी ज़रूरत, देश के तंत्र में हिंदी की उपयोगिता आदि विषयों पर इतने एंगिल से सोचने पर मजबूर किया कि हमें लगने लगा कि वास्तविक दलित तो हमीं हैं जो हिंदी पढ़ के आये हैं। हमारे कई हिंदीदां दोस्तों ने हमें गालियां दी कि साले खाते हिंदी का हो और गाते अंग्रेज़ी की हो – लेकिन हमने उसके बाद दीवानावार अंग्रेज़ी सीखी और कामचलाऊ ढंग की सीख ली। हमारे दोस्तों ने मजाक उड़ाया कि हिंदी को तुमने छोड़ दिया, और अंग्रेज़ी ने तुम्‍हें कभी अपनाया नहीं। बहरहाल, दिमाग का पलड़ा अंग्रेज़ी के फेवर में झुक चुका था। दिल में हिंदी थी, उसी तरह जैसे मां होती है… लेकिन दिमाग में अंग्रेज़ी आ चुकी थी जैसे किसी कुंवारे के लिए बीवी की कल्पना होती है।&lt;br /&gt;हमने पाया कि क्लास में हिंदी के बच्चे ज़्यादा ज़हीन थे, वे ज़्यादा इंफार्म्ड थे, उनका जीके दुरुस्त था, लेकिन कम्यूनिकेशन में वे मात खा जाते थे। उनमें एक हीन भावना थी। प्रोफेसर और गेस्ट लेक्चरर भी अंग्रेज़ी वालों से ज़्यादा बात करते, उनसे ज़्यादा फेमिलियर होते जबकि उनमें से कइयों को ये पता नहीं था राजस्थान देश के नक्शे पर किधर है। प्रेम से लेकर नौकरी तक हर जगह अंग्रेज़ी वाले सफल थे। क्लास में टाप एक हिंदी वाले ने किया था लेकिन सबसे बेहतरीन नौकरी अंग्रेज़ी वालों को मिली थी। हमें हमारी औकात का एहसास करा दिया गया था।&lt;br /&gt;हमने कसम खायी कि शादी करने की कोशिश अंग्रेज़ी वाली लड़की से ही करेंगे (मेरे एक-आध दोस्त इसमें कामयाब भी हो गये) ताकि जेनरेशन सुधर जाए और अपने होनेवाले एकमात्र बच्चे को अंग्रेज़ी में पढ़ाएंगे। मुझे लगा कि मैं पहला बंदा हूं, जो ये कसम ले रहा है – बाद में पता चला कि देश के तमाम हिंदी पत्रकार सालों और दशकों पहले ये कसम खा चुके हैं।&lt;br /&gt;हर सप्ताह अपने दोस्तों के साथ होनेवाली मीटिंग में हम अपने सूबे के तमाम मुख्यमंत्रियों को गालियां देते रहे कि उन्होने क्लास वन से हमें अंग्रेज़ी क्यों नहीं पढ़ाया। अपने पिता से हम कई बार झगड़े कि जिंदगी भर दिल्ली-पटना का चक्कर लनाने के बावजूद उन्‍हें इतनी समझ क्यों नहीं आयी। हमें नार्थ-इस्ट और साउथ से आनेवाले अपने सहपाठियों से ईर्ष्या होने लगी कि उनकी अंग्रेज़ी अच्छी क्यों है। हमने लालू, मुलायम और लोहिया (जी) को भी गाली दी कि वे क्यों हिंदी की माला जाप रहे हैं। हमें लगा हमारे पिछड़ेपन की एकमात्र वजह यहीं है कि हम अंग्रेज़ी में कमजोर हैं। गुस्सा और हताशा के उन क्षणों में हमने एक ही साथ न जाने कितने विमर्श कर डाले – गरीब-अमीर, हिंदी-अंग्रेज़ी, शहर बनाम गांव बनाम छोटा शहर बड़ा शहर बनाम कल्चरल इंपेरियलिज्म, उत्तर बनाम दक्षिण बनाम नार्थ ईस्ट बनाम इंडिया – चाइना बनाम न जाने क्या-क्या। यहां उन बातों की चर्चा इस लेख को इंटरनेट पर उबाऊ बना सकती है।&lt;br /&gt;लेकिन एक दूसरा थॉट प्रोसेस भी चल रहा था। मन तो हिंदी पढ़ के ही खुश होता था। होरी महतो और शनिचरा जिस तरीके से दिल को छूता था, ससुरा सिडनी सेल्डन कभी नहीं छू पाया। न जाने बचपन से कितनी शायरी ‘कादंबिनी’ से चुराकर हमने अपने डायरी में लिख रखी थी। सोचा था कि अपनी होनेवाली &lt;a href="http://mohallalive.com/2009/10/21/mrinal-vallari-memoirs-about-ddlj/"&gt;‘सिमरन’&lt;/a&gt; को सुनाऊंगा। कभी-कभी कभार कोई लेख पढ़ कर जोश में आ जाता कि हिंदी ‘फैल’ रही है, अब तो बंगलोर के चायवाले भी बोलते हैं और सीईओ भी। (ये बाद में पता लगा कि सीईओ किस्म के लोग पत्रकारों द्वारा रिक्वेस्ट करने पर ही हिंदी में बाइट देते हैं या कृपा कर रहे होते हैं) टीवी, सिनेमा, अखबार, अनुवाद, वायसओवर – हर जगह नये स्कोप खुल रहे हैं। कभी-कभी ख्वाब देखता कि गुलज़ार, जावेद अख्तर, सलीम खान, लालू-मुलायम-अमर सिंह को भी तो काम चलाऊ अंग्रेज़ी ही आती है तो हम क्यों नहीं आगे बढ़ सकते? एक दोस्त ने कहा कि प्रसून जोशी भी हिंदी मीडियम के ही थे। बाद में अंग्रेज़ी सीख ली – अंग्रेज़ी में क्या रखा है – ये बातें तसल्ली देती थीं। हमारे संस्थान के एक प्रोफेसर ने कहा कि दीपक चौरसिया भी तो अंग्रेज़ी में कमजोर थे – दिल खुश हो गया कि दीपक तो बन ही सकते हैं। लेकिन हमें ये मालूम नहीं था कि हम अनुवादक भर रह जाएंगे और सारा ऑफिसियल काम अंग्रेज़ी में करना पड़ेगा। हमें बहुत लेट से ये पता चला कि इस देश में ऑडियो-वीडियो मीडियम भले ही देशी भाषाओं में ज़्यादा चले लेकिन उसका भी आफिसियल काम सारा अंग्रेज़ी में ही होता है। जहां तक छपने वाली भाषा का सवाल है, तो शायद आनेवाले सौ सालों में सारा कामकाज, अध्ययन, रिसर्च और पत्राचार अंग्रेज़ी में ही हो। मेरी ये पंक्ति भयंकर विवाद को जन्म दे सकती है जिसका मैं इंतजार कर रहा हूं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, जोश और जुनून के उन्‍हीं पलों में हमने अपने ब्‍लॉग पर हिंदी के महिमामंडन में एक सिरीज की कल्पना की कि कैसे हिंदी देश में अपना उचित स्थान पा सकती है। उस आइडिया को अतिरंजित करते हुए हमने अपने ब्लाग पर एक सीरीज लिख मारी कि कैसे मरेगी अंग्रेज़ी। कई लोगों ने सराहा, कइयों ने सहानुभूति दिखाते हुए शुभेच्छा व्यक्त की!&lt;br /&gt;पिछले दिनों कई लेखकों को पढ़ा तो एक भाव जो उनमें समान था वो ये कि अंग्रेज़ी दलितों के लिए तारणहार हो सकती है। मुझे लगा कि इस स्तर पर तो दलित मैं भी हूं। मेरे भोगे हुए यथार्थ की झलकियां उसमें दिखायी दी। हमें लगा कि जब कोई अंग्रेज़ी बोलता है, तो हम उसकी जाति की कल्पना भी नहीं करते कि वो वर्मा है या शर्मा। वह एक संभ्रांत वर्ग का होता है, अक्सर प्रभु वर्ग का। अंग्रेज़ी बोलने वाला प्राणी इस देश का असली ब्राह्मण है, जो सिर्फ एक भाषा सीखकर अपने बैंकग्राउंड की तमाम कमियों को छुपा सकता है, अपने इतिहास को बदल सकता है और सिस्टम को सिर के बल खड़ा कर सकता है!&lt;br /&gt;हमने इतिहास खंगाला, हमने भाषाई आंदोलन, हिंदी विरोध, द्रविड़ आंदोलन, हिंदी-ब्राह्मण विरोधी आंदोलन सब कुछ चाट लिया। बचपन में लोहियाजी की पंक्तिया अक्सर गुदगुदाती थीं – कि हिंदी वो भाषा है जिसमें असम के चाय बगान में काम करने वाला बिहारी मजदूर एक उड़िया मजदूर से बात करता है। लेकिन व्यावहारिक जीवन में लोहियाजी हवा हो गये और मैकाले ज़्यादा मुफीद लगे। रेलवे स्टेशनों पर इंदिरा गांधी की उक्ति कि हिंदी ही वो भाषा है जो पूरे देश को एक सूत्र में बांध सकती है – अब मजाक लगने लगा था।&lt;br /&gt;हमने महसूस किया कि आज़ादी के बाद ही जब हम हिंदी के नाम पर आमराय नहीं बना पाये तो अब 21वीं सदी में इसकी संभावना बहुत मुश्किल लग रही है। अंग्रेज़ी का पिछले तीन सौ सालों का ढांचा इतना मज़बूत है जितना शायद ब्राह्मणवाद भी नहीं। जो लोग चीन, कोरिया और जापान का उदाहरण देते हैं उन्‍हें ये बात याद रखनी चाहिए कि उन देशों के हालात हमारे यहां से बिल्कुल उलट हैं। न तो मंदारिन या कोरियन की तरह हिंदी कभी 90 फीसदी लोगों की भाषा थी न ही नेहरुजी उसे पूरे देश पर थोप सकते थे। अगर हिंदी आज़ादी के बाद से ही पूरे देश की पहली भाषा होती, जिसमें तकनीक से लेकर प्रशासन तक के सारे काम होते, तो अभी तक हम इसे वाकई मजबूत बना लेते लेकिन क्या ऐसा हो पाया या हालात ने ऐसी इजाज़त दी?&lt;br /&gt;ऐसे हालात में, अब लकीर पीटने का कोई फायदा नहीं। हमें इस बात को स्वीकार कर लेना चाहिए कि अगर कारोबार, रोज़गार और रिसर्च में अंग्रेज़ी ही चलनी है तो दलितों को, पिछड़ो को, सवर्णों को अवर्णों को – हर किसी को पागल की तरह अंग्रेज़ी सीखनी चाहिए। हां, इसके साथ ही साथ हिंदी को और भी आसान, व्यावहारिक और रोज़गारपरक बनाने का कोई सुझाव आये तो उसे स्वागत करने में कोई दिक्‍कत नहीं।&lt;br /&gt;COURTSEY: MOHALLA LIVE&lt;br /&gt;FOR COMMENTS ON THIS ARTICLE: &lt;a href="http://mohallalive.com/2009/10/27/sushant-jha-writeup-on-hindi-english-debate/"&gt;http://mohallalive.com/2009/10/27/sushant-jha-writeup-on-hindi-english-debate/&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-646315624409244424?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/646315624409244424/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=646315624409244424&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/646315624409244424'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/646315624409244424'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/10/blog-post_28.html' title='आह हिंदी! वाह अंग्रेज़ी!!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SudKKNyfd3I/AAAAAAAABw4/6RsH-6e3270/s72-c/S6301837.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-2731445073177009873</id><published>2009-10-19T02:30:00.001+05:30</published><updated>2009-10-26T18:35:40.259+05:30</updated><title type='text'>बैलों का त्योहार..!</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/StuCc92gI_I/AAAAAAAABwY/gv05Khh_Rkk/s1600-h/PAVAN.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5394048412857410546" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 242px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/StuCc92gI_I/AAAAAAAABwY/gv05Khh_Rkk/s320/PAVAN.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt; दरअसल यह मनुष्यों का नहीं बैलों का त्योहार है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-2731445073177009873?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/2731445073177009873/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=2731445073177009873&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2731445073177009873'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2731445073177009873'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/10/blog-post_19.html' title='बैलों का त्योहार..!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/StuCc92gI_I/AAAAAAAABwY/gv05Khh_Rkk/s72-c/PAVAN.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-6828807226623180051</id><published>2009-10-08T17:50:00.003+05:30</published><updated>2009-10-08T17:58:31.544+05:30</updated><title type='text'>मून स्ट्रक</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Ss3au4wr2cI/AAAAAAAABvo/nWZRIVjBzN0/s1600-h/karwachauth.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5390204828077775298" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 245px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Ss3au4wr2cI/AAAAAAAABvo/nWZRIVjBzN0/s320/karwachauth.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;शाम समय इक ऊंची सीढ़ियों वाले घर के आंगन में,&lt;br /&gt;चांद को उतरे देखा हमने चांद भी कैसा पूरा चांद!&lt;br /&gt;इंशाजी इन चाहने वाली, देखने वाली आंखों ने&lt;br /&gt;मुल्कों-मुल्कों, शहरों-शहरों , कैसा-कैसा देखा चांद?&lt;br /&gt;हर इक चांद की अपनी धज थी, हर इक चांद का अपना रूप.....&lt;br /&gt;लेकिन ऐसा रोशन-रोशन, हंसता बातें करता चांद?&lt;br /&gt;दर्द की टीस तो उठती थी पर इतनी भी भरपूर कभी?&lt;br /&gt;आज से पहले कब उतरा था , दिल में इतना गहरा&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;चांद!&lt;br /&gt;हमने तो किस्मत के दर से जब पाए अंधियारे पाए...&lt;br /&gt;यह भी चांद का सपना होगा, कैसा चांद , कहां का चांद?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#333399;"&gt;इब्ने इंशा&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-6828807226623180051?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/6828807226623180051/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=6828807226623180051&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/6828807226623180051'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/6828807226623180051'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/10/blog-post_08.html' title='मून स्ट्रक'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Ss3au4wr2cI/AAAAAAAABvo/nWZRIVjBzN0/s72-c/karwachauth.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-2255648688743107402</id><published>2009-10-02T15:06:00.004+05:30</published><updated>2009-10-02T19:31:03.865+05:30</updated><title type='text'>ख़ैर, आप क्या सोचते हैं???</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5387935439836615058" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 322px; CURSOR: hand; HEIGHT: 186px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SsXKvGwzEZI/AAAAAAAABu4/9QWhwmxO240/s320/Tharoor.bmp" border="0" /&gt;शशि थरूर फिर से विवादों में आ गए हैं। गांधी जयंती पर एक सभा को संबोधित करते हुए शशी ने हमारी दुखती रग पर हाथ रख दिया। आलसी तो हम स्वभाव से हैं ही....कितनी भी छुट्टी मिले, हमें अक्सर शिकायत ही रहती है। सरकारी नौकरी का सबसे बड़ा फ़ायदा छुट्टी ही तो है। इधर प्राईवेट मल्टीनेशनल नें हमें कुछ तेज़ तो बनाया है, लेकिन सब मजबूरी है। मौका मिले तो हम साल भर हॉली डे मनाते रहें..। एक तो हमारे यहां त्योहारों की संख्या इतनी है कि महीने में 2-3 तीन एक्स्ट्रा छुट्टी मिल जाती है...फिर दशहरा, होली, समर वेकेशन सब को जोड़ दें तो पूरे साल में हम 200 से ज्यादा दिन काम नहीं करते। ऐसे में शशि के विचार सोचने को मजबूर करते हैं। गांधी जयंती नेशनल हॉली डे नहीं, नेशनल वर्क डे होना चाहिए....आज गांधी ज़िंदा होते तो शायद यही करते..। आप क्या सोचते हैं???? क्या गांधी जयंती नेशनल हॉली डे होना चाहिए????? ऐसे मैं अभी दफ़्तर से ब्लॉग कर रहा हूं....ये भी ग़लत है। यहां मेरे आस-पास इस विषय को लेकर भारी वाद-विवाद चल रहा है। सौरव कह रहा है कि अगर गांधी जयंती नहीं हो तो गांधी लोगों की स्मृति से गायब हो जाएंगे। अभिलाषा मानती हैं कि शशि ग़लत हैं....छुट्टी होनी चाहिए, अमित शशि के समर्थन में हैं....राहुल शशि की बातों से इत्तेफ़ाक नहीं रखते...। &lt;strong&gt;ख़ैर&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;आप क्या सोचते हैं???&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;span style="font-family:arial;font-size:78%;color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;© rajivkmishra\02\10\09-tvtn-ht&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-2255648688743107402?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/2255648688743107402/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=2255648688743107402&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2255648688743107402'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2255648688743107402'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='ख़ैर, आप क्या सोचते हैं???'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SsXKvGwzEZI/AAAAAAAABu4/9QWhwmxO240/s72-c/Tharoor.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-5648723203331963490</id><published>2009-10-01T03:10:00.002+05:30</published><updated>2009-10-01T03:18:50.599+05:30</updated><title type='text'>60 का हुआ ड्रैगन...</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SsPRdoIr9wI/AAAAAAAABuo/v7NDVuyD4tA/s1600-h/china+pix.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5387379886185510658" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 162px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SsPRdoIr9wI/AAAAAAAABuo/v7NDVuyD4tA/s320/china%2Bpix.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;आज दुनिया की नज़र बीजिंग पर टिकी होगी। ड्रैगन अपनी शक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन करेगा। इस वक्त का इंतज़ार चीन वर्षों से कर रहा था। नई दिल्ली से वॉशिंगटन तक सरकारें सांस थामकर चीन के ताक़त का दीदार करेंगी। ऐसा भव्य समारोह दुनिया पहली बार देखेगी। और इसे सफ़ल बनाने के लिए चीनी सरकार ने कोई भी कसर बाकी नहीं छोड़ी है। चीनी सेना की 66 मिनट की ये परेड भले ही प्रतीतात्मक हो लेकिन दुनिया के लिए संदेश स्पष्ट है। चीन मंच पर आ चुका है...। दुनिया मुगालते में न रहे....ड्रैगन यही संदेश दे रहा है। अब से कुछ ही देर में, चीन एक भव्य समारोह के साथ विश्व मंच पर अपने आगमन की घोषणा करेगा। &lt;p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;बीज़िंग की सड़को पर सन्नाटा पसरा है। कुछ सुनाई दे रहा है तो वो चीनी सेना के जूतों की टाप, सेना की टैंकों की घड़घड़ाहट...बीज़िंग के आसमान का सीना चीरती जंगी जहाजों का शोर...। पूरे चीन में मोबाईल फ़ोन के रिंगटोन और कॉलर ट्यून को बदल दिया गया है। राष्ट्र गान के अलावा कुछ भी सुनना अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया है। कल वहां आप तालाक भी नहीं ले सकते...। पतंग, कबूतर का दीदार महीनों से बीज़िंग की आसमान में नहीं हुआ है। यहां तक की मच्छर, चूहे भी अपनी बिल से बाहर नहीं निकल सकते.... मेहमान रात में किसी के घर पर नहीं ठहर सकते। होटल और गेस्ट हाऊस की गेट पर ताला जड़ दिया गया है। इंटरनेट और नेटवर्किंग साईट्स ब्लॉक है....। दमन, सेंसरशिप, मानवाधिकार हनन, सब का सहारा लिया जा रहा है। कम्युनिस्ट चीन ने बीज़िग से भिखारियों और बेघर लोगों को तड़ीपार कर दिया है। परेड में हिस्सा ले रहे सैनिकों की तैयारी का अंदाजा इसी बात से लगया जा सकता है कि वे 40 सकेंड में सिर्फ़ एक बार पलक झपका सकते हैं। मीडिया सेंसरशिप का आलम तो यह है कि वे सिर्फ़ 20 प्रतिशत नकारात्मक ख़बर दिखा सकते हैं। 52 नए हथियार पहली बार दुनिया देख सकेगी....। आख़िर चीन ये सब क्यों कर रहा है??? कहीं इसमें असुरक्षा की भावना तो नहीं......संभव है, जहां एक तरफ पूरी दुनिया धीरे-धीरे पुंजीवादी व्यवस्था की ओर बढ़ रही है शायद चीन ऐसे में अपनी कम्युनिस्ट व्यवस्था की प्रासंगिकता दिखलाना चाह रहा हो....।।।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-5648723203331963490?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/5648723203331963490/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=5648723203331963490&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/5648723203331963490'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/5648723203331963490'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/10/60.html' title='60 का हुआ ड्रैगन...'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SsPRdoIr9wI/AAAAAAAABuo/v7NDVuyD4tA/s72-c/china%2Bpix.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-6865595368726543105</id><published>2009-09-28T10:17:00.003+05:30</published><updated>2009-09-28T10:22:49.479+05:30</updated><title type='text'>बाबा नीलकंठ के ऑनलाईन दर्शन</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5386375901655703746" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 238px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SsBAWCTpoMI/AAAAAAAABuU/1_Oc9CzJuJI/s320/roller.jpg" border="0" /&gt;आज विजयादशमी है।&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;विजयदशमी के दिन नीलकंठ पक्षी को देखना शुभ माना जाता है। नीलकंठ पक्षी सुंदर और उसका गला नीला होता है, इसी कारण उसे नीलकंठ कहा जाता है। इस पक्षी में लोग विषपायी शिव के दर्शन करते हैं। नीलकंठ! आपको नमस्कार है।&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;पर्यावरण के परिवर्तन का प्रभाव मनुष्यों के साथ-साथ अन्य वन्य जंतुओं पर भी पड़ने लगा है। दिल्ली जैसे शहर में नीलकंठ के दर्शन तो मुश्किल ही है। इसलिए ऑनलाईन दर्शन से ही काम चला लिया जाए....मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय निकले विष को संसार के कल्याणार्थ भगवान शिव ने पान किया था। हालांकि उन्होंने विष को कंठ में ही रोक लिया था इससे उनका कंठ नीला पड़ गया। बाद में वे नीलकंठ पक्षी के रूप में भी लोगों को दर्शन देने लगे। यही वजह है कि इस पक्षी का कंठ पूर्णत: नीला होता है। त्रेता युग में भगवान श्रीराम ने नीलकंठ के दर्शन के पश्चात ही रावण का वध किया था। तभी से विजयादशमी के दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन को शुभ माना जाता है। &lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;span style="font-family:arial;font-size:78%;color:#000066;"&gt;&lt;strong&gt;©rajivkmishra\indianroller-del\28\09\09&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-6865595368726543105?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/6865595368726543105/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=6865595368726543105&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/6865595368726543105'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/6865595368726543105'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/09/blog-post_28.html' title='बाबा नीलकंठ के ऑनलाईन दर्शन'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SsBAWCTpoMI/AAAAAAAABuU/1_Oc9CzJuJI/s72-c/roller.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-7264139506224902755</id><published>2009-09-27T20:06:00.004+05:30</published><updated>2009-09-27T20:12:18.082+05:30</updated><title type='text'>ये ब्लॉग देगी ऐसी ख़बरें जो नजरों से चूक जाती है....</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://newsatlarge.blogspot.com/"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5386156760036772978" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 235px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sr95CUKPjHI/AAAAAAAABs4/iI3oB-pxYxw/s320/news+at+large.JPG" border="0" /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;‘न्यूज एट लार्ज’&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; एक कोशिश है ऐसी खबरों को आम लोगो तक पहुंचाने की जो अमूमन हमारी-आपकी नजरों से छूट जाती है। इस ब्लाग पर ऐसी खबरे होंगी जो अजीबो-गरीब हो सकती है और इसे दुनिया भर के साईटों और दूसरे स्रोतों से एकत्र किया जाएगा। दरअसल ये विचार मेरे मन में तब आया जब मैने देखा कि जो काम प्रोफेशनल स्तर पर कर रहा हूं उसका पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता। मैने सोचा कि क्यों न इसे एक ब्लाग की शक्ल में आम लोगों, अखबारों, पत्रिकाओं, चैनलों और वेबसाईटों तक पहुंचाया जाए। इसमें मुझे आप सब लोगों के सहयोग, प्रोत्साहन और शुभेच्छा की जरुरत है। &lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;URL: &lt;a href="http://newsatlarge.blogspot.com/"&gt;http://newsatlarge.blogspot.com/&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:arial;font-size:78%;color:#000066;"&gt;&lt;strong&gt;© newsatlarge\del\27\09\09&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-7264139506224902755?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/7264139506224902755/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=7264139506224902755&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/7264139506224902755'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/7264139506224902755'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/09/blog-post_27.html' title='ये ब्लॉग देगी ऐसी ख़बरें जो नजरों से चूक जाती है....'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sr95CUKPjHI/AAAAAAAABs4/iI3oB-pxYxw/s72-c/news+at+large.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-7529455307843587103</id><published>2009-09-25T03:01:00.009+05:30</published><updated>2009-09-28T07:31:02.640+05:30</updated><title type='text'>तो, अब कोई नहीं मरेगा...!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5385149885515620498" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 227px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SrvlSgRk4JI/AAAAAAAABrk/a6DJxCnu4l4/s320/BrandonRouthasSuperman.jpg" border="0" /&gt;&lt;strong&gt;‘मृत्यु ही सत्य है, जीवन एक पड़ाव मात्र है।‘&lt;/strong&gt; ट्युशन से लौटते वक्त पटना के बांस घाट में लिखे ये शब्द मुझे परेशान करते रहे। साईकिल रोक कर रोज-रोज इस लाईन को पढ़ता। सच कहूं तो ज़िंदगी से विरक्ति होने लगी थी। पटना में गंगा किनारे घर से कुछ ही दूर पर शव-दाह गृह है। इसे संयोग कहिए या कुछ और घर से कुछ ही दूर पर पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पीटल भी है। बचपन से हज़ारों लाशों को हॉस्पीटल के पोस्टमार्टम तक आते देखा है। कभी सिर में गोली लगी लाश, कभी ट्रक के नीचे आकर हुआ मृत शरीर, करेंट से मौत, गंगाजी में डूबने से मौत, 2001 में पटना एयर क्रेश में मरे 60 लोगों की लाश हो या फिर जहानाबाद के लक्ष्मणपुर बाथे या बारा जैसे नरसंहार। लाशों को पटना ही लाया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पढ़ने-लिखने में ठीक-ठाक ही था। लेकिन इन लाशों को देखकर मन में एक विरक्ति घर कर गई थी। हल्की भाषा में कहूं तो धीरे-धीरे मन में ये बात बैठने लगी थी, “पढ़तंग तो भी मरतंग, न पढ़तंग तो भी मरतंग...तो काहे को पढ़तंग”। जब एक दिन मर ही जाउंगा तो, पढ़ लिख कर क्या होगा। पलायनवादी मानसिकता कह सकते हैं। ख़ैर, ये तो थी मौत की बात....अब जीवन की कहानी।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SsAYgAZN8lI/AAAAAAAABto/Qizn2Sc3dZM/s1600-h/sciencekids_1363475c.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5386332092475765330" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SsAYgAZN8lI/AAAAAAAABto/Qizn2Sc3dZM/s320/sciencekids_1363475c.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;दरअसल डेली टेलिग्राफ़ में छपी एक ख़बर ने थोड़ा विस्मृत कर दिया है। ख़बर है कि 20 साल बाद मनुष्य अमर हो जाएगा। यह दावा है रे कुर्जविल का। 61 वर्षिय कुर्जविल जाने-माने वेज्ञानिक भविष्यवेत्ता हैं। अपने इस दावे के पक्ष में कुर्जविल ने कई तर्क भी दिए है। उनका मानना है कि जिस रफ़्तार से मानव विज्ञान तरक्की कर रही है, मौत पर 20 वर्षों में काबू कर लिया जाएगा। बात कुछ हद तक सच भी है। कुर्जविल नैनो-तकनीक की बात करते हैं। कहते हैं, कुछ ही वर्षों में वैज्ञानिक हरेक महत्वपूर्ण अंगों का कृत्रिम विकास कर लेंगे। वो चाहे फेंफरा हो, किडनी हो, त्वचा हो, हृदय हो...सबकुछ। रक्त कोशिका के जगह नैनो-ट्बुयल्स आ जाएंगे। दिमाग कंप्युटर से संचालित होगा...और भी बहुत कुछ।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;अगर यह दावा सच हो जाए तो क्या होगा। 25 साल के भीतर हम एक साँस में हज़ार मीटर वाली ओलंपिक रेस दौड़ सकेंगे, बिना ऑक्सीजन के चार घंटों तक स्कूबा डायविंग कर सकेंगे। क़िताब के लाखों पन्ने हमारी जुबान पर होगी। मिनटों में हम किताब लिख सकेंगे। गणित का भय हमें नहीं सताएगी....और भी बहुत कुछ ऐसा जो शायद आज हमारी सोच-समझ की सीमाओं से परे है।&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;हलांकि कुर्जविल का यह दावा सैद्धांतिक है, लेकिन मुझे इसमें दम लगता है। आज से 25-30 वर्ष पहले तक टीवी होना मौत की गारंटी थी। आज यह सर्दी से ज्यादा कुछ भी नहीं है। चुटकी में इलाज़। कृत्रिम हृदय, फेंफरा, किडनी सबकुछ बाज़ार में उपलब्ध है। आज ही एड्स के टीके का सफ़ल परिक्षण हुआ है। कैंसर जैसी बिमारियों का इलाज कुछ सालों में आ जाएगा। पेसमेकर हर्ट को संचालित करने लगा है। यहां तक कि आने वाले समय में सेक्स भी वर्चुअल हो जाएगा। हम साईबार्ग हो जाएंगे....साईबर मैन...। हॉलीवुड की फ़िल्मों में दिखने वाला साईबार्ग हक़ीकत की धरती पर आ जाएगा। इंसान सुपर-मैन होगा, जिसकी ताक़त और समझ की विस्तार असीमित होगी।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;अगर कुर्जविल के दावे पर यकीन कर लें तो भी कई ऐसी बातें हैं जो मेरी समझ में अभी से नहीं आ रही है। ये मन जो है उसका क्या होगा, और प्यार...वो कहां से आएगा। भावनाएं होंगी या नहीं, अगर हम मरेंगे नहीं तो हमारी धरती पर रहने के लिए जगह कहां से आएगा। क्या चंद्रमा पर कॉलोनी सचमुच बस जाएगी। क्या तब भी राजीव की मां पटना से रोज़ फोन कर कुशल-क्षेम पूछेंगी, क्या पापा तब भी समझाने आएंगे....और नैतिकता....इस नैतिकता का पैमाना क्या होगा....????? क्या चांद तब भी हमें प्यारा लगेगा? ठंडी हवाएं तब भी हमारे अंदर सिहरन पैदा करेगी...क्या किसी की आंखों में तब भी हम डूबेंगे???? उस व्यवस्था में भगवान का क्या रोल होगा??? कितने ही तो सवाल हैं....लेकिन कोई जवाब नहीं। ऐसे भी भविष्य की गर्भ में झांकना रॉकेट विज्ञान से कम मुश्किल नहीं रहा है। देखते हैं 2030 दूर नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;span style="font-family:arial;font-size:78%;color:#000066;"&gt;&lt;strong&gt;©rajivkmishra\25\09\09\del-telegraph-2-3am&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:arial;font-size:78%;color:#990000;"&gt;&lt;strong&gt;A cyborg is a cybernetic organism (i.e., an organism that has both artificial and natural systems). The term was coined in 1960 when Manfred Clynes and Nathan Kline used it in an article about the advantages of self-regulating human-machine systems in outer space.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-7529455307843587103?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/7529455307843587103/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=7529455307843587103&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/7529455307843587103'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/7529455307843587103'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/09/blog-post_25.html' title='तो, अब कोई नहीं मरेगा...!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SrvlSgRk4JI/AAAAAAAABrk/a6DJxCnu4l4/s72-c/BrandonRouthasSuperman.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-1954565856161896409</id><published>2009-09-24T15:41:00.007+05:30</published><updated>2009-09-24T23:03:18.834+05:30</updated><title type='text'>चांद के पार चलो...!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5384975039070924818" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SrtGRGgq8BI/AAAAAAAABrc/VitkA3hhl18/s320/moon_1487948c.jpg" border="0" /&gt;आज की सबसे बड़ी ख़बर चांद से आ रही है। चांद यानि अपना नानी-घर। चंदा मामा उतने रूखे-सूखे नहीं हैं, जितना हम समझते आ रहे थे। हमारे पहले मून मिशन चंद्रयान ने चांद पर पानी को ख़ोज लिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि चंद्रयान अपने साथ नासा का मून मैपर साथ लेकर गया था। मून मैपर को चांद पर पानी के कुछ ऐसे सबूत मिले हैं जो कि अब तक की खोज में सबसे अहम है।&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;वैज्ञानिकों के अनुसार चांद पर पानी झील या तालाब के रूप में नहीं है बल्कि धूलकणों और चट्टानों में भाप के रूप में है। इसी के साथ चांद की मिट्टी में मौजूद नमह से पानी निकाले की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;/p&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;करत-करत अभ्यास ते, जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निशान। सच साबित हो रहा है---भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अपनी सफलता के तिरंगे फैला रहा है, जिसका पूरा पूरा श्रेय इसरो को जाता है। अथक प्रयासों ने भारत को ब्रह्मांड में अपनी उपस्थिति को दर्ज कराया है। संभव है इस ब्रह्मांड में हम अकेले नहीं हों....कोई तो है जो हमें भी उसी शिद्दत से ढ़ूंढ रहा हो....। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;मानव जाति बड़ा हो रहा है। वह मैच्योर हो रहा है। सोच, समझ, ज्ञान बढ़ी रही है। इंसानी उद्भव का इतिहास, हमारे-आपके जीवन काल की तुलना में भले ही बहुत विस्तृत हो, लेकिन सच तो यही है कि हरेक पीढ़ी ज्ञान के उस अपार समंदर की एक कड़ी मात्र है। कहते हैं, पृथ्वी इंसान का पालना है। हम यहीं पैदा हुए है। लेकिन हमारी दुनिया अनंत तक फैली हुई है। चांद पर हमारी पहुंच बता रही है कि हम अब धीरे-धीरे चलने की कोशिश करने लगे हैं। एक न एक दिन हमें इस पालने को छोड़ना ही होगा। धरती मां के आंचल से दूर निकलना ही होगा। चांद पर हमारी पहुंच इसी ओर इशारा कर रही है। मैं पटना के किसी अस्पताल में पैदा हुआ....अस्पताल से घर, फिर पटना कि गलियों में..वहां से दिल्ली...आगे हो सकता है लंदन, न्यू-यार्क, मास्को कहीं भी जा सकता हूं...शायद मुझे भी नहीं पता कहां-कहां। लेकिन ये पलायन ज़िंदगी जीने के लिए जरूरी है। जिसने माईग्रेट किया, वो सफ़ल हुआ। और धरती से माईग्रेसन ही इंसानी सफ़लता की कहानी बनेगी।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;चालीस साल पहले 20 जुलाई, 1969 को नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर कदम रखते वक्त कहा था....’One small step for man. One giant leap for mankind...’, हलांकि mankind से पहले आर्मस्ट्रांग ‘the’ mankind लगाना भूल गए थे। लेकिन, उनके उस अधूरे वाक्य से पूरी दुनिया सहमत थी। और अब पानी मिलने के बाद आर्मस्ट्रांग के उन शब्दो को एक मुक्कमल सार्थकता मिल गई है। संभव है, हमारी आनेवाली पीढ़ियां चांद पर ही अपना आशियां बनाएं...। वो दिन बहुत दूर नहीं लगता....भले ही मैं उस दिन को न देख पाऊं।&lt;/p&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;span style="font-family:arial;font-size:78%;color:#000066;"&gt;&lt;strong&gt;©rajivkmishra\24\09\09\del-lon-telegraph.co.uk&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-1954565856161896409?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/1954565856161896409/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=1954565856161896409&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/1954565856161896409'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/1954565856161896409'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/09/blog-post_5126.html' title='चांद के पार चलो...!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SrtGRGgq8BI/AAAAAAAABrc/VitkA3hhl18/s72-c/moon_1487948c.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-3355249905934772344</id><published>2009-09-24T02:10:00.004+05:30</published><updated>2009-09-24T02:32:49.600+05:30</updated><title type='text'>गाड़ी भरोसे भगवान...!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SrqH-oB_UWI/AAAAAAAABrU/9rr15ELexGk/s1600-h/Photo-0123.jpg"&gt;&lt;strong&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5384765814442250594" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SrqH-oB_UWI/AAAAAAAABrU/9rr15ELexGk/s320/Photo-0123.jpg" border="0" /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;सुनता आया था.....दिल्ली में गाड़ी भगवान भरोसे ही चलती है। भगवान को गाड़ी के भरोसे चलता देख थोड़ा आश्चर्य हुआ। ऐसे कमाई का सीजन है...इसलिए ओवरटाईम करने में कुछ बुराई नहीं.....भगवान घूम-घूम कर अर्जन कर रहे हैं। तभी तो &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;साल भर अपने भक्तों पर लुटा सकेंगे।&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;font-size:78%;color:#000066;"&gt;©rajivkmishra\22\09\09\del&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-3355249905934772344?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/3355249905934772344/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=3355249905934772344&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/3355249905934772344'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/3355249905934772344'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/09/blog-post_24.html' title='गाड़ी भरोसे भगवान...!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SrqH-oB_UWI/AAAAAAAABrU/9rr15ELexGk/s72-c/Photo-0123.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-2001664128420184383</id><published>2009-09-14T15:07:00.007+05:30</published><updated>2009-09-24T02:31:14.191+05:30</updated><title type='text'>धरती की नीली मौत...!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sq4PU_QaR4I/AAAAAAAABrE/WwraAN3gGl4/s1600-h/vlcsnap-4687208.png"&gt;&lt;strong&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5381255458006386562" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 254px; CURSOR: hand; HEIGHT: 243px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sq4PU_QaR4I/AAAAAAAABrE/WwraAN3gGl4/s320/vlcsnap-4687208.png" border="0" /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;धरती के आखिरी गांव में,&lt;br /&gt;बर्फ का ब्रह्मांड...&lt;br /&gt;जहां हर पल सुनाई देती है मौत की आहट,&lt;br /&gt;नीली मौत से समना,&lt;br /&gt;गौरव सावंत के साथ....&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5381255612906716770" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 256px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sq4PeAThvmI/AAAAAAAABrM/sZZ0fumj0xs/s320/vlcsnap-4685131.png" border="0" /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;धरती के उस छोर से, जिसके आगे कोई इंसानी हलचल नहीं.....बर्फ की वो सर्द औऱ सख्त दुनिया, जहां सिर्फ हाड़ कंपा देने वाली ढंठ और नीली-सफेद बर्फ का बेहिसाब विस्तार है....जहां तक नजर जाएगी सैकड़ों-हजारों किलोमीटर तक यहां सिर्फ बर्फ ही बर्फ है....और बर्फ के इसी अंतहीन विस्तार में अबतक सलामत थी दुनिया....लेकिन अब ऐसा नहीं है औऱ इसका अंदाजा समूची धरती पर सिर्फ औऱ सिर्फ यहीं हो सकता है। इसीलिये मैं यहां आया हूं ताकि आपको दिखा सकूं कि इस बेहद खूबसूरत सफेद दुनिया की कोख को चीरकर कैसे बाहर निकल रही है धरती की मौत.....।&lt;/p&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;span style="font-family:arial;font-size:78%;color:#000066;"&gt;&lt;strong&gt;© gauravcsawant\14\09\09\del-arctic&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-2001664128420184383?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/2001664128420184383/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=2001664128420184383&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2001664128420184383'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2001664128420184383'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='धरती की नीली मौत...!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sq4PU_QaR4I/AAAAAAAABrE/WwraAN3gGl4/s72-c/vlcsnap-4687208.png' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-2916107501954017741</id><published>2009-08-16T05:27:00.004+05:30</published><updated>2009-08-16T05:31:31.501+05:30</updated><title type='text'>मुझको पहचान लो, मैं हूं कौन?</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SodLd3DVm_I/AAAAAAAABps/_DuukLSr9u4/s1600-h/11675,xcitefun-shahrukh.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5370344057028844530" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 228px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SodLd3DVm_I/AAAAAAAABps/_DuukLSr9u4/s320/11675,xcitefun-shahrukh.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;बहुत दिनों के बाद सलमान ने सही बात कही है।&lt;/strong&gt; आमरीका में शाहरुख़ के साथ हुई घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि, “शाहरुख के साथ जो हुआ असल में उसे सिर्फ एक सुरक्षा प्रक्रिया के लिहाज से देखा जाना चाहिए। और इसी कारण से 9\11 के बाद से अमरीका सुरक्षित है”। सलमान की बात में दम है। शाहरुख़ अपने मुल्क में या फिर दुनिया भर में फैले हिन्दुस्तानियों के लिए आइकन हो सकते हैं। लेकिन, अमरीका के लिए वे एक विजिटर से ज्यादा कुछ नहीं हैं। मुझे यकीन है कि शाहरुख़ का किसी भी आतंकवादी संगठन या वारदात से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। लेकिन, 9\11 जैसी घटना फिर से न दुहरायी जाए इस लिहाज से अमरीकी सुरक्षा ऐजेंसियां कोई भी चांस नहीं लेना चाहतीं और इसमें कुछ ग़लत भी नहीं है। और इस बात की क्या संभावना है कि जांच अधिकारी किंग ख़ान के फैन हों, या उन्हें पहचानते ही हों???? &lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अमरीका में कल एक मज़ेदार वाकयात और भी हुई। वहां के मशहूर कलाकार बॉब डॉयलन को न्यू-यार्क पुलिस ने सिर्फ़ इस वजह से पकड़ लिया था क्योंकि उनके पास सिर्फ़ एक पहचान पत्र था। बाद में डॉयलन पुलिस के साथ अपने होटल गए, जहां उन्होंने अपनी दूसरी पहचान पत्र दिखलाई, तब जाकर उन्हें छोड़ा गया। अब इस घटना को क्या कहेंगे आप। अमरीका तो डॉयलन का अपना देश है...और किसी भी पैमाने पर वहां उनकी लोकप्रियता या रुतबा शाहरूख़ से कम नहीं। वहां तो इस बात पर कोई हो-हल्ला नहीं हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाहरुख़ कहते हैं कि इस घटना से वे गुस्से में हैं, नाराज़ हैं। उनका मानना है उन्हें परेशान किए जाने का सबब उनका मुसलमान होना है। शाहरूख़ इस बात को कहते वक्त शायद यह भूल गए कि अमेरिका और पश्चिमी देशों में हर दिन हजारों मुसलमानों को अतिरिक्त सुरक्षा जांचों से गुज़रना होता है। दरअसल शाहरूख़ के गुस्से की वजह कुछ और ही है। उन्हें गुस्सा इसलिए आया क्योंकि यह उनके साथ हुआ। शाहरूख़ ख़ान मेगा स्टार के साथ हुआ। हम सब जानते हैं कि दुनिया के कई मुल्कों में मुसलमानों को साथ पक्षपात किया जाता है। पश्चिमी देश या अपने यहां भी आतंकवाद को सीधा इस्लाम से जोड़ दिया गया है। यह अन्यायपूर्ण है, ग़लत है। लेकिन यह भी सच है कि अमरीका अपने नागरिकों की सुरक्षा को काफ़ी गंभीरता से लेता है। हमारे मुल्क की तरह नहीं जहां आम आदमी की सुरक्षा भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया है। एक बात और, चूंकि 9\11 को अंजाम देने वाले अधिकतर मुसलमान थे, इसलिए अमरीका उनपर विशेष नज़र रखता है। अगर 9\11 की घटना में मुसलमान की जगह हिंदू होत, या फिर यहूदी होते, तो वहां उनकी भी जांच कड़ाई से की जाती। हां पुर्व राष्ट्रपति कलाम की जांच से मुझे पीड़ा हुई थी, लेकिन वो अब पुरानी बात है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाहरूख़ वाली घटना को दो नज़रिए से देखा जाना चाहिए। सबसे हास्यास्पद बात यह कि हमें लगता है कि हमारे आइकन और सुपर स्टार को पूरी दुनिया उसी चश्मे से देखती है, जिससे हम देखते हैं। कल अगर दिल्ली की सड़को पर ‘जेट ली’ टहलते हुए दिख जाएं तो शायद ही हम-आप में से कोई उन्हें पहचान पाएं। या फर्ज़ कीजिए ‘डैनजिल वाशिंगटन’ पटना की गलियों में दिख जाएं तो उन्हें कौन पहचानेगा....शायद कोई भी नहीं। लेकिन अपने देश में ये दोनों हमारे किंग ख़ान से कम हैसियत और पहचान नहीं रखते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा, अमेरिका भारत की तरह से ग़ुलामी की मानसिगता से ग्रस्त नहीं हैं। माइक टायसन से आम अपराधी की तरह व्यवहार किया गया और उन्होंने जेल में अपनी जवानी का बेहतरीन हिस्सा बिताया। हॉलीवुड की सुप्रसिद्ध अभिनेत्री विनोना राइडर को डिज़ाइनर कपड़े चुराने के इल्ज़ाम में 480 घंटे समाज सेवा करना पड़ा। अभीनेत्री वाइ लिंग को चोरी के लिए 200 डॉलर जुर्माना देना पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल बात यह है कि हमारे गुस्से की वजह हमारी नियम-कानून तोड़ने की आदत है। यह कोई अच्छी बात नहीं है। हमें भी अमरीकियों की तरह होना चाहिए। प्रोफेशनल, और देश की सुरक्षा को हल्के में लेने की भूल नहीं करनी चाहिए। अगली बार ब्रैड पिट और एंजलिना भारत आएं तो उनकी भी कड़ाई से जांच हो। बिल क्लिंटन को भी एयरपोर्ट पर चैकिंग से गुजारनी चाहिए। वे भी तो कलाम की तरह ही भूतपुर्व राष्ट्रपति ही हैं। कौन और क्या रोक रहा है आपको? औपनिवेशिक हैंगओवर जिससे आप 62 वर्षों के बाद भी बाहर नहीं निकल पाए हैं, या कि आपकी सुस्ती और लचर व्यवस्था? मुझे तो दोनों लगता है। इसलिए शाहरूख़ को छोड़िए और अपनी सुरक्षा व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित कीजिए। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-2916107501954017741?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/2916107501954017741/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=2916107501954017741&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2916107501954017741'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2916107501954017741'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/08/blog-post_16.html' title='मुझको पहचान लो, मैं हूं कौन?'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SodLd3DVm_I/AAAAAAAABps/_DuukLSr9u4/s72-c/11675,xcitefun-shahrukh.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-3107196325997155170</id><published>2009-08-04T05:37:00.006+05:30</published><updated>2009-08-05T02:49:53.337+05:30</updated><title type='text'>ज़िंदगी को बहुत प्यार हमने दिया...</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Snd7wtBlSOI/AAAAAAAABpU/zrvXNw-Tz4I/s1600-h/kishore_kumar.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5365893557685405922" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 306px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Snd7wtBlSOI/AAAAAAAABpU/zrvXNw-Tz4I/s320/kishore_kumar.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;....मौत से भी मुहब्बत निभाएंगे हम......आज किशोर दा की 22 वीं बरसी है। ज़िंदा होते तो आज 80 साल के होते। किशोर दा आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके गाने, उनका अभिनय, उनकी कॉमेडी आज भी हमें हंसाती, रुलाती और गुदगुदा जाती है। बहुमुखी प्रतिभा से लबरेज किशोर दा क्या कुछ नहीं थे, गायक, कलाकार, हास्य अभिनेता, निर्देशक, संगीतकार, लेखक...एक ज़िद्दी सख़्सियत जो अपने वसूलों के लिए किसी भी हद तक जा सकता था। इमरजेंसी के चरम पर सरकार को ठेंगा दिखलाने का साहस किशोर ही कर सकते थे। हुआ यूं कि सरकार ने उन्हें ऑल इंडिया रेडियो और सरकारी टेलिविजन पर बिना पैसों के गाने को कहा। किशोर को यह मंजूर नहीं था। मना कर दिया, नतीजतन किशोर को रेडियो और टेलीविजन से प्रतिबंधित कर दिया गया था। किशोर ज़िंदगी के बिसात पर किश्मत के बेजोड़ खिलाड़ी थे। संगीत की कोई शिक्षा नहीं, लेकिन 18 साल के उम्र में ही माईक्रोफोन पकड़ लिया। खंडवा का छोरा आभाष गांगुली, इतिहास रचने मुंबई के लिए निकल पड़ा था। सपनों की नगरी बंबई , सुबह से शाम तक दौड़ती मुंबई । बड़े भाई अशोक पहले से ही सफ़ल अभिनेता के रूप में स्थापित थे। लिहाजा युवा किशोर को काम पाने के लिए अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ा। किशोर ने बॉम्बे टॉकीज ज्वाईन कर लिया। शुरुआती दौड़ में किशोर के पास ज्यादा काम नहीं था। देव आनंद की फ़िल्म ज़िद्दी के लिए उनका पहला गाना रिकार्ड हुआ। गाने की बोल थी, मरने की दुआएं क्यूँ मांगूं ,जीने की तमन्ना कौन करे। इस गीत में कुछ भी नया नही था और के. एल. सहगल की नक़ल जैसी थी। इसके पहले किशोर ने एक समूह गीत में भी भाग लिया था। बड़े भाई अशोक चाहते थे कि किशोर अदाकारी में ही मन लगाए, गाने से कुछ ख़ास हासिल होने वाला नहीं है। लेकिन हरफनमौला किशोर को गाना ही अधिक पसंद था। किशोर ने " शिकारी" नाम की एक फ़िल्म में पहला अभिनय किया। फ़िल्म कुछ ख़ास नहीं कर पाई, लेकिन किशोर गायन के साथ-साथ अभिनय में भी लगे रहे। 1951 में किशोर ने रुमा देवी से शादी कर ली, लेकिन यह शादी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाई। इस शादी से परिवार में दरार भी पड़ गई। ये किशोर के मुफलिसी के दिन थे। कुछ ख़ास काम नहीं था। उन्हीं दिनों संगीत निर्देशक सचिन देव बर्मन ने किशोर को बाथरूम में गाते सूना और उन्हें आपने आवाज़ में गाने की सलाह दी। बर्मन दा और किशोर के इस मिलन से शुरू हुआ एक ऐसा सफ़र जो हिन्दी फ़िल्म जगत का एक सुनहरा इतिहास बन गया। सचिन दा ने किशोर के आवाज़ को और तराशा। दोनों की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कुछ यादगार गाने दिए। अराधना का, मेरे सपनों की रानी, रूप तेरा मस्ताना...शर्मिली का, खिलते हैं गुल यहां, आज मदहोश हुआ जाए रे...पेईंग गेस्ट का वो सदाबहार गाना, माना जनाब ने पुकारा नहीं...मुनीमजी का ये गीत, जीवन के सफ़र में राही...दिल्ली का ठग में आशा के साथ, ये रातें ये मौसम नदी का किनारा, वो चंचल हवा....ज्वेल थीफ का, ये दिल न होता बेचारा...फंटूस का, दुखी मन मेरे...और चलती का नाम गाडी़ के गानों को कौन भुला सकता है, एक लड़की भीगी भागी सी। किशोर उस दौड़ के लगभग हर अभिनेता की आवाज़ बन गए थे। फ़िल्म आराधना का गाना, रूप तेरा मस्ताना ने किशोर को पहला फ़िल्मफेयर दिलाया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Snd76otIMaI/AAAAAAAABpk/C7v1snvXqdE/s1600-h/Padosan3.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5365893728324563362" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 238px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Snd76otIMaI/AAAAAAAABpk/C7v1snvXqdE/s320/Padosan3.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;1960-1970 का दशक हिन्दी सिनेमा जगत किशोर के नाम ही रहा। प्लेबैक सिंगिंग, अभिनय, निर्देशन, लगभग हर क्षेत्र में किशोर का डंका बज रहा था। 1962 में बॉम्बे का चोर (माला सिन्हा), हाफ टिकट (मधुबाला), 1964 में मिस्टर X इन बॉम्बे, दूर गगन की छाँव में (आ चल के तुझे मैं लेकर चलूं), 1965 में श्रीमान फंटूस का गाना (वो दर्द भरा अफ़साना)...अभी किसी ब्लॉग पर पढ़ रहा था कि जितने भी बड़े स्टेज शो हुए, लगभग सभी में किशोर ने इस गीत को दोहराया। 1967 में रिलीज़ हुई पडो़सन को कौन भुला सकता है, भले ही फिल्म में किशोर का किरदार साईड हीरो का था, लेकिन गुरू विद्यापति का वह किरदार भोला (सुनील दत्त) के अभिनय से बीस ही था। रूमा देवी के बाद किशोर ने तीन और शादियां की, मधुबाला, योगिता बाली और लीना चन्दावारकर। मधुबाला महज 36 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गई। योगिता बाली से किशोर का विवाह सफ़ल नहीं रहा, बाद में योगिता ने मिथुन चक्रवर्ती से शादी कर ली। 1980 में किशोर ने लीना चन्दावारकर से शादी कर ली, जो अंत तक किशोर के साथ रहीं।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Snd72a5xTDI/AAAAAAAABpc/FLHBMVFvqcM/s1600-h/kk-da.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5365893655900015666" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 236px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Snd72a5xTDI/AAAAAAAABpc/FLHBMVFvqcM/s320/kk-da.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;किशोर जीवन के अंतिम दिनों में खंडवा वापस जाना चाहते थे। फ़िल्मी दुनिया से उनका मोह भंग हो रहा था। किशोर के शख़्सियत विरोधाभासों से भरा हुआ था। अमरीका में एक स्टेज शो के बाद किशोर ने शपथ खाई थी कि वे अब लता के साथ कभी नहीं गाएंगे, लेकिन उनके कुछ बेहतरीन गाने लता के साथ ही है। किशोर को भीड़ नापसंद थी, लेकिन अपने दर्शकों से उन्हें प्यार था। अपने प्रशंसकों से मिलने पर वे उनका ख़ूब मनोरंजन करते। एक अभिनेता के रूप में वे शानदार कैरियर बना सकते थे, लेकिन उन्हें गाने से प्यार था। किशोर को रिकार्डिंग स्टूडियो में लाना सबसे मुश्किल काम था, लेकिन शायद ही किसी गायक ने अपने गानों को किशोर की तरह डूब कर गया हो। &lt;p align="justify"&gt;सच पूछिए तो किशोर दा का नाम आते ही जेहन में जाने कितनी तस्वीरें, जाने कितनी सदायें झिलमिला आती हैं। किशोर दा यानी एक हरफनमौला कलाकार, एक सम्पूर्ण गायक, एक लाजवाब शख़्सियत...और भी बहुत कुछ जिसे बांध पाने में मेरी कलम हार जाती है....&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-3107196325997155170?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/3107196325997155170/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=3107196325997155170&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/3107196325997155170'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/3107196325997155170'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/08/blog-post_04.html' title='ज़िंदगी को बहुत प्यार हमने दिया...'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Snd7wtBlSOI/AAAAAAAABpU/zrvXNw-Tz4I/s72-c/kishore_kumar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-114837624031469491</id><published>2009-08-03T13:19:00.006+05:30</published><updated>2009-08-03T17:16:24.380+05:30</updated><title type='text'>थैंक यू राखी</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SnaWij47TcI/AAAAAAAABo8/9jyEEfotEh8/s1600-h/RAKHI.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5365641526552251842" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 250px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SnaWij47TcI/AAAAAAAABo8/9jyEEfotEh8/s320/RAKHI.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;प्रिय राखी,&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;सच मानो तो मुझे इस बात का जरा भी यकीन नहीं था कि तुम किसी के गले में वरमाला डालोगी। लेकिन तुमने मेरे संदेह को गलत साबित कर दिया। तुमने राखी के त्यौहार आने से पहले ही अपना स्वयंवर रचा लिया है। दिल को थोड़ा सूकून मिला। मुझ से ज्यादा खुशी एनडीटीवी वालों को हुई होगी। चैनल के सीईओ, समीर नायर किस व्याकुलता से तुम्हारी स्वयंवर को देख रहे थे, इसका अंदाज़ा तुम्हें नीचे लगी तश्वीर से हो जाएगी। तुमने नखड़े तो जरूर किए होंगे, लेकिन अख़िर में तुम मान गई होगी। ये पैसा जो न कराए। मुझे उम्मीद है कि तुम सरल स्वभाव वाले इलेश से जल्द ही शादी भी कर लोगी। तुम्हारे मायके (इमेजिन) वालों ने कितनी तैयारी की थी। लग रहा था मानो इंद्र के दरबार में किसी अप्सरा का स्वयंवर चल रहा हो। हिंदी पट्टी की जनता सांस थामे उस यादगार पल को अपनी आंखों में कैद कर रही थी। लगा सब कुछ उन चंद घंटों के लिए ठहर सा गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SnaWnew0gYI/AAAAAAAABpE/BLAAKcDUjwA/s1600-h/RAKHI+3.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5365641611075420546" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 258px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SnaWnew0gYI/AAAAAAAABpE/BLAAKcDUjwA/s320/RAKHI+3.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;मैं तुम्हें बिल्कुल ही पसंद नहीं करता था, लेकिन सच पूछो तो अब तुम अच्छी लगने लगी हो। अब इसमें मेरी भी कोई ग़लती नहीं है। निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से आता हूं, रिश्ते मेरे लिए अनमोल हैं। संबंधो के ताने-बाने भले ही जटिल हो, लेकिन मैं उनसे बेतरह प्यार करता हूं। ये सिर्फ़ मेरी ही कहानी नहीं है। आर्थिक उदारीकरण के बाद एक बहुत बड़ा मध्यम वर्ग पैदा हुआ है, जिसके पैर तो संस्कारों में धंसे हुए हैं, लेकिन ख़्वाब आसमान छूने की है। तुम उसी मिडिल क्लास के सपनों की ताबीर हो। तुम्हारे चुनाव से मैं इत्तेफ़ाक रखता हूं। लेकिन मेरे नौकर को मनमोहन तिवारी पसंद था। तुमने एक पारसी को जीवन साथी चुनकर संप्रदायिक शक्तियों के मुंह पर तमाचा भी मारा है। तुम सचमुच सेक्युलर हो। कांग्रेसी नेताओं की नज़र भी तुम पर है। एनडीटीवी तो तुम्हारे इस कृत्य से निहाल ही हो गया होगा। कोई कह रहा था कि एनडीटीवी वालों को तुम्हारा पैर धो कर पीना चाहिए। तुमने एक डूबते चैनल को तिनके का ही सही, सहारा तो दिया। न्यूज़ चैनल वाले भी तुम्हारे मुरीद हो गए। ख़बरों की इस मंदी में तुम्हारे स्वयंवर के कटपीस विजुअल्स से न जाने कितने घंटों तक इन्होंने ब्रेकिंग न्यूज़ ताने रखा।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SnaWrYCU05I/AAAAAAAABpM/OK8mdXnUNXM/s1600-h/RAKHI+2.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5365641677989270418" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 229px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SnaWrYCU05I/AAAAAAAABpM/OK8mdXnUNXM/s320/RAKHI+2.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;पता नहीं तुम्हें इस बात का अंदाज़ा है भी या नहीं कि जाने अनजाने तुमने एक सामाजिक क्रांति कर दिया है। तुम्हारे स्वयंवर नें एक अदृश्य लेकिन मुक्कमल रेखा खींच दी है। हर लड़की अपनी शादी में तुम्हारे स्वयंवर की तरह ही तामझाम का उम्मीद पाल बैठेगी। अब हर कोई तो फराह खान का डिजाइन किया हुआ 30 लाख का नैकलेस और नीता लुल्ला का डिजाइन किए लहंगा चुन्नी अफार्ड नहीं कर सकती न। अब देखो न तुम्हारे देखा-देखी अमृता राव भी स्वयंवर करने की इच्छा रखने लगी हैं। तुम्हारा स्वयंवर उस व्यवस्था के ख़िलाफ़ भी आगाज़ है जिसमें लड़की पक्ष को हेय दृष्टि से देखा जाता है। तुम्हारा ये स्वयंवर भारतवर्ष के उस प्राचीन गौरव को लौटाने की ओर भी एक सार्थक कदम है, जिसमें लिंग आधारित विभेद के लिए कोई जगह नहीं था। सीता, द्रोपदी और अहिल्या के साथ अब तुम्हारा नाम भी इतिहास में दर्ज़ हो जाएगा। बल्कि मेरा तो यहां तक मानना है कि तुम्हारा स्वयंवर सीता और द्रोपदी के मुकाबले ज्यादा रैशनल था। तुमने अपने जीवन साथी को कई पैरामीटर्स पर टेस्ट किया। अब अगर राम जी की जगह कोई राक्षस शिव के धनुष की प्रत्यंचा चढ़ा लेता तो क्या होता? अर्जुन की जगह कोई और राजकुमार मछली की आंख में निशाना साध लेता तो फिर द्रोपदी क्या करती??? सबसे ताक़तवर या फिर अचुक निशाना लगाने वाला एक अच्छा पति भी साबित हो यह कहां लिखा है??? है न....तो तुम उस हिसाब से भी उन पर बीस हो। हलांकि मुझे लगता है तुम्हें जीके, जीएस के साथ-साथ लड़कों से समसामायिक विषयों पर ऐसे (लेख) भी लिखवाना चाहिए था। जिससे कि मेरे जैसे लड़के भी स्वयंवर भी जाने की हिम्मत दिखला पाते। एक बात और जो मुझे बुरा लगा वो ये कि जब तुमने पहले से फ़ैसला कर लिया था कि तुम इलेश के गले में ही वरमाला डालोगी तो तुम्हें मानस और क्षितिज के परिवार वालों को नहीं बुलाना चाहिए था। बल्कि किसी भी प्रतिभागी के घरवालों को नहीं बुलाना चाहिए था। कितनी ख़ुशी से दोनों के मां-बाप बारात में नाच रहे थे। बाद में उनका उतरा हुआ चेहरा मन को थोड़ा गीला कर गया। तुम्हारे घर वालों की कमी भी अखड़ रही थी। वो क्यूं नहीं आए, ये तो मैं नहीं जानता। लेकिन, इतना पता है कि कन्यादान से बड़ा दान कोई भी नहीं होता। ख़ैर, मैंने तुम्हारे स्वयंवर के पक्ष में कई सही-ग़लत तर्क गढ़ दिए हैं। अब अगर तुम इलेश से शादी नहीं करोगी तो लोग मेरा मज़ाक उड़ाएंगे। इसलिए प्लीज़ राखी, 6 महीने बाद ही सही, बिना मेकअप के ही सही.....इलेश से शादी कर लेना।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;‘राजीव’&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-114837624031469491?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/114837624031469491/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=114837624031469491&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/114837624031469491'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/114837624031469491'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='थैंक यू राखी'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SnaWij47TcI/AAAAAAAABo8/9jyEEfotEh8/s72-c/RAKHI.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-8318207789337550029</id><published>2009-07-23T16:17:00.002+05:30</published><updated>2009-07-26T12:44:22.863+05:30</updated><title type='text'>इंडिया टीवी के आर्यभट्ट</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5361605835432421026" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 154px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SmhAGa6cZqI/AAAAAAAABo0/LpuggqeAgU8/s320/INDIA+TV.JPG" border="0" /&gt;तरेगना या तारेगना??? लगभग सारी मीडिया मसौढी अनुमंडल के इस छोटे से गाँव को तारेगना बता रही थी, जो कि ग़लत है। इस जगह का नाम 'तारेगना' नहीं, 'तरेगना' है। बहरहाल, बात इंडिया टीवी और इस चैनल के इतिहास ज्ञान की। ख़बर तरेगना की थी कि वहां बादलों की वजह से लोग सूर्यग्रहण देखने से चूक गए। ग्रहण वाले दिन चैनल प्राईम टाईम में मोटा-मोटा सुपर चला रहा था। 'तारेगना पटना से 35 किलोमीटर दूर है'...'तारेगना में मशहूर वैज्ञानिक आर्यभट्ट रहते थे'....'आर्यभट्ट ने यहां एक वेधशाला बनाई थी'। यहां तक तो सब ठीक है, लेकिन अगला लाइन वाकई किसी पढ़े-लिखे शख़्स को हैरान कर देने वाली थी। '150 साल पहले बनाई थी वेधशाला'..। इंडिया टीवी के मुताबिक आर्यभट्ट ने डेढ़ सौ साल पहले तरेगना में वेधशाला बनवाया था। यानि सन 1850 के आसपास, जब ब्रिटिश भारत में शासन कर रहे थे। चैनल ने अपनी बौद्धिकता का बेजोड़ परिचय दिया था। आर्यभट्ट गुप्तकाल के महान अंतरिक्ष विज्ञानी थे। ऐतिहासिक साक्ष्यों की मानें तो गुप्त काल 320 to 480 AD. के बीच था। आज से करीब डेढ़ हज़ार साल पहले। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-8318207789337550029?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/8318207789337550029/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=8318207789337550029&amp;isPopup=true' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8318207789337550029'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8318207789337550029'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/07/blog-post_23.html' title='इंडिया टीवी के आर्यभट्ट'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SmhAGa6cZqI/AAAAAAAABo0/LpuggqeAgU8/s72-c/INDIA+TV.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-5488803984801781693</id><published>2009-07-17T10:35:00.005+05:30</published><updated>2009-07-17T14:12:42.195+05:30</updated><title type='text'>मुझे लौट कर घर ही जाना है।</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SmAIOJythhI/AAAAAAAABns/RIcLDCdl14A/s1600-h/046504.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5359292595810698770" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 213px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SmAIOJythhI/AAAAAAAABns/RIcLDCdl14A/s320/046504.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;कहां भूल पाता हूं, मुझे लौट कर घर ही जाना है&lt;br /&gt;दिन भर कई तरह के लोगों से मिलना&lt;br /&gt;कभी अपने स्वार्थ से, कभी किसी की मदद के लिए&lt;br /&gt;सुंदर लड़कियां, सत्ता के गलियारों में ठहलते दलाल&lt;br /&gt;कभी विद्वानों से, कभी संघर्षरत पत्रकारों से&lt;br /&gt;पटना के पुराने दोस्त, दिल्ली के नए परिचित&lt;br /&gt;मुस्कुरा कर सब लगाते हैं गले....&lt;br /&gt;मुस्कुराहट दिलाता है याद, मुझे घर लौट जाना है।&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;अभी कल ही की तो बात है अख़बार में लार्ड स्वराज की तश्वीर दिखी,&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;याद आ गया 2004 की सर्दियों की वो शाम&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;मैं, लार्ड और सुशांत, बीबीसी के कार्यक्रम में घंटों साथ बैठे थे&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;शेखर कपूर का सरकारी व्यवस्था पर वो कटाक्ष&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;सुनिल अलग का आईटी की वो बातें &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;ओमेरा चन्ना और शायरा नशीम की शरहद पार से आए गीत&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;नार्थ एवेन्यू के सियासतदान&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;रॉबिन ज्योफ्री की आंखों से भारत की गलियां&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;कुतब में चंद्रास्वामी की लाल-लाल आंखें&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में ऋषि का वो फ्लैट&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;जहां जुटते हैं हम और करते हैं, बड़ी-बड़ी बातें&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;लालगढ़ से वाशिंगटन तक फैली हमारे बातों की विसात&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;कम्यूनिज्म से पूजीवाद तक फैलता-सिमटता डिबेट&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;धर्म, आस्था, हमारा प्यार, हमारी शैतानियां&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;रामपाल की चाय की चुस्की&lt;br /&gt;ऋषि की वेस्टर्न फिलास्फी के साथ-साथ व्यवस्था को प्यारी-प्यारी गालियां&lt;br /&gt;सुशांत का गहरा ज्ञान, विश्वदीपक के वाम वचन&lt;br /&gt;चे, काफ्का, सात्र, हीगल से नेहरूवियन फेबियनिज्म&lt;br /&gt;पटना, झांसी, दिल्ली, मधुबनी से इलाहाबाद तक फैली हमारी यादें&lt;br /&gt;और इन सब को अनवरत सुनने का मेरा धैर्य&lt;br /&gt;कह जाता है, मुझे लौट कर घर ही जाना है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-5488803984801781693?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/5488803984801781693/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=5488803984801781693&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/5488803984801781693'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/5488803984801781693'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/07/blog-post_17.html' title='मुझे लौट कर घर ही जाना है।'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SmAIOJythhI/AAAAAAAABns/RIcLDCdl14A/s72-c/046504.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-8521607721399564928</id><published>2009-07-14T01:34:00.004+05:30</published><updated>2009-07-14T01:45:45.799+05:30</updated><title type='text'>रसगुल्ला खिलाओ, बरी हो जाओ...!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SluVizMv7wI/AAAAAAAABnU/fdK4-4qXJeA/s1600-h/untitled.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5358040606779109122" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 261px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SluVizMv7wI/AAAAAAAABnU/fdK4-4qXJeA/s320/untitled.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;आख़िर प्रो. सब्बरवाल हत्या मामले में वही हुआ, जिसका अंदेशा था। नागपुर सेशन कोर्ट ने हत्याकांड के सभी 6 आरोपियों को बरी कर दिया। वो भी तब, जब पूरे देश ने टीवी पर अभियुक्तों की करनी देखी थी। तीन साल पहले न्यूज़ चैनलों ने इस मामले को जम कर उठाया था। यहां केस के जज नितिन दलवी का फ़ैसला देते वक्त दिया गया बयान गौर करने लायक है। जज साहब ने कहा कि वे जानते हैं कि सभी आरोपी हत्या में शामिल हो सकते हैं , लेकिन चूंकि इनके ख़िलाफ कोई सबूत नहीं है, इसलिए इन्हें बरी किया जा रहा है। पूरा सरकारी तंत्र अभियुक्तों को बचाने में जी जान से लगा था। पहले इस केस की सुनवाई उज्जैन सेशन कोर्ट में चल रही थी। वहां एक के बाद एक सभी गवाह पलट गए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को नागपुर स्थानांतरित कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल सबूतों के आभाव में बरी करने का ये कोई पहला मामला नहीं है। पहले भी होते रहे हैं, आगे भी होंगे। लेकिन हमें सोचना होगा कि हमारी न्याय व्यवस्था कि ऐसी क्या मजबूरी है जिसका फ़ायदा उठाकर अक्सर आरोपी बच निकलते हैं। पैसा, पावर, पैरवी जैसे फैक्टर कैसे और कब तक आम आदमी को न्याय पाने से वंचित करते रहेंगे। इस जंग लगी व्यवस्था में सरकारी वकील की भूमिका से हम सभी परिचित हैं। दरभंगा, मोतिहारी, बरेली जैसे छोटे शहरों में तो रसगुल्ला और पान ही न्याय का गला घोटने के लिए काफ़ी है। व्यक्तिगत रूप से मैं एक सरकारी वकील को जानता हूं। सरकारी बाद में बने, पहले साधारण वकील ही थे। बचपन में उन्हें पाई-पाई के लिए हमने तरसते देखा था। प्रैक्टिस के नाम पर एफिडेविट बनाने से ज्यादा कुछ काम उनके पास नहीं था। लालू यादव के सत्ता में आने के कुछ वर्षों बाद वकील साहब के लड़के को उसकी मेहनत के बूते केंद्र सरकार में अफ़सरी मिल गई। बाद में लड़के की शादी लालू जी के भतीजी से हुई। उस शादी के बारात में मैं भी था। दहेज में पैसा, ज़मीन के साथ वकील साहब को जिले का मुख्य पीपी का पद भी मिला। ये 5 साल पहले की बात है। पिछले नवंबर में अपने गृह जिला पहुंचा तो पाया कि वकील साहब की करकट (एसबेस्टस) वाले घर के जगह एक शानदार मकान इतरा रहा है। बाहर दलाननुमा जगह में पान, रसगुल्ला, आम, मुद्रा लिए कई दर्शानभिलाषी खड़े थे। न्याय की देवी ने आंख पर पहले से ही पट्टी बांध रखी है। सरकारी महकमा उसी पट्टी से कानून का गला घोटने को आतुर है।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SluTrmaRb2I/AAAAAAAABnM/rxPVk9uLel0/s1600-h/sabharwal_pic.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5358038558941736802" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 280px; CURSOR: hand; HEIGHT: 225px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SluTrmaRb2I/AAAAAAAABnM/rxPVk9uLel0/s320/sabharwal_pic.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अब बात एक जज साहब की। मेरे दूर के मामा हैं....। बचपन में ये मेरे ननिहाल, भागलपूर से परीक्षा देने पटना आते तो मेरे ही घर पर ठहरते। वापस जाते वक्त मां को पैर छू कर प्रणाम करते तो वे 100-200 उनके हाथ मे थमा देती। मां उनके माली हालत से वाकिफ़ थी। ख़ैर, मेहनत रंग लाई और मामाजी जूडीसियल मजिस्ट्रेट बन गए। तेज़ थे, कैरियर का ग्राफ भी उसी तेजी से चढ़ता गया। सब-जज, सेशन जज से होते हुए आज डिस्ट्रिक्ट जज हैं। जब कभी ऐसा संयोग बना कि मैं नानी घर गया और वे भी वहां हों, तो उनका जलवा देखने लायक होता था। हमें गर्व होता....समझ नहीं थी न। पैरवीकारों की लंबी लाईन...। अभी 3 साल पहले जज मामा के लड़की की शादी थी। सूत्रों से पता चला कि दामाद पायलट है, जिसे उन्होंने 40 लाख में ख़रीदा है। बारातियों के स्वागत करने वालों में दर्जनों ऐसे नाम थे, जिन्हें पशुपालन घोटाला में लिप्त पाया गया है। कई नामी-गिनामी क्रिमनल भी थे। मिठाई का इंतज़ाम किसी दागी के पास था, तो पंडाल की ज़िम्मेवारी किसी शातिर अपराधी के पास। बारात के ठहरने का इंतज़ाम किसी ट्रांसपोर्ट माफिया ने किया था। कई आला मंत्री और सरकारी अधिकारी नौकरों की तरह बारतियों के स्वागत में जी जान से लगे थे। मेरा सिर शर्म से झुक गया था। गुस्सा भी आ रहा था। छोटा भाई संजीव थोड़ा सनकी है। वो शादी में गया ही नहीं। मुझे मां-पिताजी ने समाज और परिवार की दुहाई देकर रोके रखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;ये दो उदाहरण तो बानगी मात्र है। ऐसे हज़ारों–लाखों ‘जज मामा’और ‘वकील चाचा’ हमारी व्यवस्था को चूस रहे हैं। ऐसा नहीं है कि व्यवस्था में इमानदार लोग नहीं हैं। बेशक , कुछ लोग इसके अपवाद रहे हैं और अदालतों ने खास दिलचस्पी लेकर ऐसे कुछ मामलों में इंसाफ दिया है जो अपने आप में मिसाल हैं। मगर अपवाद तो नियम को सच ही साबित करते हैं न।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब जानते हैं कि ये सभी आरोपी संघ परिवार से जुड़े छात्र संगठन एबीवीपी के नेता थे। संघ परिवार से ही जुड़ी पार्टी बीजेपी की मध्यप्रदेश में सरकार तब भी थी और आज भी है। अब लोग क्या इतने भोले हैं कि प्रदेश की पुलिस की ' लाचारी ' को न समझें।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-8521607721399564928?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/8521607721399564928/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=8521607721399564928&amp;isPopup=true' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8521607721399564928'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8521607721399564928'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/07/blog-post_14.html' title='रसगुल्ला खिलाओ, बरी हो जाओ...!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SluVizMv7wI/AAAAAAAABnU/fdK4-4qXJeA/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-4520451431593727828</id><published>2009-07-10T03:31:00.003+05:30</published><updated>2009-07-10T03:40:55.340+05:30</updated><title type='text'>तश्वीर - क़िस्सा कुर्सी का....!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5356585473018895202" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SlZqG3hPG2I/AAAAAAAABmc/djDyU1YqwVE/s320/10062009259.jpg" border="0" /&gt;यह तश्वीर ख़ास है। इलाहाबाद से लौट रहा था, गाड़ी आने में कुछ देर थी। स्टेशन के बाहर टहलते हुए, एकाएक मेरी नज़र पार्किंग में त्रिशंकु की तरह लटके हुए इस कुर्सी पर गई। ठहरा, सोचने लगा.....। मनीष के मोबाईल से तश्वीर उतारी। ऐसे भी यह कुर्सी कोई ऐसी वैसी तो थी नहीं। दरअसल, हम उस शहर में थे जो कुर्सी पर बिठाने उसको हिलाने, डुलाने और गिराने के लिए जानी जाती रही है। उस मायने में आप इस फ़ोटू को भारतीय राजनीति का ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी मान सकते हैं। स्टेशन पहुंचने से पहले हम इलाहाबाद हाई कोर्ट देखकर आए थे। वही कोर्ट जहां 1977 में जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने  समाजवादी नेता राज नारायण की चुनावी याचिका पर फ़ैसला सुनाते हुए इंदिरा गांधी के जीत को अवैध ठहरा दिया था। ‘कुर्सी’ के लिए इंदिरा ने लोकतंत्र का गला घोंट दिया। देश में इमरजेंसी लगा दी गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बात और आपातकाल के दौरान ही 1977 में अमृत नाहटा ने एक फिल्म बनाई थी, जिसका शीर्षक था ‘किस्सा कुर्सी का’ लेकिन कुर्सी पर बैठे लोग इस किस्से से इतना खफ़ा हुए कि उन्होंने इस फ़िल्म पर ही रोक लगा दी थी। इस फिल्म की प्रिंट गायब हो गया और मामला तब आपातकाल की जांच करने वाले शाह आयोग तक पहुंचा था। बाद में आईएस जौहर ने इसी नाम से एक फूहड़ फिल्म बनाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने पार्किंग वाले से पूछा कि यह सर्वशक्तिमान कुर्सी यहां कब से लटकी है, और इसकी दुर्गति के लिए कौन ज़िम्मेवार है। वो चुप ही रहा....लेकिन मैं सोच रहा था। शायद असली कुर्सी इलाहाबाद छोड़कर अमेठी या रायबरेली चली गई थी। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-4520451431593727828?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/4520451431593727828/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=4520451431593727828&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/4520451431593727828'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/4520451431593727828'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/07/blog-post_10.html' title='तश्वीर - क़िस्सा कुर्सी का....!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SlZqG3hPG2I/AAAAAAAABmc/djDyU1YqwVE/s72-c/10062009259.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-1245754255331216724</id><published>2009-07-08T03:35:00.010+05:30</published><updated>2009-07-08T18:44:55.568+05:30</updated><title type='text'>ये हवा ये रात ये चाँदनी....!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SlPHZTgoLlI/AAAAAAAABls/1fLG0ZDL7BE/s1600-h/Photo-0037.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355843619421433426" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SlPHZTgoLlI/AAAAAAAABls/1fLG0ZDL7BE/s320/Photo-0037.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;काफ़ी दिनों के बाद रात छत पर सोने का मौका मिला। दिल्ली की गर्मी और बिजली की लुकाछिपी अक्सर ऐसे मौके मुहैया कराती ही रहती है। लेकिन खुली हवा में सोने से अक्सर बचता ही रहा हूं। कल रात बत्ती फिर से दगा दे गई। कमरा उमस से भर गया। हार कर छत पर चला गया। मां ने घर (पटना) से चटाई भिजवा दिया है। बस उसे बिछाया और चौड़ा हो गया। लेकिन मुई नींद नहीं आई। ठंडी हवा धीरे-धीरे बहते हुए शरीर को सूकून दे रही थी। गजब का नशा था उस हवा में। लगा किसी साकी के दरवाजे को छूकर आ रही हो। आसमान के विस्तार में पूनमिया चांद की रोशनी अनंत तक बिखरी हुई थी। चांद धीरे-धीरे बगल वाले छत पर लगे मोबाईल टावर के ऊपर आ गया था। लगा कि वो रात भर चलते-चलते काफ़ी थक गया है और अब टावर पर पैर लटका कर कुछ देर आराम करना चाहता हो। अपने दो मेगापिक्सल मोबाईल कैमरे से मैंने चांद की नज़र उतारी। ये भी सोच रहा था, जैक्सन ने वर्षों पहले ऐसे ही चांद को देखकर मूनवॉक किया होगा। तभी हवा में कहीं से एक ख़ुशबू तैर आई। मां कहती थीं, रात में डायन खुशबू फैलाती हैं। नज़रें इधर उधर दस्त भर कर उस ख़ुशबू को ढ़ूंढने लगी। बगल वाले मकान में गर्ल्स हॉस्टल है। रात अपने पूरे शबाब पर थी। और एक अकेली लड़की उस छत पर अपने बाल संवार रही थी। चांद की दुधिया रोशनी उसे और हसीन बना गई थी। तभी जेहन में कहीं से तलत महमूद का ये वाला गाना याद आ गया.... ये हवा ये रात ये चाँदनी........तेरी एक अदा पे निसार है.....मुझे क्यूँ ना हो तेरी आरज़ू.......तेरी जुस्तजू मैं बहार है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-1245754255331216724?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/1245754255331216724/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=1245754255331216724&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/1245754255331216724'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/1245754255331216724'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/07/blog-post_08.html' title='ये हवा ये रात ये चाँदनी....!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SlPHZTgoLlI/AAAAAAAABls/1fLG0ZDL7BE/s72-c/Photo-0037.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-8655203840094061352</id><published>2009-07-07T05:14:00.010+05:30</published><updated>2009-07-07T10:07:41.989+05:30</updated><title type='text'>प्रणव बाबू...कुछ बचा सो मंहगाई मार गई।</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SlKMlw_8QDI/AAAAAAAABlM/hHxXp0l23aw/s1600-h/india.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355497487333081138" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 212px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SlKMlw_8QDI/AAAAAAAABlM/hHxXp0l23aw/s320/india.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; जब से होश संभाला है, बजट को बहुत गौर से देखता हूं। बचपन में पिता जी बजट देख कर प्लान बनाते कि फलां चीज सस्ती हो गई है, अब ख़रीदा जा सकता है। मां को हिदायत देते, तेल मंहगी हो गई है, थोड़ा संभल कर खर्च करो। शाम में यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसरों का घर पर मजमा लगता। पिताजी उनके साथ राजकोषीय घाटा, आयात-निर्यात, “पैसा कहां से आया, कहां गया” जैसे गुढ़ विषयों पर बहस करते। मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ता। थोड़ा बड़ा हुआ, आर्थिक विषयों पर समझ बढ़ी, तो मैं भी उस बहस में हिस्सा लेने लगा। लेकिन बजट घोषणाओं का मेरे व्यक्तिगत स्वास्थय पर कोई असर नहीं हुआ। ये भी सोचता था, कि पिताजी बजट को लेकर इतने उत्साहित क्यूं रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मैं कमाने लगा हूं, बचपन की आदतें भी जस की तस हैं। बजट आज भी मेरे लिए पवित्र दिन है। ऐसा क्यूं है, आज तक नहीं समझ पाया हूं। इस बीच कई सरकारें बदली, कई वित्त मंत्री आए और गए, लेकिन उनकी बजट घोषणाओं से आज तक कोई सार्थक बदलाव मेरी ज़िदगी में नहीं आया। कुल मिलाकर एक रूपए का भी फ़ायदा नहीं हुआ है। वो चाहे फिर मनमोहन सिंह हो, प्रणब दा, चिदंबरम या यशवंत सिन्हा, किसी भी बजट के बाद मैं या मेरे जैसे आर्थिक-सामाजिक हालात के लोगों के मुंह से यह सुनने को नहीं मिला है कि, वाह, इस साल तो काफ़ी बचत हो जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355497626839183938" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 213px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SlKMt4syckI/AAAAAAAABlU/DLk1mgV5cYQ/s320/vegvendor.jpg" border="0" /&gt;हम साल दर साल, पिछले वर्ष की तुलना में अधिक पैसा ख़र्च करते हैं। अब इसी बजट को ले लीजिए, एलसीडी मॉनिटर सस्ती हुई भी नहीं, कि मेरे इंटरनेट वाले ने अपना किराया बढ़ा दिया। चाय की पत्ती सस्ती हो गई है, लेकिन दूध का दाम आसमान छू रहा है। कार की क़ीमत घट गई है, पेट्रोल चार रूपए मंहगी हो गई। मेरे जैसे लोगों के लिए आयकर की सीमा में 10 हज़ार की बढ़ोत्तरी कर दी गई है, इससे मैं साल भर में करीब 1200 रूपए बचा लुंगा। ठीक इसके समानांतर समय में मैं 6 से 8 हज़ार ज्यादा खर्च करूंगा, क्योंकि सीएनजी 2 रूपए मंहगी हो गई है। कटवारिया से विडियोकॉन टॉवर पहले 75 रुपए में पहुंच जाता था, अब 90 रूपए लगता है। दिल्ली जैसे शहरों में सब्जी ट्रकों से मंडी में आती है, डीजल मंहगी हो गई है। रोजमर्रा के इस्तेमाल में आनेवाली आलू, भींडी, टमाटर भी 5 से 8 रुपए तक मंहगी हो गई है। &lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;हमारे जैसे लोग, ख़ासकर वे जो नौकरी करते हैं.....मुझे लगता है, हम में से अधिकतर नौकरीपेशा ही हैं। हमारे लिए कमोबेश बॉटम लाईन यही है कि बजट से पहले या उसके बाद, हमारी ज़िंदगी मे कोई विशेष बदलाव नहीं आता। हमारा खर्चा बढ़ता ही है, कभी कम नहीं होता। प्रणव बाबू नौकरीपेशा लोग बड़े ही संतोषी है। हमने कभी नहीं कहा कि मंहगाई कम कर दो, वो आपके हाथ में है भी नहीं। कम से कम यथास्थिति की गारंटी तो आप दे ही सकते थे। हमारे लिए वही बहुत था। हम उसी में ख़ुश हो जाते।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SlKMzNl_yHI/AAAAAAAABlc/0zSSiMKJUaw/s1600-h/Departmental_Stores_01.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355497718347188338" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SlKMzNl_yHI/AAAAAAAABlc/0zSSiMKJUaw/s320/Departmental_Stores_01.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;हम जैसे लोगों की भी अजीब त्रासदी है। गजब पाखंडी हैं। बजट के दिन टीवी फुल वाल्युम में देखते हैं। मंत्री महोदय अपने उबाऊ भाषण को रोचक बनाने के लिए मंडेला, कबीर, गांधी, नेहरू सबके आदर्शों का ज़िक्र करना नहीं भूलते। किसी का फ़ोन आता है तो उसे तुरंत निपटा देते हैं, या फिर कॉल एटेंड करते ही नहीं, इस आशा में कि इस बार सरकार मेरे लिए भी कुछ करेगी। लेकिन अंत में वही ढ़ाक के तीन पात....”ब्रांडेड आभूषण पूरी तरह से उत्पाद शुल्क से मुक्त किया जा रहा है, लक्जरी कारों पर निर्यात शुल्क शुन्य होगा।“ फिर सरकार को गरियाते हैं...। साल दर साल यही होता आ रहा है। मेरे दादा जी भी यही करते होंगे, पिताजी को भी यही करते देखा है, मैं भी वही कर रहा हूं, मुझे यकीन है मेरे बच्चे भी ऐसा ही करेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;शाम को दफ़्तर से घर के लिए निकलते ही बजट का असर दिख जाता है। ऑटो वाला अचानक अधिक किराया मांगने लगता है, पेट्रोल मंहगी हो गई है। सब्जी वाला कहता है, आज भर सस्ता ले लो, कल से दाम बढ़ जाएगा। फ्लैट के नीचे ही काम वाली मिल जाती है, कहती है, भैया भाव बढ़ गया है....इस महीने से चार्ज ज्यादा लगेगा। कुल मिलाकर पैसा 1 तारीख़ को एटीएम से आया और 20 तारीख़ आते-आते सब्जी वाला, दूध वाला, मकान मालिक, केबल वाला के हाथ चला गया। मैं माध्यम बन कर पैसे के इस लिक्विडिटी को देखता रहा। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;तो बताईये न प्रणव बाबू....आपके इस भारी-भड़कम सूटकेश में मेरे लिए क्या था???? कुछ भी तो नहीं....। आख़िर क्यूं मैंने ग़लतफहमी पाल रखी थी..... हर बार क्यूं भूल जाता हूं....मैं या मेरे जैसे करोड़ों लोगों के लिए सरकार के पास मंहगाई के सिवा देने के लिए कुछ नहीं है....कुछ भी तो नहीं है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-8655203840094061352?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/8655203840094061352/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=8655203840094061352&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8655203840094061352'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8655203840094061352'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/07/blog-post_07.html' title='प्रणव बाबू...कुछ बचा सो मंहगाई मार गई।'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SlKMlw_8QDI/AAAAAAAABlM/hHxXp0l23aw/s72-c/india.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-8847735351726740009</id><published>2009-07-03T04:18:00.007+05:30</published><updated>2009-07-03T04:52:47.817+05:30</updated><title type='text'>यस गे लार्ड....!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sk06vkemlcI/AAAAAAAABik/R5GiwmF0CQc/s1600-h/gaylord.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354000120933684674" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 222px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sk06vkemlcI/AAAAAAAABik/R5GiwmF0CQc/s320/gaylord.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;अरे भैया, अलेक्जेंडर द ग्रेट को क्यूं बदनाम करते हो। अब उसकी क्या ग़लती थी। बेचारे की आत्मा बहुत बद्दुआ दे रही होगी। ज़िंदा था तो किसी की हिम्मत नहीं हुई कि उसके ख़िलाफ एक लाईन भी बोल दे। अब मरने के करीब दो हजार साल बाद उसे गे घोषित कर दिया। ब्रांड एंबेस्डर बना दिया। आइकन....कि जब सिकंदर गे होकर भी महान हो सकता है, तो हम क्यूं नहीं। हाई कोर्ट का जजमेंट क्या आया, ऐसा हो हंगामा हुआ, लगा कि भारत विश्व कप जीत गया है। टीवी वाले तो निहाल हो गए। ख़बर तान दो, पूरा मसाला है। अंग्रेज़ी चैनल के डेस्क पर आवाज़ आई, 'यस, वी डीड इट"। जजमेंट की कॉपी जज साहब लिख भी नहीं पाए थे, उससे पहले ही टीवी पर व्याख्या शुरू हो गई। सेलीना जेटली का भाव सातवें आसमान पर पहुंच गया। गेस्ट कार्डिनेशन वाले उन्हें फ़ोन लगा-लगा कर हलकान हो गए। “अभी एनडीटीवी पर हूं, अभी टाईम्स नॉउ पर”। जामा मस्जिद के शाही इमाम बिफरे, “हम इस क़ानून को नहीं मानते।" मत मानो, रोक सकते हो तो रोक लो। रामदेव जी कैसे चुप रहते, “मानसिक रूप से बीमार लोग ही समलैंगिक संबंधों के चंगुल में फंसते है”। पहली बार सभी धर्मों के ठेकेदार एक साथ आ खड़े हुए। फादर, आचार्य, मौलाना सभी आशंकित कि गया धर्म पानी में...कर दिया नाश, ऐसी कामुकता...राम, राम, राम। क्लचर यानि संस्कृति का क्या होगा। अब संगम से स्नान करने से भी पाप नहीं धुलेगा।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sk07HiORG2I/AAAAAAAABi0/-A1-c9adLwE/s1600-h/princemohil.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354000532645157730" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 298px; CURSOR: hand; HEIGHT: 300px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sk07HiORG2I/AAAAAAAABi0/-A1-c9adLwE/s320/princemohil.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; हवलदार साहब भी परेशान। अब पार्कों में किसको डंडा दिखाकर 50 रूपया ऐंठेगे। सबकुछ खुल्लम खुल्ला होगा। हैप्पी एंड फ्री टू बी गे। सरकार भी चुप है...ठीके हुआ, कानून लाते तो तोहमत लगता कि समाजिक दुराचार को बढ़ावा दे रहे हैं। देखा जाएगा, ज्यादा हंगामा हुआ तो दे देंगे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती। ऐसे भी धारा 377, 1860 का कानून है...समय बदल गया है, पसंद भी। ऐसे भी यह धारा, 1860 में लार्ड मैकाले ने बनाई थी। शिक्षा सुधार में मैकाले के योगदान के बारे में तो बचपन से रटाई गई है। लेकिन बंदे ने यहां भी कमाल किया था, यह नहीं मालूम था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sk07DcsOmVI/AAAAAAAABis/3tYIzOs42vQ/s1600-h/gay.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354000462440733010" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 270px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sk07DcsOmVI/AAAAAAAABis/3tYIzOs42vQ/s320/gay.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;पटना में गे शब्द से मेरा कोई ख़ास परिचय नहीं था। दोस्त एकाध दुराचारी, अत्याचारी के बारे में बताते रहते थे, लेकिन देखा कभी नहीं था। 2004 में आईआईएमसी में आया। तकरीबन उसी वक्त पुश्किन चंद्रा कांड सुर्खियों में आया था। संस्थान में आए हुए हफ्ता भर ही हुआ था कि प्रोफ़ेसर राघवचारी नें हमें 5 मिनट का फ़िल्म बनाने का एसाइनमेंट दे दिया। मेरा ग्रुप सी-2 था। मरे साथ ऋषि और रोहित थे। हम तीनों ने एक-एक आईडिया दिया, मैंने कहा कि दिल्ली में रिक्शेवाले पर बनाते हैं, रोहित ने कुछ और कहा। लेकिन ऋषि का आईडिया क्रांतिकारी था। बोला गे पर फिल्म बनाते हैं। हम दोनों, यानि मैं और रोहित झिझक रहे थे। अरे नहीं यार, लोग क्या सोचेंगे...। फिर ऋषि ने हमें अंग्रेजी में समझाया कि यही एक तरीका है पूरे संस्थान की नज़र में आ जाओगे। मन मारकर हम तैयार हो गए। ‘गे लार्ड’ बन गई और हमारे तब के स्टैंडर्ड से बेहतरीन थी। पूरे संस्थान को मंच पर दिखलाया गया था। जो भी गेस्ट लेक्चर होता, उससे पहले सीआर (क्लास रिप्रेंजेंटेटिव) गेस्ट को वह फ़िल्म दिखलाता। हम भी मन ही मन सोचते कि साला अगला अकीरा कुरोसावा तो हम ही हैं। एक समस्या और थी। फ़िल्म के ग्लोबल रीलीज़ के बाद छात्र और छात्राएं जब भी मुझे और ऋषि को साथ देखते तो मुस्कुरा देते....। कैंपस के लौंडों की नज़र तो हमारे कमर के नीचे ही ठिठक जाती थी। फीजिकल एविडेंस खोजते होंगे। यही सोचते होंगे, कि दोनों गे हैं। लाईन मारने के लिए लड़कियों की क्रायसिस हो गई थी। फ़िल्म की सीडी बनाकर घर (पटना) भी ले गया था। उस सीडी में हमारे और भी काम थे। पिताजी ने नशाखोरी पर मेरी फ़िल्म देखकर तारीफ़ की थी, लेकिन गे लार्ड देखते ही चुप हो गए। समझ गए थे, बेटवा गया काम से....। किंतु-परंतु....लोगों को सीडी दिखाकर कहते, लड़का प्रोग्रेसिव हो गया है!!!  फ़िल्म को भारतीय सूचना सेवा के अधिकारियों को भी दिखाई गई थी। आज भी संस्थान के हरेक बैच के बच्चों को हमारी फ़िल्म जरूर दिखाई जाती है। दो-तीन दिन में उसे यू-ट्यूब पर डाल दूंगा। पूरी दुनिया देखेगी। ख़ैर, व्यक्तिगत रूप से मैं कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत करता हूं। लेकिन समस्या अभी और भी है। समलैंगिक संबंधों को कानूनी मान्यता तो मिल गई, लेकिन इसे सामाजिक मान्यता मिलने में अभी काफ़ी वक्त लगेगा। और असली चुनौती वहीं है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-8847735351726740009?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/8847735351726740009/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=8847735351726740009&amp;isPopup=true' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8847735351726740009'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8847735351726740009'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='यस गे लार्ड....!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sk06vkemlcI/AAAAAAAABik/R5GiwmF0CQc/s72-c/gaylord.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-3547594191103814661</id><published>2009-07-01T18:31:00.006+05:30</published><updated>2009-07-01T20:10:29.049+05:30</updated><title type='text'>8, 14, 17, 25, 28, 38…100….???</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5353476244258797170" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 204px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SkteR7yJtnI/AAAAAAAABiE/-EpApcUiGX8/s320/610x.jpg" border="0" /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;अब जब गृह मंत्रालय ने सार्वजनिक कर दिया है कि उसके ऊपर 10 नए राज्य बनाने का दवाब बढ़ रहा है। ऐसे में ये बहस उठना लाजिमी है कि व्यक्तिगत और जातिगत राजनैतिक महत्वकांक्षा को जन कल्याण का जामा पहनाकर देश को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटना कहां तक जायज है।&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;महान मुगलिया सल्तनत के पतन के साथ ही भारत कई टुकड़ों मे बंट गया। केंद्रीय सत्ता के कमजोर होते ही छोटे-बड़े राजे रजवारों और नवाबों ने अपनी-अपनी रियासत को आजाद घोषित कर दिया। नतीजा यह हुआ कि 18 वीं सदी के मध्य तक भारतीय उप-महाद्वीप करीब 600 हिस्सों में बिखर चुका था। इसी बंटे हुए भारत में राबर्ट क्लाईव कहीं से आता है और जून 1757 में पलासी की ऐतिहासिक लड़ाई में नवाब सिराजुद्दौला को हराकर भारत में अंग्रेज़ी सत्ता को स्थापित कर देता है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;क्लाइव की जीत के पीछे अंग्रेज़ी सेना का कोई योगदान नहीं था। उसने इन्हीं छोटे-बड़े राजा, नवाबों की सेना की बदौलत इस जीत को हासिल किया था। बंटे हुई सेना के भीतर राष्ट्रीयता की भावना थी ही नहीं। इसलिए एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए, अंग्रेजों का साथ देने में वे जरा भी नहीं हिचके। ठीक 100 साल बाद 1857 में अंग्रेज़ों नें विद्रोह को दबाने के लिए फिर से यही तरीका अपनाया। इस बार विभाजन वर्ग और क्षेत्र के नाम पर किया गया। सेना मराठा, सिख, मुसलमान, राजपूत, जाट के नाम पर बंट गई। आज जो हमारे अंदर ‘भारत एक राष्ट्र’ की भावना है, उस वक्त नहीं थी। अप्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिश राज का एक फ़ायदा यह हुआ कि हम भारत को एक देश के रूप में देखने लगे। भारतीयता का पुनर्जन्म होता है। एक राष्ट्र जिसका कोई निश्चित आर्थिक-सामाजिक स्वरूप नहीं था। लेकिन एक स्थापित भौगोलिक अभिव्यक्ति थी। लद्दाक से कन्याकुमारी और अरुणाचल से कच्छ तक फैला हुआ “इंडिया, दैट इज भारत”।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;आजादी के 62 वर्षों बाद आज हम जहां हैं, दुनिया में हमारी जो भी हैसियत है- उसके पीछे यही भारतीयता की भावना है। हमारी इसी एकता और अखंडता के बदौलत हम वैश्विक मंच पर सिर उठा कर खड़े होते हैं। कुंठित भावनाओं और तुच्छ राजनेतिक स्वार्थ को आगे रखकर देश को छोटे-छोटे राज्यों में बांटने की साजिश चल रही है। और इस साजिश का पहला शिकार भारतीयता ही होगी।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SktoZbLhYbI/AAAAAAAABic/Z_YFHpTC13c/s1600-h/indiamap.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5353487368062067122" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 295px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SktoZbLhYbI/AAAAAAAABic/Z_YFHpTC13c/s320/indiamap.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अब जरा इन मांगों पर गौर करें-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;1. गुजरात से सौराष्ट्र&lt;br /&gt;2. आंध्र प्रदेश से तेलंगाना&lt;br /&gt;3. महाराष्ट्र से विदर्भ&lt;br /&gt;4. पश्चिम उत्तर प्रदेश से हरित प्रदेश&lt;br /&gt;5. यूपी से बुंदेलखंड&lt;br /&gt;6. बिहार से मिथिलांचल&lt;br /&gt;7. कर्नाटक से कुर्ग&lt;br /&gt;8. पश्चिम बंगाल से गोरखालैंड&lt;br /&gt;9. पश्चिम बंगाल और असम के कुछ जिलों को मिलाकर ग्रेटर कूच बिहार&lt;br /&gt;10. पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ के कुछ क्षेत्रों को मिलाकर भोजपुर राज्य&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;ऐसा नहीं है कि गृह मंत्रालय नए राज्यों के निर्माण में जल्दबाजी दिखा रहा है। लेकिन सूची में पहले से मौजूद 28 राज्यों में इन 10 को जोड़ कर आप भविष्य की कल्पना कर सकते हैं। चलिए मान लेते हैं कि सरकार इन 10 राज्यों को हरी झंडी दे देती है। फिर क्या होगा....? यकीन मानिए 10 और राज्यों की मांग सामने आ जाएगा। आप शायद यकीन नहीं करेंगे। अपनी यादास्त कुछ साल पीछे नवंबर 2000 में ले जाएं। उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा राज्य होता था। उसको काट कर उत्तराखंड निकाला गया। अब यूपी से ही बुंदेलखंड और हरित प्रदेश निकाली जाएगी। झारखंड, बिहार से अलग हुआ था। अब बचे हुए बिहार से मिथिलांचल और भोजपुर राज्य काटा जाएगा। ये कभी नहीं मरने वाला कीड़ा है। एक चक्रव्युह है, फंस गए तो निकलना मुश्किल है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SktebXSLkFI/AAAAAAAABiM/1tqmjJFx-Iw/s1600-h/andra-pradesh-with-telangana-map_7071.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5353476406259716178" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 303px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SktebXSLkFI/AAAAAAAABiM/1tqmjJFx-Iw/s320/andra-pradesh-with-telangana-map_7071.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;एक बार सौराष्ट्र, गुजरात से अलग हुआ नहीं कि कच्छ वाले अलग राज्य की मांग करने लगेंगे। आंध्र प्रेदेश में तेलंगाना के देखादेखी रॉयलसीमा में भी नए राज्य की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। आंध्र में ही हैदराबाद क्षेत्र के मुसलमान अपने लिए अगल उर्दू राज्य चाहते हैं। फिर बिहार में मगह, अंग....उत्तर प्रदेश में रोहैलखंड...। एक बार ये सिलसिला चल पड़ा तो फिर 100 से पहले रुकना मुश्किल है। हलांकि 100 राज्य, 600 रियासतों की तुलना में काफ़ी कम है। लेकिन एक बात तो तय है कि इससे देश कमजोर होगा। अलगाववादी प्रवृत्तियों को और बल मिलेगा। राज्यों का आपस में अभी से कार्डिनेशन नहीं है। 100 राज्य हो गए तो फिर कहना ही क्या..। निश्चित रूप से पाकिस्तान और चीन इसका जमकर फ़ायदा उठाएंगे। आतंकवाद विरोधी मुहीम की ऐसी-तैसी हो जाएगी। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;हलांकि कुछ नए राज्यों की मांग जायज भी है। कुई राज्यों में ऐसे क्षेत्र हैं, जहां पिछले 62 वर्षों में विकास काग़जों और फाईलों में ही सिमट कर रह गई है। ज़मीन पर कुछ ख़ास नहीं हुआ। जैसे की तेलंगाना। आंध्र प्रेदेश जैसे अपेक्षाकृत तरक्की करनेवाले राज्य में तेलंगाना बेहद ही पिछड़ा है। कुछ ऐसे भी क्षेत्र हैं जो अपनी संस्कृति को बचाने के लिए अलग राज्य की मांग कर रहे हैं। जैसे कर्नाटक का कुर्ग जिला। कुछ जगहों पर राज्य की राजनीति में किसी जाति विशेष के वर्चस्व को तोड़ने और नए समीकरण बनाने के लिए अलग राज्य की मांग उठ रही है। यहां भी हम तेलंगाना का उदाहरण ले सकते हैं। ओबीसी, तेलंगाना राज्य की सियासत में अपनी हिस्सेदारी और हैसियत को और बढ़ाना चाहते हैं। अब सवाल यह है कि तेलंगाना जैसे राज्यों के गठन का आधार क्या हो???? जाति विशेष की राजनैतिक महत्वकांक्षा, या फिर क्षेत्र का व्यापक विकास??? &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अनेकता में एकता ही अपने मुल्क की खासियत है। हमारे नीति-निर्माताओं को कोई भी फ़ैसला लेने से पहले सोच लेना चाहिए कि उनके फ़ैसले से यह सामंजस्य गड़बड़ा तो नहीं रहा है। ध्यान रहे, हमारे दरवाजे पर कई राबर्ट क्लाईव घात लगाए खड़ा है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;अभी गूगल पर सर्च किया तो पया कि इन 10 के अलावा ये 15 भी लाईन में हैं :-&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;ol&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;BODOLAND -&lt;/strong&gt; The agitation for the creation of a separate Bodoland state resulted in an agreement between the Indian Government, the Assam state government and the Bodo Liberation Tigers Force. &lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;DELHI AND PONDICHERRY-&lt;/strong&gt; Both Delhi and Puducherry are Union Territories with their own legislatures and chief ministers, but they are not yet full states. A plea for full statehood has been passed by the legislative assembly of Puducherry. &lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;KODAGU-&lt;/strong&gt; The demand for creation of a separate Kodava state, a region of Karnataka, is based on the region having a distinct culture, rather than on allegations of discrimination and neglect. &lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;TULU NADU -&lt;/strong&gt; The demand for creation of a separate state of Tulu Nadu,a region of karnataka and kerala,is based on having a distint culture and language of Tulu Nadu which is Tulu . &lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;PURVANCHAL –&lt;/strong&gt; Western Bihar &amp;amp; Eastern UP &lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;VIDARBHA –&lt;/strong&gt; Maharashtra&lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;ANGIKA -&lt;/strong&gt; Angika speaking state in Bihar. Angika has 30 million speakers. &lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;BHILKHAND-&lt;/strong&gt; from parts of Gujarat and Maharashtra.&lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;GONDWANA-&lt;/strong&gt; which would include portions of Andhra Pradesh, Chhattisgarh, Madhya Pradesh, and Maharashtra.&lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;ICHIKANCHAL &lt;/strong&gt;from Bihar. &lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;KAMTAPUR &lt;/strong&gt;in northern parts of West Bengal. The proposed state consists of the districts of Koch Behar, Jalpaiguri, and southern plains of Darjeeling including Siliguri city.&lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;KARBI ANGLONG&lt;/strong&gt; in Assam. &lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;RAYALASEEMA,&lt;/strong&gt; Andhra Pradesh &lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;VINDHYA PRADESH,&lt;/strong&gt; Madhya Pradesh &lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;MUMBAI OR BOMBAY&lt;/strong&gt;, Maharashtra &lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-3547594191103814661?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/3547594191103814661/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=3547594191103814661&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/3547594191103814661'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/3547594191103814661'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/07/8-14-17-25-28-38100.html' title='8, 14, 17, 25, 28, 38…100….???'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SkteR7yJtnI/AAAAAAAABiE/-EpApcUiGX8/s72-c/610x.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-4252555085589336326</id><published>2009-06-30T00:35:00.006+05:30</published><updated>2009-06-30T01:12:23.869+05:30</updated><title type='text'>तू आज भी दगा दे गई...!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SkkQuSGai-I/AAAAAAAABh8/86AYvPW3NLA/s1600-h/Photo-0011.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352828019425315810" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SkkQuSGai-I/AAAAAAAABh8/86AYvPW3NLA/s320/Photo-0011.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;आज भी तेरा इंतज़ार करता रहा। दिन भर आसमान में बादलो की लूका-छिपी देखी। दिन के तीन बजे ठंडी हवा के हल्के झोकों ने इशारा किया....तुम कहीं आसपास ही हो। ख़ुश इतना हुआ कि चलती गाड़ी से उतर कर तुम्हारी आहट की तश्वीर उतारी। तुम गरजी भी, लेकिन बरसी नहीं.....बहुत हुआ, अब मत सताओ। बरसो बरखा रानी, झमाझम बरसो....।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;तश्वीर-&lt;/span&gt; कनॉट प्लेस, शाम के 6.30 बजे।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-4252555085589336326?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/4252555085589336326/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=4252555085589336326&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/4252555085589336326'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/4252555085589336326'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/06/blog-post_30.html' title='तू आज भी दगा दे गई...!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SkkQuSGai-I/AAAAAAAABh8/86AYvPW3NLA/s72-c/Photo-0011.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-2883133321827479589</id><published>2009-06-28T23:24:00.005+05:30</published><updated>2009-06-28T23:42:31.568+05:30</updated><title type='text'>'मुंबईया नगरवधू' का स्वयंवर</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Skeu4cWYk_I/AAAAAAAABes/rcXnRzzLHV4/s1600-h/4.jpg"&gt;&lt;img style="TEXT-ALIGN: center; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; DISPLAY: block; HEIGHT: 197px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352438966859109362" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Skeu4cWYk_I/AAAAAAAABes/rcXnRzzLHV4/s320/4.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;ख़ुशी, डर, घबराहट...इतने एहसास एक साथ कभी महसूस नहीं किया। कल से शुरू होगा मेरा सबसे बड़ा इम्तेहान...। राखी का स्वयंवर कल रात सिर्फ़ एनडीटीवी इमेज़िन पर...।&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;राखी ब्यूटी पार्लर से सच-धज कर लौट आई हैं। टेलीविजन चैनल्स पर राखी के इस स्वयंवर का जोर-शोर से ढ़ोल पीटा जा रहा है। और पीटे भी क्यूं नहीं। ख़बरों का सुखाड़ है, ऐसे में स्वयंवर के कटपीस विजुअल्स का सहारा ही तो है। 1-2 महीने तो आराम से कट जाएंगे। हरेक एपिसोड के साथ न्यूज़ चैनल्स संभावित वर के घर से लाईव चैट, मां-बाप, रिश्तेदारों का रिएक्शन दिखाएगी। अगले एपिसोड में इंट्री के साथ ही लड़के के घर के बाहर जश्न को माहौल होगा, जिसे चैनल्स कभी मिस नहीं करेगी, भले ही आकाल पर कैबिनेट की बैठक उनके डे प्लान में छूट जाए। राखी मिस नहीं होनी चाहिए। सुशांत कुछ दिनों से शादी के लिए व्याकुल हैं। मैंने कहा क्यूं नहीं राखी के लिए ट्राई करते हैं। बोले, राजीव प्लीज डोंट वेस्ट माइ टाईम। मूड ख़राब कर दिया। ऐसे राखी कोई नया काम तो कर नहीं रही हैं। पुराने जमाने में राजकुमारियां स्वयंवर द्वारा अपने वर का चुनाव करती थीं। सीताजी ने राम का स्वयंवर किया था, रुक्मिणी ने भगवान कृष्ण को वरा, द्रोपदी ने अर्जुन को। अंतर सिर्फ़ कैमरों का है। अंतर सिर्फ़ कमाई का है। एनडीटीवी की माली हालत कुछ ठीक नहीं है। ऐसे में यह टीवी चैनल राखी सावंत के जरिए कमाई के लिए यह स्यवंवर रचा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SkevF3ANcpI/AAAAAAAABe8/mgkO4mJFQ2c/s1600-h/08sd3.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 244px; FLOAT: left; HEIGHT: 320px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352439197352161938" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SkevF3ANcpI/AAAAAAAABe8/mgkO4mJFQ2c/s320/08sd3.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;देश भर से 16 'बदकिस्मत' कुंआरे बकरों को चुना गया है, जो इस कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। ये सभी प्रतियोगी राखी के साथ एक ही छत के नीचे रहेंगे। राखी से शादी करने आए इन प्रतियोगियों को राखी हर सप्ताह नौकरों की तरह कुछ न कुछ काम देंगी, जिसे उन्हें पूरा करना होगा। काम को ठीक से न करने वाले या पूरा न करने वाला 'सौभाग्यशाली' प्रतियोगी एक-एक कर प्रत्येक सप्ताह बाहर होता जाएगा। आख़िर में जो बचेगा, राखी उससे शादी करेंगी। इसमें राखी अपने दोस्तों की भी मदद लेंगी। दो दोस्त तो प्रोमो में दिख गए हैं, एक राम कपूर हैं, जिनका नाम मैंने पहली बार सुना है। दूसरे रवि किशन हैं। रविया, राखी का भाई बना है। अब पैसा जो न कराए। रविया को मैं थोड़ा गंभीर समझता था। पता नहीं वो कब चिरकुट हो गया। भाई के रोल में उसे देख कर बजरंगी भैया की याद आती है। पटना कॉलेज में मेरे साथ थे। जैसा नाम, वैसा काम। कोशिश तो बहुत किया कि किसी कुमारी कन्या के साथ टांका भिड़ जाए। लेकिन मुक्कदर में भैया बनना ही लिखा था, और वही हुआ। आज भी भैया हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;राखी सावंत ज्यादा शिक्षित नहीं हैं, सुंदर भी नहीं हैं और अभिनय में भी उन्हें कोई महारत हासिल नहीं है। इन सब कमियों के बावजूद वह एक ब्रांड बन चुकी हैं। भारत में रंगीन टेलीविजन और प्राइवेट चैनलों के आगमन के बाद कुछ अजूबे प्रायोजित हुए हैं जिनमें से एक राखी सावंत हैं। और दूसरा इंडिया टीवी है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Skeu--lT0lI/AAAAAAAABe0/bWGi9xPUo9E/s1600-h/rakhiapril29_full.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 219px; FLOAT: right; HEIGHT: 320px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352439079127732818" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Skeu--lT0lI/AAAAAAAABe0/bWGi9xPUo9E/s320/rakhiapril29_full.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;मैं जानता हूं, पूरी हिंदी पट्टी इस शो को सांस थाम कर देखेगी। इस देश का दुर्भाग्य है, जहां एक ओर साधारण, सहज और सामान्य होना हाशिए में फेंक दिया गया है। गिरीश कर्नाड के नाटक ‘हयवदन’ में प्रकरण है कि एक स्वयंवर में राजकन्या ने भाग लेने वाले किसी भी राजकुमार को पसंद नहीं किया और वरमाला एक घोड़े के गले में डाल दी। वह घोड़ा एक शापित यक्ष था और शादी के बाद अपने असली स्वरूप में प्रकट हुआ। बतौर इसी किवदंती के राखी सावंत अंतिम एपिसोड में वरमाला कैमरे के गले में डाल सकती हैं, इस आशा में कि सुहागरात के प्रथम चुंबन से वह राजकुमार के रूप में प्रकट होगा। एक संभावना यह भी है कि अंतिम एपिसोड से पहले शो में अभिषेक अवस्थी का लैटरल इंट्री हो जाए और राखी सोलहों प्रतियोगी को बाहर का रास्ता दिखला कर अभिषेक के गले में वरमाला डाल दे। ऐसे, राखी सावंत को हमेशा ही कैमरे से प्यार रहा है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-2883133321827479589?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/2883133321827479589/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=2883133321827479589&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2883133321827479589'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2883133321827479589'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/06/blog-post_2823.html' title='&apos;मुंबईया नगरवधू&apos; का स्वयंवर'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Skeu4cWYk_I/AAAAAAAABes/rcXnRzzLHV4/s72-c/4.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-4697724420084007489</id><published>2009-06-28T02:10:00.006+05:30</published><updated>2009-06-28T17:14:03.816+05:30</updated><title type='text'>जैक्सन, धर्म और चैनल का टॉप बैन्ड..!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 240px; FLOAT: left; HEIGHT: 320px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352110460402006866" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SkaEG2bp-1I/AAAAAAAABek/UJ95g93XIsw/s320/JCAKSON.JPG" /&gt;जैक्सन का विवादों से ताउम्र चोली-दामन का रिश्ता रहा। अब जाने के बाद उनके अंतिम संस्कार को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। मौत से पहले जैक्सन किस धर्म को मानते थे?? इसाई या इस्लाम???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ैर, जहां तक मेरी जानकारी है, इसाई और इस्लाम दोनों धर्मों में मृत्यू के बाद दफ़नाया ही जाता है। क्रिस्चैनिटी में इस संस्कार को ‘वैटिकम’ और इस्लाम में ‘अल-दफ़ीन’ कहते हैं। अंतिम संस्कार का तरीका अलग-अलग है, लेकिन अंत में शरीर को दोनों धर्मों में दफ़नाते ही हैं। अगर जैक्सन ने इस्लाम कुबूल कर लिया था, तो उन्हें दफ़नाया जाएगा। अगर वे मृत्युपरांत इसाई ही रहे, फिर भी उन्हें दफ़नाया ही जाएगा। ऐसे में किसी नेशनल न्यूज़ चैनल का यह टॉप बैंड, वाकई सोचने को विवश करता है। शायद इसे मानसिक दिवालियापन कहना ही ठीक होगा। एक बात और...जैक्सन ख़ुद ही दफ़न कैसे हो सकते हैं...। 'क्या दफ़नाए जाएंगे जैक्सन?', ज्यादा सही नहीं होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैक्सन सदी के कुछेक माहनतम कलाकारों में से थे। ऐसे में उन्हें किसी धर्म से जोड़ना कहां तक जायज है?? कलाकार तो मज़हब और मुल्क की सरहदों से परे होता है न।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-4697724420084007489?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/4697724420084007489/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=4697724420084007489&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/4697724420084007489'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/4697724420084007489'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/06/blog-post_28.html' title='जैक्सन, धर्म और चैनल का टॉप बैन्ड..!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SkaEG2bp-1I/AAAAAAAABek/UJ95g93XIsw/s72-c/JCAKSON.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-6863367547270471775</id><published>2009-06-26T01:35:00.009+05:30</published><updated>2009-06-29T05:14:14.813+05:30</updated><title type='text'>शिक्षा आज के परिपेक्ष्य में...</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5351360560880508594" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 136px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SkPaE9BRXrI/AAAAAAAABd8/P4vQQzeluB4/s320/2076355502_896d2ce200.jpg" border="0" /&gt;यह लेख चार साल पहले 2005 में लिखा था। शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव पर कपिल सिब्बल के क्रांतिकारी विचार और समाज में शिक्षा के मूल उद्देश्य को लेकर चलने वाले बहस के मद्देनज़र यह लेख हमेशा ही प्रासंगिक रहेगा। शिक्षा क्यों, कैसा हो, उसका सामाजिक-आर्थिक संदर्भ क्या हो...ऐसे सैकड़ों सवाल हैं, जिनपर नए सिरे से बहस की जरूरत महसूस की जा रही है। ऐसे में कपिल सिब्बल के कुछ सुझाव वाकई स्वागत योग्य हैं। हलांकि, 10वीं की बोर्ड परीक्षा ख़त्म करने जैसे प्रस्ताव पर मैं व्यक्तिगत रूप से सहमत नहीं हूं...।&lt;/span&gt; -&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;राजीव&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;...................... &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;ये विषय इतना जटिल है और विशाद है की मेरे लिए कुछ भी लिख पाना असंभव लग रहा है। शिक्षा का उद्देश्य क्या है? ये बताना मेरे लिए ज्यादा मुश्किल है। शिक्षा का उद्देश्य क्या नही है? ये बताना मेरे लिए ज्यादा आसान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिक्षा का उद्देश्य मदरसों में की जाने वाली मासूमों की ब्रेन-वाशिंग और कंडिशनिंग नही है, भगवा ब्रीगेड खड़ा करना नही है। शिक्षा का उद्देश्य तो किसी भी धार्मिक कंडिशनिंग को हटाना है। शिक्षा का पहला उद्देश्य है की दिमाग को एक ही लीक पर चलने से कैसे बचाएं वो सिखाना, सीखे हुए को जरूरत पड़ने पर अनसीखा करना और किए हुए को अन किया करना, ये गुर देना है। शिक्षा का उद्देश्य एक जैसी विचारधारा वालों की जमात खडा करना नही है। शिक्षा का उद्देश्य उन सवालों के रेडी मेड जवाब देना नही है जो अभी मन में उठे ही नही। तोता रटंत समाज बनाना नही है। शिक्षा का उद्देश्य अनुशासित पर आज्ञाकारी नही हों अराजक हों निर्भय हों प्रयोगधर्मी हों ऐसे खुले दिमाग वाले बागी खडे़ करना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा बस चले तो हर विद्यालय की एक सबसे मजबूत दिवार गिरा दूं ताकी ताजी हवा अंदर जा सके - शिक्षक को पढाने से पहले सुबह टूटी दिवार दिखा दूं की देख - तेरा काम गढने से ज्यादा तोडना है - पुरानी कंडिशनिंग तोडना और अगर तुझे दूसरों की कंडिशनिंग तोडना है तो पहले अपनी तोड! भारत को अगर कुछ भी अराजक करना है तो शिक्षा तंत्र के साथ भयंकर प्रयोग कर के ही रास्ता निकल सकता है। हम प्यास जगने से पहले ही पानी में ढकेल देते हैं प्रश्न जागने से पहले ही उनके उत्तर रटा देते हैं नंबर आ जाते हैं पास हो जाते हैं - एक पागल समाज हैं हम। मां-बाप, शिक्षक, बडे सब अपने आज्ञाकारी गुलाम गढने के चक्कर में, सम्मान करवाने के प्रपंच में एक ढोंगी समाज मे जी रहे हैं तो नेतृत्व का गुण कहां से आएगा सृजनशीलता कहां से पनपेगी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां हम नौकर गढ सकते हैं, प्रोग्रामर गढ़ सकते हैं - ट्रेनिंग है - पिछलग्गु गढ सकते हैं परन्तु कोई सृजनशील कर्ता नही गढ़ सकते - वो मिट्टी, पानी, हवा नही है हमारे पास। जमीनतोडू ओरिजिनल कुछ नही गढ पाए हम! अंग्रेजी आती है सो देखा देखी नकल-पट्टी का सहारा है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय समाज मूलभूत रूप से रूढीग्रस्त है और मेरा बस चले तो पूरे समाज को ४४० वोल्ट के झटके देने वाले उपाय बना दूं। पर ये सब नही हो सकता - कारण हैं हम! हम जैसे हैं वैसे ही हैं और रहेंगे - कोई झूठी उम्मीद और दिलासा नहीं है! बदकिस्मती है क्योंकि हम बदतर हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5351360276373120034" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 225px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SkPZ0ZJbJCI/AAAAAAAABds/jS93WDfE8uM/s320/xin_480602290910994232956.jpg" border="0" /&gt;&lt;strong&gt;शिक्षा आज के परिपेक्ष्य में वही है जो हमेशा से रही है। जा की रही भावना जैसी वाली बात है। शिक्षा का प्रभाव हर आदमी और हर समाज पर अलग अलग होता है। हम पर जो असर है देख लो -&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;देसी बच्चे हर जिद मनवाने को बुक्का फ़ाड के बेसुरा रोते हैं और जिस बात को मना करो वही करते हैं! आलस, अनुशासनहीनता और उद्दंडता हमारा तौर है, चाटुकारी और गद्दरी इतिहास है - सृजनात्मकता से वास्ता नही है। जीन ही खराब है! अब गधे को घी पिलाओ और अरबी घोडे से एड लगवाओ क्या होगा? गधा और बिमार पड़ जायेगा ना! चलो बाकी सब के सामने नौटंकी जरूरी रही पर हम हिंदी मे आपस में जबरदस्ती का ढोंग कर के क्या लाभ? हमारे लिए शिक्षा नौकरी पाने का साधन बनी है क्या कम है? अगर हम इतना ठीक-ठाक समाज गढ लें की हर आदमी दो जून की रोटी खा ले इज्जत से - बहुत है यार! हम जैसे हैं उस के बावजूद मेरा भारत महान का नारा गढ़ लेते हैं - हमारी शिक्षा नें हमें सच बोलना तक तो सिखाया नही! जापान और जर्मनी में जनता को अंग्रेजी नही आती - अपने दम पर बने हैं। उधार की भाषा, शोध और विचार पर नही। हम को आती है अंग्रेजी, दुनिया भर के ज्ञान पढ सकते हैं - क्या कर लिये? कैसा गढा समाज? क्या फ़रक है?&lt;br /&gt;काम हमारा नाम उनका। हम नौकर वो मालिक! बाजार हमारे उत्पाद उनके। क्यों हुआ ऐसा? हम कमीने हैं इस लिए - कृष्ण ने बोला कर्म कर हमने कृष्ण की भक्तिरस की धारा बना दी- कर्म तो नही होगा यार आप ही भाग्य संवार दो प्रभू!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शरीर पर राख मल कर उसकी नश्वरता का पाठ पढाया अब उसी शरीर को सुख देने का प्रपंच कर क्या लाभ - देखो हमारा मेनिपुलेशन! फ़िर जो कहा उसे बस कहा किये कुछ नही - प्रवचन और प्रवचन - फ़िर ढोंग! कितने घटिया हैं हम!! बहुत गहरा है ये कैंसर। संस्कार बहुत घातक हैं हमारे। पर ये संस्कार हमको इस लिए सुहाए की हमारी जीन ही खराब है या इन संस्कारों ने खराब किया हमको? लड़ लो! और अब तो 120 करोड़ हैं हम - बहुत बुरा आलम है!! बहुत ही बुरा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानव के व्यक्तित्व पर वंशानुगत गुण ज्यादा हावी होते हैं या शिक्षा? मानव मस्तिष्क ज्यादा जटिल है या मानव मन? दोनो में से कौन किस कि कार्यप्रणाली को सीमित या नियंत्रित करता है? देसी लोग आलसी हैं इसलिए भाग्यवादी हैं या भाग्यवादी हैं इस लिए आलसी हैं? &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5351360388703346402" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 238px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SkPZ67nCXuI/AAAAAAAABd0/8_5lHf7dOnw/s320/aadbd4a7db26f5eb89479ff36084d372.jpg" border="0" /&gt;भारतीय समाज में शिक्षा का उद्देश्य धनोपार्जन तक सीमित है। बाकी सब बालीवूड की फ़िल्मों में अच्छा लगता है! फ़िल्म आवारा का राजू एक जज का बेटा है जिसको एक गुण्डे ने चोर बनाया है। अब पूरी फ़िल्म ये सिद्ध करने में खर्च है की चोर का बेटा चोर ही हो और जज का बेटा जज ही हो जरूरी नही है - परिस्थितियां और शिक्षा सब बदल देती हैं - शिक्षा शरीफ़ को शैतान और शैतान को शरीफ़ बना सकती है। फ़िल्म हिट हो गई पर सत्य क्या है?&lt;br /&gt;शैतान का दिमाग शिक्षा पा कर बम बनाता है, और शरीफ़ का दिमाग फ़ोकट के साफ़्टवेयर, आलसी तो ब्लाग भी नही लिखता चाहे सारी सुविधा उपलब्ध हो। मनोवृत्ती शिक्षा पर हावी हो जाती है। पर क्या मनोवृत्ती किसी पहले से प्राप्त शिक्षा से नही बनी होती। शिक्षा से बनी होती है या वंशानुगत होती है? &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;आज शिक्षा तो हर बात पर उपलब्ध है पर हमारी दिलचस्पी बस उस ज्ञान में है जो रोजीरोटी दिला दे! बस इतना कर लें वो क्या कम है? अब मंडल कमीशन वाला किस्सा भूल गए क्या - शिक्षा की राजनीति पर लिखने लगूंगा तो सर्वर बैठ जाएगा! काम्पिटीशन बहुत है भाई और फ़िर गरीबी महंगाई! इस बात का महत्व नही है की व्यक्ति की रुचि किस विषय में है, महत्व इस बात का है की पैसा किधर है? सयानी देसी जनता एक घर आगे चलती है - जिधर पैसा हैं उधर इन्टरेस्ट ले लेंगे साईं आप बताओ ना कौन सा कोर्स करना है! मैं ऐसे आई आई टी से निकले कई केमिकल इन्जीनियर्स से मिला हूं जो पैसे के लिए आई टी या मेनेजमेंट में दन्न से कूद गए - आज पानी का रासायनिक सूत्र पता नही होगा - चार साल खप के आए हैं साहब, अभी कोडिंग चल रही है मस्त! सच बोलूं तो खुशी होती है- चलो लंद-फ़ंद कर रही है जनता - कुछ ना करने से बेहतर है। पर लंद-फ़ंद सही और आदर्श तरीके से हो तो मजा है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;आज विशिष्टीकरण के युग में व्यक्तित्व का बनाव भी फ़ास्ट फ़ूड सा होता है - ये कोर्स ले, वो कोर्स ले, नौकरी पा। देसी एयरोडायनामिक्स के इन्जीनियर ने कभी पतंग नही उड़ाई होती और पतंगबाज को पता नही होता ये उपर किस प्रभाव से उठी - ये क्या? पश्चिम में पैसा है और वो रुचि के हिसाब से चलते हैं या रुचि के हिसाब से काम करते हैं इस लिए सफ़ल हैं वो कहानी फ़िर कभी। वैसे शिक्षा बड़ा कठिन विषय है। बडे़ बडे़ फ़िलासाफ़र सोच सोच के मर गए इस विषय पर - हम किस खेत के कद्दू हैं! &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;“बस कि दुश्वार है किसी बात का आसां होना, &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्सां होना”-&lt;/em&gt; ग़ालिब&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;गालिब का दर्द हर पढे़ लिखे शरीफ़ आदमी का दर्द है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;शिक्षा आदमी को इन्सान बनाती है, पर ओवर-आल आज भी एक खास किस्म के बम्मन वर्ग की बपौती है जो विचारों के ब्राण्ड बनता है। बौद्धिक अधिकारों और पेटेंटों के जमाने में शिक्षा और ज्ञान पर प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष नियंत्रण कमतर और बेहतर समाजों का फ़र्क तय कर रहा है और करता रहेगा। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;शिक्षा की तकनीकें विद्यालयों महाविद्यालयों के स्वरूप तय करतीं है। और तकनीकों की शिक्षा समाजों का स्वरूप तय करतीं है। पर आज का सच तो ये है की भारत में और दुनिया के कई और बडे़ बडे़ महाद्वीपों में समाजों को अभी सापेक्षिक आदिम युग से ही बाहर निकलना है - शिक्षा मिल जाए - कोई अनपढ ना रहे वही बहुत फ़िर इतनी मिल जाए की शिक्षा के दम पर नौकरी पा ले - ऐसा समाज हो जो हर शिक्षित को रोजगार दे दे - वाह वाह! बाकी फ़ण्डे के लिए ब्लाग तो है ही! &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-6863367547270471775?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/6863367547270471775/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=6863367547270471775&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/6863367547270471775'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/6863367547270471775'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/06/blog-post_26.html' title='शिक्षा आज के परिपेक्ष्य में...'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SkPaE9BRXrI/AAAAAAAABd8/P4vQQzeluB4/s72-c/2076355502_896d2ce200.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-5974360702572520376</id><published>2009-06-19T02:26:00.007+05:30</published><updated>2009-06-19T02:47:31.178+05:30</updated><title type='text'>इसे ही शहर कहते हैं...</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SjqtVvnsKDI/AAAAAAAABaw/gOP3YNtwzJI/s1600-h/3236656738_355c8cb610.jpg"&gt;&lt;img style="TEXT-ALIGN: center; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; DISPLAY: block; HEIGHT: 240px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5348778096527681586" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SjqtVvnsKDI/AAAAAAAABaw/gOP3YNtwzJI/s320/3236656738_355c8cb610.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; बड़ा दिलकश, बड़ा रंगीन है, ये शहर कहते हैं,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;यहाँ पर हैं हजारों घर, घरों में लोग रहते हैं,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;मुझे किस शहर में गलियों का बंजारा बना डाला।&lt;p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;न मुझसे बन सका छोटा-सा, हर दिन-रात रोता हूँ,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;ख़ुदा ऐ तूने कैसे ये जहाँ सारा बना डाला......।&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;सौजन्य - शिकागो स्काई लाइव&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-5974360702572520376?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/5974360702572520376/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=5974360702572520376&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/5974360702572520376'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/5974360702572520376'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/06/blog-post_19.html' title='इसे ही शहर कहते हैं...'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SjqtVvnsKDI/AAAAAAAABaw/gOP3YNtwzJI/s72-c/3236656738_355c8cb610.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-2361927992371355721</id><published>2009-06-17T02:18:00.002+05:30</published><updated>2009-06-17T02:38:55.364+05:30</updated><title type='text'>वाह री किस्मत…!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5348031768261902850" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 268px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SjgGjuLBQgI/AAAAAAAABZE/W1FRIHtGNV0/s320/Dog.jpg" border="0" /&gt;&lt;strong&gt;इनकी महत्वकांक्षा तो देखिए....ये दिल्ली के कुत्ते हैं। पटना के कुत्तों को अपनी औकात पता है। कटवारिया सराय के लोकल कुत्ते हैं, ग्रेटर कैलाश या फिर वसंत कुंज के अपने ऐलीट भाईयों की तरह इन्हें होंडा सिटी या मर्सिडीज नसीब कहां। इसलिए मारूती में ही ख़ुश हैं। दरअसल दोष इनका भी नहीं है...हमनें इनके लिए ज़मीन पर जगह छोड़ा ही कहां है। &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-2361927992371355721?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/2361927992371355721/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=2361927992371355721&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2361927992371355721'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/2361927992371355721'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='वाह री किस्मत…!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SjgGjuLBQgI/AAAAAAAABZE/W1FRIHtGNV0/s72-c/Dog.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-1112964300161387893</id><published>2009-05-25T21:48:00.006+05:30</published><updated>2009-06-17T02:41:31.542+05:30</updated><title type='text'>क्यूं सुलगा है पंजाब</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5348035920875949762" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 272px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SjgKVb3XDsI/AAAAAAAABZQ/C3y3XTMltRI/s320/gr.jpg" border="0" /&gt;&lt;strong&gt;पंजाब फिर से सुलग उठा है।&lt;/strong&gt; पिछले साल डेरा सच्चा सौदा विवाद ने भी पंजाब को सुर्खियों में ला दिया था। विवाद के जड़ में डेरा सच्चा सौदा का अख़बारों में छपा विज्ञापन था, जिसमें डेरा प्रमुख राम रहीम सिंह को गुरु गोबिंद सिंह की वेशभूषा में अमृत बांटते दिखाया गया। देखते-देखते राज्य के कई जिलों में हिंसक झड़पें शुरू हो गईं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;दरअसल पंजाब में इस तरह का विवाद नया नहीं है। इससे पहले भी अलग-अलग पंथों को मानने वाले सिख संगठनों के बीच हिंसक झड़पें हो चुकी हैं। लेकिन सवाल यह है कि पंजाब में डेरों व सिख धार्मिक संगठनों के बीच टकराव की असल वजह क्या है? क्या, यह सिर्फ़ बदले की राजनीति या डेरा प्रमुखों की निजी महत्वाकांक्षा भर का मामला है, या कहानी कुछ और भी है ? इस पूरे विवाद को ढंग से समझने के लिए पंजाब की जाति-व्यवस्था, ख़ासतौर पर दलित राजनीति के व्यापक संदर्भ को जानना जरूरी है। पंजाबियत कल्चर के कारण बाहर से शांत और समृद्ध समाज का आभास मिलता है, लेकिन अंदर ही अंदर ऐतिहासिक अंतर्विरोधों के कारण भारी उथलपुथल मची हुई है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;पंजाब में दलितों की आबादी करीब 30 प्रतिशत है, जो देश में किसी भी राज्य से ज्यादा है। ये दलित आबादी सभी धर्मों, मसलन हिंदू, मुस्लिम, सिख, क्रिश्चन में बंटी हुई हैं। लेकिन इस 30 फ़ीसदी आबादी का खेतिहर जमीन पर मात्र 3 प्रतिशत अधिकार है। जबकि राज्य की 32 फीसदी जाट सिख (जट सिख) आबादी के पास 80 प्रतिशत खेतिहर जमीनें हैं। यह ज़मीनी असंतुलन राज्य के धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक मंचों पर भी दिखती है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;सिख धर्म में जाति व्यवस्था को नकारा गया है और हिंदू वर्णव्यवस्था के उलट वहां सभी की समानता की बात कही गई है। इसके बावजूद भूमि, संख्यात्मक बहुलता और परंपरागत रौबदाब के चलते जाति की चेतना ने गहराई से जड़ें जमाई हुई हैं। ख़ास बात यह है कि पंजाब में व्यापार और साहूकारी से जुड़े रहे खत्रियों के अलावा सभी जातियां हिंदू धर्म व्यवस्था में निम्न जातियां मानी गई हैं, पर कृषि से जुड़े सभी महत्वपूर्ण संसाधनों पर कब्जा कर स्थानीय संस्कृति व राजनीति में उन्होंने ऊंची जाति का दर्जा हासिल कर लिया है। जातिगत चेतना का असर इतना व्यापक है कि विभिन्न सिख जातियों में आपस में विवाह भी नहीं होता। जाट, खत्री और रामगढ़िया सिखों को प्रभुत्वशाली जाति माना जाता है जो मजहबी, रामदसिया और रंगरेता सिखों को अपने से नीचे समझते हैं। जाट सिख व दलित सिखों के बीच टकराव में ही डेरा विवाद की वजहें छिपी हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;एक आंकड़े के अनुसार पंजाब में करीब नौ हजार सिख व गैर सिख डेरे हैं। गैर सिख डेरों के ज्यादातर दलित अनुयायी हैं। डेरा सच्चा सौदा के 70 फीसदी अनुयायी सिख और गैर सिख दलित व अन्य निम्न जातियों से हैं। डेरों की ओर निम्न जातियों के झुकाव को जाट सिखों के दबदबे से अलग एक 'वैकल्पिक आध्यात्मिक-धार्मिक स्थान' की तलाश के रूप में देखा जाता है। विदेशों में बसे कई दलित परिवारों से इन डेरों को मदद मिलती है। लोकल राजनीति में भी डेरा की दखलंदाजी बढ़ती जा रही है। नतीजतन अगड़े सिखों में डेरा के लिए वैमनस्य बढ़ा है। आए दिन जाट सिखों और दलितों के बीच टकराव की ख़बरें आती रहती हैं। दलितों का सिख समाज में मुखर होने की एक वजह हरित क्रांति भी है। आर्थिक समृद्धी ने राजनैतिक और सामाजिक मंच पर भी डेरा समर्थक दलितों को उभारने में योगदान दिया है। पंजाब में गुरुद्वारों की राजनीति में भी इन्हें दोयम दर्जे़ का एहसास होता है। कई गांवों में दलितों नें अपने अलग गुरुद्वारे बना लिए हैं। एक अनुमान के मुताबिक राज्य के करीब 12 हजार गांवों में से 10 हजार में दलितों ने अपने अलग गुरुद्वारे बना लिए हैं। डेरा सच्चा सौदा जैसे संगठन पंजाब की शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी और अकाल तख्त की राजनीति को भी चुनौती देने लगे हैं। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-1112964300161387893?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/1112964300161387893/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=1112964300161387893&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/1112964300161387893'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/1112964300161387893'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/05/blog-post_25.html' title='क्यूं सुलगा है पंजाब'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SjgKVb3XDsI/AAAAAAAABZQ/C3y3XTMltRI/s72-c/gr.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-5676015476011287498</id><published>2009-05-24T01:56:00.006+05:30</published><updated>2009-05-24T02:11:05.751+05:30</updated><title type='text'>ग्रामीण मतदाता और कांग्रेस की जीत</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/ShhcJek67_I/AAAAAAAABOU/x2RU1m6iINg/s1600-h/nrega.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5339118676144222194" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 186px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/ShhcJek67_I/AAAAAAAABOU/x2RU1m6iINg/s320/nrega.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;गटबंधन के इस युग में कांग्रेस में नई जान फूंकने का श्रेय राहुल गांधी ले उड़े।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; राहुल का 'यौवन' निश्चित रूप से चुनाव में एक फैक्टर लगा। कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर नहीं होता, फिर भी राहुल के ख़िलाफ कोई आवाज़ नहीं उठती। राहुल...राहुल हैं। लेकिन कांग्रेस के शानदार प्रदर्शन के पीछे और भी कई गंभीर कारण हैं। आख़िर क्यों 2004 में बीजेपी की इंडिया शायनिंग फेल हो गई, जबकि 2009 की रूरल इंडिया शायनिंग सफ़ल रही...? &lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;आज के हिंदुस्तान की करीब 57 फ़ीसदी जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। यही किसान भारी संख्या में वोट डालने के लिए घरों से बाहर निकलते हैं, और 2004 में इन्हें इगनोर करना ही भाजपा को ले डूबी थी। गौरतलब है कि साल 2003 और 2004 कृषि के लिए बेहतर नहीं थे। तत्कालीन एनडीए सरकार ने गांवो को ध्यान में रखकर कोई ख़ास कार्यक्रम भी नहीं चलाया था। इसके उलट मतदान के प्रति उदासीन शहरी जनसंख्या को फील-गुड का एहसास कराया जाता रहा। 'इंडिया' और 'भारत', भाजपा के निगाहों में लगातार दूर होते गए। और उसी अनुपात में 'भारत', भाजपा से दूर होता चाला गया। 'इंडिया' वोट के दिन पार्क में 35 हज़ार रूपए वाला कुत्ता टहला रहा था। उफनती सेंसेक्स और बाजार की चकाचौंध में सरकार ‘वैशाखी गदहे’ की तरह सोचने लगी थी। 'भारत' को ये समझ नहीं आ रहा था कि विकास का मतलब विनिवेश कैसे हो सकता है!! और यही एनडीए को ले डूबी। गांव के लिए दिल्ली पहले ही दूर थी। इन दूरियों को पाटने के बजाय एनडीए ने और बढ़ा दिया। एनडीए बचपन से रटाई गई एक सबक भूल बैठी, 'भारत गांवों में बसता है'। वोट, ऐसे भी गिव एंड टेक का मामला होता है। ऐसे में आप फ्री में वोट पाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/ShhcQI8kUrI/AAAAAAAABOc/wOBVWrU-BQk/s1600-h/wfs595a.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5339118790596907698" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 216px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/ShhcQI8kUrI/AAAAAAAABOc/wOBVWrU-BQk/s320/wfs595a.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;यूपीए ने पहले साल से ही एनडीए की नितियों से अलग काम किया। इसकी सबसे बड़ी वजह लेफ्ट का दवाब था। यूपीए सरकार के नीति निर्माता, आर्थिक सुधारों के बाद देश में आए आर्थिक और infrastructural असमानता के प्रति ज्यादा संवेदनशील दिखे। सराकरी योजनाओं और निवेश में ग्रामिण भारत को पहला स्थान दिया गया। सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम में, कई वर्षों के बाद ग्रामीण भारत की समस्याओं को प्रधानता दी गई। अचानक ग्रामीण विकास मंत्रालय लाइम-लाइट में आ गया। ‘भारत निर्माण’ को सरकार का फ्लैगशिप कार्यक्रम बनाया गया। यहां भारत का आशय निश्चित रूप से गांवों में रहने वाला भारत ही है। भारत दैट इज इंडिया नहीं। भारत निर्माण के अंतर्गत गांवों के समग्र विकास के लिए कई कार्यक्रम चलाए गए। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना , कृषि ऋण माफी योजना, सर्व शिक्षा अभियान, मिड-डे मील स्कीम, ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, राजीव गांधी विद्युतीकरण मिशन जैसे कई अन्य छोटे-बड़े कार्यक्रमों का फोकल प्वाईंट गांवों का सर्वांगिण विकास ही रहा। पायलट प्रोजेक्ट के तहत 2006 में लागू किया गया राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) का विस्तार धीरे-धीरे 2008 तक देश के सभी 604 जिलों में कर दिया गया। 2008 के बजट में सरकार ने कृषि ऋण माफी की घोषणा की, जिससे लगभग 4 करोड़ छोटे और मझौले किसानों को सीधा फ़ायदा मिला। बाद में इसमें अपेक्षाकृत बड़े किसानों को भी शामिल कर लिया गया। कृषि सिंचाई के लिए 2008 के बजट में 20 हज़ार करोड़ का प्रवाधान रखा गया, जिसका लाभ सूखे क्षेत्र के किसानों को मिला। राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना को और अधिक धन मुहैया कराया गया। साल दर साल भारत निर्माण के बजट को भी 20 से 30 प्रतिशत की दर से बढ़ाया गया। आदिवासियों का जंगल की जमीन पर उनके पारंपरिक अधिकार को मान्यता देने वाला ट्राइबल एक्ट भी इसी दिशा में एक कदम था। किसानों और ग्रामीण भारत को ध्यान में रखकर इस तरह के कई और भी योजनाएं बनाई गयीं। सरकारी अनाज के ख़रीद का न्युनतम समर्थन मुल्य भी समय-समय पर बढ़ाया गया। &lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;नतीजा, हमारे सामने है। एक ओर जहां महानगरों में रहने वाला भारत आर्थिक मंदी के गिरफ्त में है, वहीं ग्रामीण भारत पर इस मंदी का असर नहीं है, बल्कि वो कुछ हद तक सरकारी निवेश के कारण बेहतर ही हुआ है। ऐसी स्थिति में जागरूक शहरी मतदाता भी कांग्रेस के पक्ष में लामबंद हो गए, क्योंकि उन्हें पता है कि मौजूदा आर्थिक मंदी अंतराष्ट्रीय है, और सरकार का इसमें कोई हाथ नहीं है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ऐसा भी नहीं है कि यूपीए ने गांव को स्वर्ग बना दिया, किसानों की सारी समस्याएं खत्म हो गईं। ये भी सच है कि कई फ्लैगशिप कार्यक्रम को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। लेकिन कुछ हद तक तो बदलाव हुआ है। सरकार कुछ करने को इच्छुक दिख रही थी। भले ही ये इच्छा लेफ्ट के दवाब में हो, लेकिन काम तो हुआ है। बदले में गांवों ने भी अपना फर्ज़ निभाया। उसने यूपीए को वोट देने का मन बना लिया। यहां गौर करने वाली बात यह है कि एनडीए ने भी ग्रामीण इलाकों में काफी निवेश किया था। लेकिन दोनों के तरीकों में एक बड़ा अंतर था। जहां एनडीए की परियोजनाओं में मुख्य रूप से बुनियादी ढांचों के विकास पर जोर था (उदाहरण के लिए, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना), वहीं कांग्रेस या यूपीए के कार्यक्रम व्यक्ति को केंद्रित कर बनाए गए थे (नरेगा)। यहां Micro और Macro का विभेद था। दोनों का एप्रोच एक-दूसरे के उलट था। एनडीए ट्रिकल डाउन थ्योरी पर काम कर रही थी, वहीं यूपीए का ऐजेंडा डेवलपमेंट फ्रॉम बिलो था। &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;अगली किस्त - मुसलमान मतदाता और कांग्रेस&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-5676015476011287498?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/5676015476011287498/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=5676015476011287498&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/5676015476011287498'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/5676015476011287498'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/05/blog-post_24.html' title='ग्रामीण मतदाता और कांग्रेस की जीत'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/ShhcJek67_I/AAAAAAAABOU/x2RU1m6iINg/s72-c/nrega.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-5388596501570106162</id><published>2009-05-12T22:22:00.004+05:30</published><updated>2009-05-12T23:10:25.204+05:30</updated><title type='text'>‘जू जू’.....!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5334981576320235314" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 300px; CURSOR: hand; HEIGHT: 232px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SgmpekvSNzI/AAAAAAAABNs/eMP1T2_wzXQ/s320/23.bmp" border="0" /&gt;&lt;strong&gt;तो ‘जू जू’ के नाम ही रहेगा आईपीएल सीज़न 2।&lt;/strong&gt; सचिन, धोनी, युवराज नहीं....चियर्स गर्ल्स भी नहीं...आईपीएल मैचों के दौरान कोई धूम मचा रहा है, तो वो है ‘जू जू’। स्टेडियम में दर्शकों की कमी से मैचों की रौनक गायब है। लेकिन वोडाफ़ोन का नया कॉमर्सियल 'जू जू' बच्‍चों बूढ़ों , नौजवानों, सभी को रिझा रहा है। विज्ञापन आने पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले दर्शक इन विज्ञापनों का खू़ब मजा ले रहे हैं। ख़ास कर बच्चे, जिन्हें जू जू के आकार में एक नया हीरो मिल गया है। आईपीएल के दौरान ये इतने चर्चित हो चले हैं, कि दर्शकों को विज्ञापनों में उनका इंतजार रहने लगा है। लोग जू जू को बार-बार देखना चाहते हैं। दर्शकों की दीवानगी का आलम ये है कि बहुत से लोग जिन्हें क्रिकेट पसंद नहीं है, वो भी मैचों को सिर्फ़ इन विज्ञापनों की वजह से देख रहे हैं। टैम के आंकड़े बताते हैं कि गुदगुदाते ‘जू जू’ को लोग आईपीएल जे ज्यादा देख रहे हैं। गुगल सर्च में भी ‘जू जू’ टॉप टेन के लिस्ट में शामिल हो गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sgmp6qJyDAI/AAAAAAAABN0/Ev2B7oGpB1o/s1600-h/24.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5334982058809887746" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 300px; CURSOR: hand; HEIGHT: 223px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sgmp6qJyDAI/AAAAAAAABN0/Ev2B7oGpB1o/s320/24.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;‘जू जू’ के चाहने वालों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सिर्फ फेसबुक में ही अब तक इनके फैंस की संख्‍या 75 हजार के आंकड़े को पार कर गई है। शब्दों का इस्तेमाल किए बिना, सिर्फ़ हंसी-ठहाकों के माध्याम से संवाद स्थापित कर लेना वाकई काबिले तारीफ़ है। और सबसे बड़ी बात यह कि मोबाईल सेवा का एड होने के बावजूद पूरे कमर्शियल में कहीं भी नेटवर्क का ज़िक्र नहीं आया है। वैसे वोडाफ़ोन के कामर्शियल अपने क्रियेटिविटी और थिमेटिक ब्रांड कैंपेन की वजह से हमेशा चर्चा मे बने रहते हैं। वो रॉकी पग (कुत्ते) वाला विज्ञापन तो याद है न....’You &amp;amp; I, in this beautiful world’… । प्यारा सा कुत्ता एक छोटी सी बच्ची के साथ नजर आता है। जहां-जहां बच्ची जाती है, कुत्ता पीछे-पीछे दौड़ कर पहुंच जाता है। “Wherever you go, our network follows”. यह कुत्ता कंपनी का ब्रांड अम्बैस्डर बन चुका था। उस एड का यूएसपी नेटवर्क था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन समय के साथ कॉल रेट घटा और मोबाईल कंपनी के रेवन्यू में कॉल सर्विसेज का हिस्सा कम होता चला गया। इसी को पूरा करने के लिए वैल्यू एडेड सर्विसेज़ सामने आए। ज्योतिष, एमाउंट ट्रांसफर, लव स्कोर, कॉलर ट्यून, वॉयस सर्विसेज, सामाचार सहित सैंकड़ो सेवाएं कंपनी उपलब्ध कराने लगी। और ‘जू जू’ इन्हीं सर्विसेज़ को प्रचारित कर रहे हैं। वोडाफोन के प्रतिद्वंदी कंपनियां मसलन आइडिया, एयरटेल और रिलांयस की हालत खराब कर दी है इस एड ने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आईपीएल के दौड़ान वोडाफोन ‘जू जू’ पर आधारित 30 फ़िल्मों को जारी करेगा। दरअसल इन मुखौटों के पीछे है दक्षिण अफ्रीका की खूबसूरत लड़कियां, और इसे बनाया है देश की नामी विज्ञापन कंपनी ओगिल्वी एंड मैथर ने। तो फिर सोच क्या रहे हैं जनाब, इन गर्मियों में मैच के साथ-साथ ‘जू जू’ का भी मज़ा लेते रहिए..।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-5388596501570106162?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/5388596501570106162/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=5388596501570106162&amp;isPopup=true' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/5388596501570106162'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/5388596501570106162'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/05/blog-post_12.html' title='‘जू जू’.....!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SgmpekvSNzI/AAAAAAAABNs/eMP1T2_wzXQ/s72-c/23.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-6783956099529775666</id><published>2009-05-11T19:39:00.010+05:30</published><updated>2009-06-17T02:43:15.047+05:30</updated><title type='text'>ये क्या मृणाल जी...!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5348036352520319378" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 238px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SjgKuj3ZcZI/AAAAAAAABZY/6mHJt1tLq0o/s320/10_05_2009_005_008.jpg" border="0" /&gt;&lt;strong&gt;कम से कम इतना तो छाप देतीं कि मृतक जयंत आपके ही अंग्रेज़ी अख़बार (Hindustan Times) में सब-एडीटर था।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;PS:&lt;/span&gt; उन सभी पत्रकारों के लिए, जो अपनी-अपनी संस्थाओं के नामों का दंभ भरते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-6783956099529775666?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/6783956099529775666/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=6783956099529775666&amp;isPopup=true' title='21 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/6783956099529775666'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/6783956099529775666'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/05/blog-post_11.html' title='ये क्या मृणाल जी...!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SjgKuj3ZcZI/AAAAAAAABZY/6mHJt1tLq0o/s72-c/10_05_2009_005_008.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>21</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-3487676731417253881</id><published>2009-05-10T18:30:00.014+05:30</published><updated>2009-05-10T20:29:11.190+05:30</updated><title type='text'>आख़िर, आडवाणी क्यों नहीं बन पा रहे हैं वाजपेयी....?</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5334189832148937010" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 303px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SgbZY_286TI/AAAAAAAABM8/Ncm_RpvUH1c/s320/20061201001608201.jpg" border="0" /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;[राजीव कुमार, सुशांत कुमार झा]&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;.....&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;ज़िं&lt;/span&gt;दगी के दौर में या तो नंबर-1 होना चाहिए या नंबर-3....नंबर-2 वालों को जल्दी उसकी छवि से निजात नहीं मिलती या फिर अक्सर नंबर-1 उसे आगे नहीं बढ़ने देता। बीजेपी के नेता लालकृष्ण आडवाणी के सियासी जिंदगी का सबसे अहम पल नजदीक आ चुका है। 16 मई को मतगणना के बाद ये साफ हो जाएगा कि आडवाणी प्रधानमंत्री बन पाएंगे या फिर सियासत से सम्मानजनक रुप से ऱुख़्सत हो जाएंगे। इतना तय है कि संघ परिवार उन्हे दूसरा मौका नहीं देने जा रहा। अगर आकड़ों के खेल में बीजेपी नजदीक आ गई तो फिर आडवाणी, मुल्क के वजीर-ए-आज़म बन जाएंगे-लेकिन जो बात आडवाणी को सालती होगी वो ये कि जिस बीजेपी को उन्होने अपने ख़ून पसीने से सींचा था, जिसका एक बड़ा संगठन और जनाधार बनाया था-उसमें वाजपेयी तो आसानी से प्रधानमंत्री बन गए लेकिन आडवाणी को अपनी स्वीकार्यता बनाने में बहुत वक्त लग गया।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;क&lt;/span&gt;हते हैं सियासत उम्मीदों का खेल है। इसमें अक्सर दो और दो, चार नहीं होते। तो फिर तमाम काबिलियत के बावजूद आडवाणी कहां चूक गए? उन्होने कौन सी ग़लती कर दी कि बाजी हर घड़ी वाजपेयी के हाथ रही? इसे समझने के लिए हमें दोनों के व्यक्तित्व की खूबियों और खामियों पर एक नज़र डालनी होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आ&lt;/span&gt;डवाणी और वाजपेयी दोनों ही संघ के राजनीतिक स्कूल के प्रशिक्षु थे। उम्र में आडवाणी से कुछेक साल बड़े वाजपेयी ने जहां अपने करियर की शुरुआत पांञ्चजन्य के संपादक के तौर पर शुरु की थी। आडवाणी उसमें फिल्मों की समीक्षा लिखा करते थे। पाकिस्तान से आए आडवाणी का परिवार जब गुजरात में बसा और उसके बाद वे काफी वक्त तक राजस्थान में जनसंघ का काम करते रहे। बाद में वे दिल्ली मे जनसंघ का काम देखने आ गए लेकिन उनका दर्जा बड़ा नहीं था। ये वो दौर था जब जनसंघ में बलराज मधोक और नानाजी देशमुख का जलवा था, और पंडित दीनदयाल उपाध्याय और श्यामाप्रसाद मुखर्जी दुनिया को अलविदा कह चुके थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आ&lt;/span&gt;डवाणी और वाजपेयी में कई असमानताएं हैं। जहां वाजपेयी कल्पनाशील और बड़े भाषणबाज के रूप में मशहूर हुए, वहीं आडवाणी तार्किक, विश्लेषक और भाषण में कमजोर हैं। वाजपेयी, अंग्रेजी में तंग हैं जबकि आडवाणी की अंग्रेजी पर जबर्दस्त पकड़ है। वाजपेयी खानेपीने के शौकीन हैं जबकि आडवाणी खानपान में संयमित हैं। आडवाणी को किताबों, फिल्मों और थियेटर का शौक है जबकि वाजपेयी परिवार के साथ ज्यादा वक्त बिताते हैं। सबसे बड़ी बात ये कि वाजपेयी बड़े कूटनीतिज्ञ हैं जबकि आडवाणी इसमें थोड़े तंग हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sgbdi0YQMLI/AAAAAAAABNE/eYa0jsK-teI/s1600-h/2006072504111101.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5334194398912590002" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 274px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sgbdi0YQMLI/AAAAAAAABNE/eYa0jsK-teI/s320/2006072504111101.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आ&lt;/span&gt;डवाणी में राजनीतिक विश्लषण और संगठन बनाने की बेजोड़ काबिलियत है, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी सियासत के खेल में उनसे ज्यादा चतुर सुजान निकले। वाजपेयी ने भारतीय समाज के स्वरुप का गहरा अध्ययन कर लिया था, जिसके तहत कोई कट्टरपंथी और अतिवादी विचार रखनेवाला राजनीतिज्ञ सियासत में कामयाब नहीं हो सकता था। वाजपेयी ने बड़ी चतुराई से अपनी शख़्सियत का निर्माण किया, वे संघ के चहेते भी बने रहे और बाहर उदारवाद का चोला बदस्तूर पहने रखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;दू&lt;/span&gt;सरी बात जो अहम थी वो ये कि वाजपेयी में भाषण देने का बेजोड़ गुण था, चुटीले शब्दों की उनके पास कोई कमी नहीं थी। उनको सुनने के लिए भीड़ उमड़ती थी। हमारी पीढ़ी के लोगों ने जिस वाजपेयी को देखा है, वो उम्र के अपने आखिरी पड़ाव पर थका हुआ सियासतदान था-वाकई वाजपेयी की ऊर्जा और जोश 90 से पहले या उससे भी पहले देखने लायक थी। हमारे देश में अमूमन कामयाब सियासतदान, अच्छे भाषणकर्ता हुए हैं, आडवाणी इस मामले में भी कमजोर साबित हुए। आडवाणी ने ऐसा खुद भी स्वीकार किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;ज&lt;/span&gt;हां तक चुनावी राजनीति की बात है तो वाजपेयी इसमें बहुत पहले ही सक्रिय हो गए थे, शायद मुल्क का दूसरा आम चुनाव भी उन्होने लड़ा था और संसद में अपनी काबिलियत का लोहा बड़े नेताओं से मनवाया था। वाजपेयी की लोकप्रियता तब उफान पर आ गई जब पंडित नेहरु ने संसद में उनकी तारीफ में कशीदे पढ़े- शायद वाजपेयी ने चीन के मसले पर नेहरु की नीतियों का बड़े ही तार्किक ढ़ंग से और कड़ा विरोध किया था। इसके बाद वाजपेयी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होने अपने करिश्माई भाषण के बदौलत सारे देश में अपनी धाक जमा ली। वे अचानक कम उम्र में ही नेताओं के बड़े कल्ब में शामिल हो गए। लेकिन उस वक्त आडवाणी क्या कर रहे थे ? आडवाणी उस वक्त जनसंघ की दिल्ली शाखा के लिए बड़े तल्लीनता से काम कर रहे थे। यहां ये बात साफ हो जाती है कि सियासत ही नहीं दूसरे पेशे में भी विज्ञापन, जनसंपर्क और छवि निर्माण का कितना बड़ा हाथ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;वा&lt;/span&gt;जपेयी का भाषण कला में दक्ष होना उनके हिंदी पर बेहतरीन अधिकार से भी संभव हुआ। आडवाणी ने काफी मेहनत करके हिंदी सीखी। लोग कहते हैं कि वाजपेयी अगर सियासत में नहीं होते तो एक अच्छे कवि जरुर हो सकते थे- अलबत्ता कईयों ने उनके हालिया कविताओं की बड़ी खिल्ली भी उड़ाई। बहरहाल, वाजपेयी अपनी भाषण कला और कलाबाजी के बदौलत आम जनता में एक बड़े नेता के रुप में मशहूर होते गए, लेकिन आडवाणी संघ के विचारों की कट्टरता से मुक्त नहीं हो पाए या कम से कम ऐसा दिखा नहीं पाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;दू&lt;/span&gt;सरी बात जो अहम है वो ये कि आडवाणी की शख़्सियत में भले ही संघ की विचारधारा ज्यादा साफ दिखती हो, लेकिन कई लोगों की राय में वाजपेयी, संघ नेतृत्व के ज्यादा नजदीक थे। ऐसा दीनदयाल उपाध्याय और श्यामाप्रसाद मुखर्जी के ही जमाने से था। संघ नेतृत्व ने इसीलिए वाजपेयी के कामों में कभी ज्यादा दखलअंदाजी नहीं की जबकि आडवाणी को वो एक सीमा से ज्यादा छूट देने को तैयार नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5334206701678692002" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 245px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sgbou7wRBqI/AAAAAAAABNU/NRST3MWHatQ/s320/New+Image06.jpg" border="0" /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;ए&lt;/span&gt;क अहम बात ये भी है कि वाजपेयी ऊपर से ज्यादा उदार भले ही दिखते हों, लेकिन असलियत में वो एक एकाधिकारवादी नेता और अपने इर्द-गिर्द किसी को न पनपने देने वाले लोकतांत्रिक तानाशाह ज्यादा थे। वाजपेयी के राह में जिस किसी ने भी रोड़ा बनने की कोशिश की, उन्होने उसकी सियासी मौत का दस्तावेज लिख दिया। चाहे वो बलराज मधोक हों, या फिर नानाजी देशमुख या फिर हाल के दिनों में कल्याण सिंह, वाजपेयी ने किसी को भी नहीं छोड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आ&lt;/span&gt;डवाणी, वाजपेयी से लाख दोस्ती और आत्मीयता के बावजूद उनके इस मानसिकता से सतर्क थे-और उन्होने कभी भी अपने आपको उनके प्रतिद्वंदी के तौर पर पेश भी नहीं किया। बल्कि राजनीतिक परिपक्वता दिखाते हुए उन्होने वाजपेयी की राह आसान बनाने के लिए रात-दिन एक कर दिया। साल 1991 में जब आडवाणी को हवाला कांड के बाद अपने पद से इस्तीफा देना प़ड़ा तो उन्होने बिना किसी हिचक के ये पद वाजपेयी को सौंप दिया। उसके बाद की कहानी तो सिर्फ़ इतिहास है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;कु&lt;/span&gt;छ लोग कहते हैं कि वाजपेयी इसलिए भी सबको स्वीकार्य हो गए कि समाजिक रुप से ब्राह्मण होने का उन्हे फ़ायदा मिला। हलांकि वाजपेयी (और शायद पंडित नेहरु भी) उन गिने चुने नेताओं में थे जिन्होने बड़े करीने से अपनी छवि को इन चीजों से मुक्त कर रखा था। राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में इन बातों का ज्यादा महत्व भी नहीं है, लेकिन बारीक स्तर पर कई दफा कई चीजें बिना शोर शराबे के काम करती है। वाजपेयी ब्राह्मण परिवार से हैं जबकि आडवाणी सिंधी। मंडल के उस घनघोर युग में जब पूरे देश के खासकर उत्तर भारत के ब्राह्मण और सवर्ण अपने आपको हाशिए पर पा रहे थे, वाजपेयी के उदय ने एक बड़े वर्ग को बीजेपी की तरफ मोड़ दिया था, इसमें कोई शक नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;इ&lt;/span&gt;सके आलावा हिंदुस्तान की सवर्ण मीडिया ने भी वाजपेयी के प्रति जर्बदस्त दीवानगी दिखाई। वाजपेयी जितने उदारवादी थे नहीं, उससे ज्यादा उदारवादी उन्हे बताया जाता रहा। वाजपेयी ने कभी भी संघ से अपनी मोहब्बत को नहीं छुपाया, उन्होने अपने आप को आजीवन स्वयंसेवक बताया-संघ के अंदुरुनी हल्कों में ऊंचाई पाने के लिए उन्होने शादी तक नहीं की- वो वाजपेयी कैसे उदार हो गए? जिस वाजपेयी ने बाबरी ध्वंस के वक्त जमीन सपाट कर देने की बात की थी वो वाजपेयी उदार कैसे हो गए ? क्या कोई इस बात को भूल सकता है कि ये वाजपेयी की हुकूमत ही थी जिस वक्त गुजरात में दंगे हुए थे। वाजपेयी ने सिर्फ जुबानी जमाखर्च के आलावा क्या किया था?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5334195184626723138" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 269px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SgbeQjZGaUI/AAAAAAAABNM/2j7lP-OMZvk/s320/photo.jpg" border="0" /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सा&lt;/span&gt;फ़ है वाजपेयी ने बड़े करीने से अपने इमेज और आभा मंडल बनाई, हिंदुस्तान की जनता जिसकी दीवानी होती गई। जनता में यहीं लोकप्रियता वाजपेयी को अपने गठबंधन के दलों में भी स्वीकार्य बना गई। आडवाणी यहीं चूक गए। आडवाणी ने अपनी सारी जिंदगी बीजेपी के ढ़ांचे को बनाने में खपा दिया, लेकिन वो अपनी इमेज का ढांचा नहीं बना पाए। इसमें कोई शक नहीं कि 90 के दशक में बीजेपी का आधार वोट आडवाणी के ही अयोध्या आंदोलन की उपज था जिसे वाजपेयी ने बाद में अपने इमेज के बल पर गठबंधन की शक्ल में ढ़ाल लिया। जबकि उस गठबंधन को बनाने में भी आडवाणी का योगदान था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आ&lt;/span&gt;डवाणी अभी तक सोमनाथ रथ यात्रा और बाबरी ध्वंस की छवि से अपने को मुक्त नहीं कर पाए हैं। इसकी कोशिश उन्होने बड़ी देर से शुरु की जब उन्होने जिन्ना की शान में कसीदे पढ़े। कुल मिलाकर आडवाणी ने बहुत देर से अपने को वाजपेयी के सांचे में ढ़ालने की कोशिश की है- जो काम वाजपेयी ने 50 साल पहले शुरु कर दिया था। 2009 का हिंदुस्तान काफी बदल चुका है-लेकिन वाजपेयी व्यक्तित्व के मामले में आमलोगों के दिलों -दिमाग इतनी बड़ी लकीर खींच गए हैं कि आडवाणी अब भी उनके सामने बौने लगते हैं। अब सवाल ये है कि क्या 16 मई को आनेवाले नतीजों में जनता उन्हे वाजपेयी-2 का दर्ज़ा देगी? चलिए देखते हैं...।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-3487676731417253881?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/3487676731417253881/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=3487676731417253881&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/3487676731417253881'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/3487676731417253881'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/05/blog-post_10.html' title='आख़िर, आडवाणी क्यों नहीं बन पा रहे हैं वाजपेयी....?'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SgbZY_286TI/AAAAAAAABM8/Ncm_RpvUH1c/s72-c/20061201001608201.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-934896358089502429</id><published>2009-05-06T23:36:00.002+05:30</published><updated>2009-05-06T23:42:18.374+05:30</updated><title type='text'>जाऊं कहां बता ए दिल...</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SgHSQN4lq2I/AAAAAAAABMc/KCx1gkfzr2s/s1600-h/Loneliness.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5332774609830128482" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 250px; CURSOR: hand; HEIGHT: 249px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SgHSQN4lq2I/AAAAAAAABMc/KCx1gkfzr2s/s320/Loneliness.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;आजकल कुछ लिखने का मन नहीं करता। मार्निंग शिफ्ट धीरे-धीरे अच्छा लगने लगा है। शाम 5 बजे तक घर लौट आना...घर क्या है कमरा, फ्लैट कुछ भी कह लीजिए। घर दूसरी चीज होती है। वहां लौटने में मजबूरी का भाव नहीं होता। और सोचना, चलो ज़िंदगी का एक और दिन कट गया। कई दिनों से सोच रहा हूं कि नए जगह पर शिफ्ट कर जाऊं। कोई मजबूरी भी नहीं है, लेकिन पता नहीं क्यूं कुछ नहीं कर पा रहा हूं। थकावट नींद तो ले आती है, लेकिन चैन या सुकून जैसे शब्द बेमानी ही लगते हैं। लगता है इस बड़े शहर में धीरे-धीरे खोता जा रहा हूं। आईडेंटिटी क्राईसिस...शायद...या कुछ और....। कभी-कभी मन करता है, वापस घर चला जाऊं। छोटा है, लेकिन पटना अपना तो है। &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;फिर रात के पहले पहर चांद छत के उपर आ जाता है। हां एक छत है। जिसके सीधे उपर आकाश है। टुकुर-टुकुर चांद को निहारना अच्छा लगता है। सोचता हूं, इस चांद के आगे भी एक दुनिया होगी। सुदूर एक अपहचानी और अंजानी सी दुनिया। कभी वहां जाऊंगा, हवा में उड़ कर। शायद वहां इतनी भीड़ न हो....। फिर से कोशिश करता हूं, शायद कुछ बदल जाए...शायद।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-934896358089502429?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/934896358089502429/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=934896358089502429&amp;isPopup=true' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/934896358089502429'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/934896358089502429'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='जाऊं कहां बता ए दिल...'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SgHSQN4lq2I/AAAAAAAABMc/KCx1gkfzr2s/s72-c/Loneliness.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-5480683724173473423</id><published>2009-04-14T01:43:00.001+05:30</published><updated>2009-04-14T01:55:14.114+05:30</updated><title type='text'>तो मामला महज 20 सीटों का है......</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SeOdCoSfETI/AAAAAAAABKY/MMzHpKzgerg/s1600-h/ver.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5324271852982309170" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 159px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SeOdCoSfETI/AAAAAAAABKY/MMzHpKzgerg/s320/ver.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;लोकसभा चुनाव के लिए भविष्यवाणियों का दौर जारी है। सब अंधेरे में तीर मार रहें है। सर्वे एंजेंसियां फिर वहीं ग़लती दुहराने जा रही है, जो पिछले कई दफा कर चुके है। टीवी चैनल्स तो और भी दिवालिए हैं। शातिर सियासतदान इस बार भी उसका इस्तेमाल कर रहें हैं। प्रधानमंत्री कौन बनेगा इसका सारा जिम्मा ज्योतिषियों को दे दिया गया है। पत्रकार सिर्फ सनसनीखेज़ बयानों के पीछे अपनी प्रतिभा गोबर कर रहे हैं। फिर सवाल ये है कि अंतिम आंकड़ों का एक मोटा-मोटा अंदाज भी क्यों नहीं लग पा रहा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये तो पक्की बात है कि सरकार वही बनाएगा जो आंकड़ों के खेल में बीस होगा। अब वो आंकड़ा क्या है ? बहुत पहले तक वो 272 होता था, लेकिन नोटों, स्वार्थों और कलाबाजियों के दौर में वह घटकर लगभग 200 रह गया है। यानी जो भी गठबंधन 200 ले आएगा, सरकार बना लेगा। यहां चकराने की जरुरत बिल्कुल नहीं है। जी हां, 50-60 सीट दोनों ही गठबंधन चुटकी में जुगाड़ लेगी, ये उन्हे पता है। कांग्रेस के लिए वाम और बीजेपी के लिए चंद्राबाबू-जयललिता इतनी सीटें थाली में लेकर बैठी हुईं हैं। हां, मुद्रास्फीति के इस दौर में कीमत कुछ ज्यादा हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब सवाल ये है कि वो 200 सीटे किसके पास है। सवाल यहां आकर थोड़ा टेढ़ा हो जाता है। पूरे देश में लगभग सवा दो सौ सीटों पर भाजपा और कांग्रेस की सीधी भिड़ंत हैं इसमें शामिल हैं-हिमाचल(4), उत्तराखंड(4) राजस्थान(25), गुजरात(21) मध्यप्रदेश(29) छत्तीसगढ़(11) कर्नाटक(28) दिल्ली(7) झारखंड (12), महाराष्ट्र (48) असम(14), पंजाब(13), हरियाणा(10), गोवा(2) अरुणाचल प्रदेश(2), और इस भिड़ंत में भाजपा बीस दिख रही है। कहने का मतलब ये कि भाजपा यहां से तकरीबन 120 से 130 सीटें जीत सकती है। इसके आलावे बिहार(40), यूपी(80) और उड़ीसा(21) की वो 140 सीटें हैं जहां भाजपा कमजोर नहीं हैं। इसमें भाजपा गठबंधन 50 तक सीटें अपनी झोली में डाल सकती है। और छिटपुट सीटें पार्टी, केरल, तमिलनाडू आंध्रप्रदेश में भी लाएगी। तो बदतरीन हालात में भी पार्टी 180 सीटों से ऊपर है। हलांकि अभी भी वो 200 से नीचे है लेकिन नजदीक दिखती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब जरा कांग्रेस के आंकड़ों पर गौर करें। सबसे ऊपर के सवा दो सौ सीटों में कांग्रेस के पास पाने को ज्यादा नहीं है। जो उम्मीद मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और गुजरात में पार्टी ने पाल रखी थी, उसमें भाजपा ने अपने तमाम ढ़ीले नट-वोल्ट कस दिए हैं। राजस्थान और दिल्ली को लेकर पार्टी खुशफहमी पाल सकती है, लेकिन भाजपा ने बड़ी तेजी से डेमेज कंट्रोल किया है। उसकी विधानसभा में हार आपसी कलह से ज्यादा, कांग्रेस की काबिलियत से कम हुई थी। एक निर्मम समीक्षा यह भी कहता है कि कांग्रेस खुद 100 सीट जीतने की हालत में नहीं है,जबकि यूपीए जो कि कागजों पर ही बचा है, 150 पर अटक सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कांग्रेस की उम्मीदें उड़ीसा और बंगाल और केरल से है। बंगाल और केरल में तो वह तरक्की पर है लेकिन उड़ीसा में भाजपा कमजोर नहीं। उसने अपना साम्प्रदायिक होमवर्क करके काफी सोच समझकर नवीन पटनायक से पल्ला झाड़ा है। भाजपा वहां इस हालात में है कि वो सूबे को अगला कर्नाटक बनाने की राह पर है। दो-तीन चुनावों में खंडित जनादेश-और फिर सूबे पर कब्जा भाजपा की रणनीति है। चुनाव के बाद नवीन पटनायक भाजपा के सबसे विश्वस्त सहयोगी बनने को फिर से अभिशप्त हो सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब भाजपा को जो 20-30 सीटों की कमी महसूस हो रही है उसे वो आक्रामक चुनाव प्रचारों से पाटना चाहती है। पार्टी का वार रुम कांग्रेस से बेहतर है। टीवी चैनल से लेकर वेबसाईट तक पर भाजपा कांग्रेस पर भारी है। उसके पास प्रचारकों की एक सीरीज है जबकि कांग्रेस के पास महज सोनिया-राहुल हैं। हलांकि मुद्दे, संसाधन और हालात कांग्रेस के पक्ष में ज्यादा थे, लेकिन पार्टी उसका फायदा नहीं उठा पा रही। रोजगार गारंटी योजना, किसानों की कर्ज़ माफी, दोपहर का भोजन, सर्व शिक्षा अभियान और ग्रामीण विद्युतीकरण को कांग्रेस मतदाताओं को बेच नहीं पा रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ भाजपा चाहती है कि चुनाव ध्रुवीकृत हो। वो चाहती है कि बीजेपी खुद मुद्दा बन जाए। इसमें आडवाणी की टीम सफल दिख रही है। पहले वरुण गांधी का बयान, फिर आडवाणी का मनमोहन को डिवेट की चुनौती, फिर मोदी का बुढ़िया-गुड़िया प्रकरण बीजेपी की शातिर चाल है, जिसमें कांग्रेस फंसती जा रही है। खंडित जनादेश कांग्रेस के पक्ष में जाएगा, जबकि ध्रुवीकृत जनादेश भाजपा की जागीर है। भाजपा इसी चक्कर में है। तो मामला अब महज 20 सीटों का रह गया है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;- सुशांत कुमार झा&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-5480683724173473423?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/5480683724173473423/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=5480683724173473423&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/5480683724173473423'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/5480683724173473423'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/04/20.html' title='तो मामला महज 20 सीटों का है......'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SeOdCoSfETI/AAAAAAAABKY/MMzHpKzgerg/s72-c/ver.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-7766460458875585722</id><published>2009-04-06T04:47:00.006+05:30</published><updated>2009-04-06T05:15:23.548+05:30</updated><title type='text'>'स्लमडॉग' संजय</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5321351364441504258" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 280px; CURSOR: hand; HEIGHT: 187px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sdk830qTegI/AAAAAAAABJw/h89uZOKyGVI/s400/jha280.jpg" border="0" /&gt;आज न्यू यार्क टाईम्स के मुख्य पृष्ट पर एक भारतीय की तश्वीर छपी है। कोई अनोखी बात नहीं है, पहले भी छपी होगी। गांधी, नेहरू, रहमान, इंदिरा नूई, लक्ष्मी मित्तल कभी न कभी इस प्रतिष्ठित अखबार के पहले पन्ने पर जरूर दिखे होंगे। लेकिन इस बार मामला कुछ अलग है। अख़बार ने एक बिहारी की तश्वीर छापी है।&lt;span style="color:#000099;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;a href="http://projects.nytimes.com/executive_compensation?hp"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;संजय झा&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;....&lt;/span&gt;जी हां, अमेरिका में सबसे ज्यादा तनख्वाह पाने वाले बिजनसे हेड हैं, मोटोरोला के को-सीईओ संजय झा। भारतीय मूल के संजय को पिछले साल 10 करोड़ 40 लाख डॉलर (करीब 5 अरब 19 करोड़ रुपये) का सैलरी पैकेज मिला, जो भारत में मुकेश अंबानी की तनख़्वाह से भी ज्यादा है। अमेरिका में 10 करोड़ से ज्यादा का पैकेज पाने वाले वे एकमात्र शख्स हैं। गौरतलब है कि अमेरिका करीब 17 महीने से मंदी की गिरफ्त में है। फिर भी इतनी बड़ी सैलरी....बाप रे बाप। इस लिस्ट में दो और भारतीय नाम हैं। पेप्सीको की इंदिरा नूई और सिटी बैंक के विक्रम पंडित। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;संजय की 'Rags to Riches' की कहानी स्लमडॉग से मिलती जुलती है। यह बात भी दिलचस्प है कि संजय की प्रारंभिक पढ़ाई-लिखाई किसी मेट्रो में नहीं हुई है, बल्कि संजय &lt;strong&gt;'सेंट बोरिस'&lt;/strong&gt; (सरकारी स्कूल) के प्रोडक्ट रहे हैं। इंदिरा नूई ने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स में बीएससी करने के बाद आईआईएम कोलकाता से फाइनेंस व मार्केटिंग में एमबीए किया। बाद में उन्होंने वेल्स स्कूल ऑफ मैनेजमेंट से मास्टर्स डिग्री हासिल की। वहीं पंडित ने कोलंबिया बिजनेस स्कूल से पी.एचडी की है। अगस्त 2008 में मोटोरोला ज्वाईन करते वक्त संजय फार्च्यून मैग्ज़ीन से एक साक्षात्कार में अपनी बचपन की यादों को ताजा करते हैं। &lt;strong&gt;&lt;em&gt;"दादा जी ने BSNL फोन कनेक्शन के लिए आवेदन दिया था, लेकिन घर में फोन आने का हमें सालों तक इंतज़ार करना पड़ा था"।&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; आज संजय मोटरोला के सीईओ हैं। दुनिया भर में छाई आर्थिक मंदी संजय के सामने कई चुनौतियां पैदा कर रही हैं। साथ ही एक चुनौती उनके अपने घर में भी है। मिसेज झा, आज भी LG का हैंडसेट ही इस्तेमाल करती हैं, भले ही शौहर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी हैंडसेट बनाने वाली कंपनी के सीईओं क्यूं न हों....। है न बहुत बड़ा चैलेंज!!!!!!!! एक बात और...... शायद अब बिहार में जन्मे बच्चों को अपने आदर्श की तालाश में बार-बार इतिहास में झांककर राजेंद्र बाबू और जेपी को न बुलाना पड़े...। उनका आयडल संजय भी तो हो सकता है। गांधी का चम्पारण सत्याग्रह इतिहास है। आज का सच सिलीकन वैली है, जहां अपना संजय कमाल दिखा रहा है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-7766460458875585722?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/7766460458875585722/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=7766460458875585722&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/7766460458875585722'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/7766460458875585722'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='&apos;स्लमडॉग&apos; संजय'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/Sdk830qTegI/AAAAAAAABJw/h89uZOKyGVI/s72-c/jha280.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-4008803440155892387</id><published>2009-02-26T01:48:00.005+05:30</published><updated>2009-02-26T13:02:19.087+05:30</updated><title type='text'>वो तेरे प्यार का ग़म...</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5306832225875525170" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 250px; CURSOR: hand; HEIGHT: 176px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SaWnyunn_jI/AAAAAAAABIc/dGodB3Wpc6E/s400/sitting-alone.jpg" border="0" /&gt;&lt;strong&gt;"Our sweetest songs are those that tell of saddest thought" - P B Shelley&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;मंगलवार को मेरा वीक ऑफ़ था। कई सालों से कटवारिया सराय में रह रहा हूं। एक पानवाला जो मेरे ही तरफ (बिहार) का है, उससे दोस्ती टाईप से हो गई है। शाम को सिगरेट लेने उसकी दुकान पर पहुंचा। हमेशा की ही तरह वह अताउल्ला ख़ान के गानों में मशगूल था। इस गाने को बचपन से सुनता आया हूं। 21 मिनट का यह गाना, जिसका टाईटल ‘बद्दुआ’ है। इस गाने के बोल मुझे बहुत ही परेशान करने वाले और डिप्रेसिंग लगते हैं –&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;“तू भी किसी का प्यार न पाए ख़ुदा करे,&lt;br /&gt;तुझको तेरा नसीब रुलाए, ख़ुदा करे,&lt;br /&gt;मेरी तरह तुझे भी जवानी में ग़म मिले,&lt;br /&gt;तू दर-ब-दर की ठोकर खाए, ख़ुदा करे।“&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आख़िर गीतकार और गायक को इस तरह के गीतों को लिखने की प्रेरणा कैसे और कहां से मिलती है। या फिर अताउल्ला ख़ान के इस शेर को ही लीजिए –&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;“इश्क में हम तुझे क्या बताएं,&lt;br /&gt;किस कदर चोट खाए हुए हैं,&lt;br /&gt;मौत ने हमको मारा है और हम,&lt;br /&gt;ज़िंदगी के सताए हुए हैं।“&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज सुबह, आशा भोंसले के इस गीत से नींद खुली थी&lt;em&gt;...”&lt;strong&gt;चैन से हमको कभी, आपने जीने न दिया, ज़हर भी चाहा अगर पीने तो पीने न दिया।“ &lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;em&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/em&gt;&lt;div align="justify"&gt;शायद इस तरह के गाने, श्रोता को दर्द में भी 'आनंद' का मजा देते हैं। इस बात पर मुझे खुराना अंकल याद आते हैं। उम्र यही कोई पचास के आसपास....मुखर्ज़ी नगर में मेरे सामने वाले घर में रहते थे। पत्नी 2 साल पहले सिधार गई थीं। बच्चे बाहर पढ़ते थे....शाम को दो पेग अंदर गया नहीं कि, मुकेश का दर्दभरे गाने बजा देते। कहते, &lt;em&gt;“बेटा यह गाना ग़मगीन है, इसमे दर्द है, तड़प है।“&lt;/em&gt; आशा भोंसले के इस गाने को सुनने पर एक दर्द का एहसास मुझे भी हुआ...हलका-हलका पेन। पता नहीं ये दर्द कैसा है, जो अच्छा भी लगता है। उदास….म्लान…..विषादपूर्ण… रंजीदा, एक ऐसा एहसास, जिसे व्यक्त करने में ख़ुद को असमर्थ्य पा रहा हूं। यह गीत आपको उदासी की चादर से ढ़क लेती है। और इसलिए मुझे यह जानकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ, कि आशा भोंसले को पहला फ़िल्मफेयर इसी गाने के लिए मिला था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह के दर्द भरे गाने सोचने को विवश करते हैं...क्या इन गानों को लिखने, गाने या संगीतबद्ध करने वालों का निजि जीवन सुखी है? कहीं तनाव, क्रिएटीविटी का अनिवार्य हिस्सा तो नहीं? अब अताउल्ला ख़ान को ही लें...मुझे बताया गया था कि, ख़ान साहब की गर्ल-फ्रेंड नें उन्हें धोखा दे और वे उसी की कत्ल के जुर्म में जेल के अंदर हैं। जेल में ही वे इस तरह के गाने लिखने लगे। फिर किसी जेल वार्डन ने उनके गानों को रिकार्ड करने की अनुमती दे दी...आगे यह भी कि, कुछ ही दिनों में अताउल्ला ख़ान को फांसी दे दी जाएगी। अब पता नहीं, इन बातों में कितनी सच्चाई थी, या सिर्फ़ फसाना था। आशा भोंसले की कहानी भी कुछ ऐसी ही है...कुछ साल पहले, चंदन मित्रा ने आउटलुक में &lt;em&gt;“चैन से हमको कभी”&lt;/em&gt; का मर्म समझाया था। लिखा था कि, इस गाने को गाते वक्त आशा भोंसले का ओ पी नय्यर से संबंध विच्छेद हो गया था, और रिश्तों के टूटने की वही तड़प इस गाने में है। यानि यहां भी दुख, कुछ खोने का दर्द...तड़प। आशा इतना द्रवित थीं कि वो फ़िल्मफेयर ट्राफी लेने भी नहीं गईं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अहमद फराज़ की एक शेर याद आती हैं...&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;“ज़रा सी गर्द-ए-हवस,&lt;br /&gt;दिल पर लाज़मी है फराज़,&lt;br /&gt;वो इश्क ही क्या,&lt;br /&gt;जो दामन को पाक चाहता है।“&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;इन लाईनों पर फराज़ का कहना था कि, उन्होंने इस शेर को उस लड़की के लिए लिखा था, जिसे वे कभी प्यार करते थे। लेकिन शादी नहीं हो सकी। साहिर लुधियानवी को उनके दर्द भरे गानों के लिए भी जाना जाता है। अमृता के लिए उनकी ये लाईने कितनी सटीक थीं....”&lt;strong&gt;&lt;em&gt;तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं, तुम किसी गैर को चाहोगी तो मुश्किल होगी।“&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; या फिर “कभी-कभी” के इस लाईन को ही लें...”&lt;strong&gt;&lt;em&gt;मैं जानता हूं कि तू गैर है, मगर यूं ही....कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है।&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;“ ये सारी बातें कहीं न कहीं तनाव और रचनात्मकता में एक संबंध तो निश्चित ही स्थापित करती है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-4008803440155892387?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/4008803440155892387/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=4008803440155892387&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/4008803440155892387'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/4008803440155892387'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/02/blog-post_26.html' title='वो तेरे प्यार का ग़म...'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SaWnyunn_jI/AAAAAAAABIc/dGodB3Wpc6E/s72-c/sitting-alone.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-8348344977402728496</id><published>2009-02-24T20:28:00.001+05:30</published><updated>2009-02-24T20:32:29.620+05:30</updated><title type='text'>आत्महत्या के कगार पर कांग्रेस...!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5306378641287151138" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 250px; CURSOR: hand; HEIGHT: 255px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SaQLQoWj_iI/AAAAAAAABIU/BQevJTfdfWI/s400/nat.jpg" border="0" /&gt;कुछ दिनों पहले अख़बार में एक ख़बर छपी कि सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के ख़िलाफ राज्य में चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस, भाजपा और सीपीएम साथ आ गए हैं। वाकई, बात चौंकाने वाली है...क्या कांग्रेस और भाजपा भी साथ आ सकती है। हलांकि ऐसा नहीं है कि ऐसा पहली बार हुआ है बल्कि अलग- अलग पार्टियों ने अपने तरीके से इसे जस्टिफाई करने की कोशिश भी अतीत में बखूबी की है। दस सूबों में बनी पहली संविद सरकार(1967) में भी जनसंघ ने तत्कालीन सोसलिस्ट पार्टी के साथ सरकार बनाई थी। ठीक इसके दस साल बाद 77 में जनता पार्टी में भी परस्पर विरोधी विचारधारा वाली पार्टियां (जिसमें जनसंघ एक अहम घटक थी) एक मंच पर आ गई। सन ‘89 में बीपी सिंह सरकार में तो लेफ्ट भी इस में शामिल था, और बीजेपी भी। ये सारी कवायदें गैर-कांग्रेसवाद के नाम पर की गई थी, लेकिन सिक्किम का ताजा मामला इससे बिल्कुल उलट है। इसमें पहली बार ऐसा वाकया सामने आया है जब कांग्रेस ने बीजेपी से हाथ मिला लिया है। कुल मिलाकर सेकुलरिज्म के लिए वहां दीवार खड़ी हो जाती है, जहां किसी भी क़ीमत पर विरोधी को सत्ता से हटाना होता है! कांग्रेस भले ही ये सोच रही हो कि देश की जनता सिक्किम जैसे छोटे सूबे में हो रही हलचलों पर ध्यान नहीं देती, लेकिन ये उसके लिए एक ख़तरनाक भूल साबित हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो ऐसे मामलों की भरमार दिखने लगी है। एनसीपी जो खुद को सेक्युलर कहते नहीं अघाती, वो एक साथ दिल्ली में यूपीए की घटक है, जबकि मेघालय में बीजेपी के साथ सरकार चला रही है। यहीं एनसीपी पूना नगर निगम में कांग्रेस को हराने के लिए शिवसेना से हाथ मिला चुकी है, और अभी भी वो शिवसेना के साथ किसी भी तरह के गठबंधन के दरवाजे खुले होने की बात करती रही है। और तो और अपने लालू जी क्या कम है...वो जब पहली बार बिहार की गद्दी पर काबिज हुए थे तो उन्हे बीजेपी से समर्थन लेने में कोई संकोच नहीं हुआ था। वो आजकल सेकुलरिज्म के सबसे बड़े मसीहा है। छोड़िए इन बातों को, ताजा मामला कल्याण सिंह और मुलायम सिंह की जुगलबंदी का है। कल्याण सिंह के शासनकाल में बाबरी मस्जिद शहीद हुई थी, और वो संघ और हिंदुत्व के सबसे बड़े पोस्टरब्वाय थे, लेकिन आजकल मुलायम उनके साथ गलबहियां डाले घूम रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सवाल ये है कि जो काम कांग्रेस ने सिक्किम में करने का फैसला किया है वो देश स्तर पर दुहरा पाएगी?  मजूदा हालात तो इसकी इजाजत नहीं देते, लेकिन सियासत कुछ भी साधने की ही कला है। आज से 40 बरस पहले कौन जानता था कि जॉर्ज फर्नांडिज जैसे नेता भगवा गोद में बैठ जाएंगें या फिर लालू जैसे लोग कांग्रेस के साथ आ जाएंगे? अभी कांग्रेस और बीजेपी देश के स्तर पर दो परस्पर विरोधी ध्रुवों पर खड़े हैं और कांग्रेस-बीजेपी गठजोड़ की बात सोंचना सिरफिरापन से कम नहीं। लेकिन जिस हिसाब से राष्ट्रीय पार्टियों का जनाधार सिकुड़ रहा है, उसमें ज्यादा उम्मीद इस बात की है आनेवाले वक्त में वो राष्ट्रीय स्तर पर बिल्कुल महत्वहीन होने की दिशा में बढ़ रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीजेपी को एक फायदा ये है कि उसके पास एक विचारधारा है, लेकिन कांग्रेस के पास सिवाय खानदान के, मुल्क को देने को कुछ भी नहीं। उसके तमाम विचारों के कई दावेदार देश में हैं। ऐसे में हम कांग्रेस को एक धीमे मौत की तरफ बढ़ते देख रहे हैं। कांग्रेस, सेकुलर पार्टियों को तो बर्दाश्त कर सकती है, लेकिन बीजेपी के साथ तालमेल उसका सत्यानाश कर देगी। अलबत्ता, बीजेपी के लिए वो दिन बड़े सुकून का होगा कि कांग्रेस उसकी तरफ हाथ बढ़ाए-वो क्षण बीजेपी के लिए किसी विजय से कम नहीं होगा। और ऐसा तभी होगा जब कांग्रेस तिहाई से घटकर 50-60 सीटों पर पहुंच जाए और फिर बसपा, आरजेडी या सपा जैसी पार्टियां ही उसे धकिया दे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ये सारी बाते अभी काल्पनिक हैं। फर्ज़ कीजिए कांग्रेस की ताकत अगले 20 सालों में 50 सीटों तक सिमट जाती है, तो बहुत से बहुत वो एक दूसरे मोर्चे की सम्मानित सदस्य भर रह जाएगी। देश में जिस तरह से समाजिक-राजनीतिक ताकतों का रीएलाइनमेंट हो रहा है, उसमें ये देखना काफी दिलचस्प होगा। हलांकि राजनीति लेंडस्केप की तरह नहीं बल्कि स्काईस्केप की तरह बदलती है, और आगे क्या होगा ये कहना मुश्किल है। ये भी हो सकता है कि कांग्रेस मुसलमानों को आकृष्ट करने में फिर सफल हो जाए और एक ताकत बनी रह जाए। लेकिन सिक्किम जैसी घटना पार्टी के तमाम एजेंडे पर पानी फेर सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो फिर कुल मिलाकर तस्वीर क्या बनती है? भई, मामला ये बनता है कि इलाकाई स्तर पर हम सत्ता के लिए कुछ भी कर लेंगे लेकिन सेक्युलर होने का तमगा हम से न छीनो। ज़ाहिर है ये सारी पार्टियां इस देश के अल्पसंख्यकों और सेक्युलर मिजाज के लोगों को या तो बेवकूफ़ समझती हैं, या उन्हे लगता है कि मुसलमान इतना अज्ञानी है कि वो कुछ जानता ही नहीं। ताज्जुब की बात तो ये कि बात-बात पर मुस्लिम हितों की दुहाई देनेवाली मुस्लिम जमातें भी इस पर खामोश हैं-शाय़द वो विकल्पहीनता की स्थिति में जी रही हैं। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-8348344977402728496?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/8348344977402728496/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=8348344977402728496&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8348344977402728496'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/8348344977402728496'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/02/blog-post_24.html' title='आत्महत्या के कगार पर कांग्रेस...!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SaQLQoWj_iI/AAAAAAAABIU/BQevJTfdfWI/s72-c/nat.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-585265253419147883</id><published>2009-02-23T22:00:00.000+05:30</published><updated>2009-02-23T22:03:23.885+05:30</updated><title type='text'>बच्चन साब...अब तो ऑस्कर भी मिल गया...!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SaLPi5_FQAI/AAAAAAAABIM/FLbjEZQiIEM/s1600-h/Slumdog.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5306031509583773698" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SaLPi5_FQAI/AAAAAAAABIM/FLbjEZQiIEM/s400/Slumdog.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;अरसे बाद मिला ऑस्कर...पूरे देश में छाई ख़ुशी...लेकिन, ताज़्जुब की बात ये कि बॉलीवुड के बड़ों-बड़ों ने अपनी ज़ुबान पर ताले लगा लिए। क्या, ये उनकी हीन ग्रंथि है, कि इतने तमगों के बाद भी उन्हें कभी ऑस्कर नसीब नहीं हुआ और नए-नए लोग ऑस्कर ले उड़े। जी हां....हम बात फिर से ‘सदी के महानायक’ अमिताभ बच्चन की ही कर रहे हैं। बिग-बी ने फ़िल्म रिलीज़ होते ही इसकी आलोचना की थी...कहा था कि ये फ़िल्म इंडिया की गरीबी बेचती है। माना कि फिल्म में कई कमियां हो सकती हैं, या और भी खोजी जा सकती है, लेकिन क्या ये कोई साधारन मौका था ? जो देश ओलंपिक में गोल्ड और फिल्मों में ऑस्कर के लिए तरसता हो वहां क्वालिटी और भेदभाव की बात उठाना असलियत से जी चुराना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कम से कम ऑस्कर मिलने के बाद जनता की उफ़नती भावनाओं का ख्याल तो बिग-बी को करना ही चाहिए था। कम से कम तारीफ़ के दो बोल ही बोल देते, उनका बड़प्पन होता। लेकिन नहीं, अमिताभ की चुप्पी ख़तरनाक है। ये मानवीय और व्यवसायिक शिष्टाचार का उल्लंघन ही नहीं , बल्कि धारा के खिलाफ एक महानायक की लाचार निगाह है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;माना कि बिग-बी ने अनिल कपूर वाला रोल इसलिए नहीं किया कि उसमें उन्ही के किरदार का रोल नकारात्मक सा था। दूसरी बात जो लोगों को हजम नहीं हुई वो ये कि अमिताभ ने गरीबी बेचने का इल्जाम फिल्म के निर्देशक पर लगाया है। लेकिन क्या ये वही अमिताभ है, जो आज से 40 साल पहले  सिस्टम के खिलाफ दहाड़ मारते हुए, ‘एंग्री यंग मेन’ बन गया था। वो आम आदमी की आवाज़ बन गया था। लेकिन नहीं.....साल 2009 का अमिताभ वो है, जो सिस्टम के भ्रष्टतम लोगों के साथ गलबहियां डाले घूमता दिखाई देता है। पंकज श्रीवास्तव का एक लेख कबाड़खाना पर कभी पढ़ा था, जिसमें उन्होने अमिताभ की इन्ही बातों के लिए कड़ी आलोचना की थी। नई शताब्दी का अमिताभ वो है, जो हिंदी बोलने के सवाल पर राज ठाकरे से माफी मांग लेता है। और ये साबित हो चुका है कि जिस एंग्री यंग मेन को जनता ने पलकों पर उठाया था उसकी अकाल मौत हो चुकी है। ये महानायक तो कोई उम्मीद भी नहीं जगाता। वो तो अक्सर कूपमंडूक बातों के लिए चर्चा में रहने लगा है। और ऐसे में उसके बेटे के मंगला होने को लेकर अगर राजेंद्र यादव आलोचना करते हैं तो इसमें ग़लत क्या है। ग्रह शान्ति के लिए पेड़ के चक्कर लगाने से बेहतर है कि हिंदुस्तान की गरीबी ही बेची जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी बात जो अहम है, वो ये कि स्लमडॉग को ऑस्कर मिलना सिर्फ़ फिल्म उद्योग के बड़ों बड़ों को आईना ही नहीं दिखा रहा, बल्कि उन निर्देशकों और निर्माताओं को भी अंगूठा दिखाता है, जिनके लिए भारत का मतलब सिर्फ पंजाब या पंजाबी पृष्टभूमि रह गई है। ये फिल्म इस बात की भी तस्दीक करता है, कि हमारा ही कच्चा माल लेकर एक विदेशी मेहमान किस तरह से क्वालिटी स्टफ हमें ही बेच गया है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;एक बार फिर अमिताभ की बात करें तो इतना जरुर है कि उनकी ये सोची समझी चुप्पी लोगों को कहीं न कहीं जरुर चुभ रही है। और महानायक की छवि कुछ छोटी...बल्कि बहुत ही छोटी... हो गई है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-585265253419147883?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/585265253419147883/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=585265253419147883&amp;isPopup=true' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/585265253419147883'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/585265253419147883'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/02/blog-post_23.html' title='बच्चन साब...अब तो ऑस्कर भी मिल गया...!'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SaLPi5_FQAI/AAAAAAAABIM/FLbjEZQiIEM/s72-c/Slumdog.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-7526013200435881957</id><published>2009-02-15T22:01:00.007+05:30</published><updated>2009-02-15T23:56:30.650+05:30</updated><title type='text'>फंस गया है अमरीका - 1</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SZhIgLoLL0I/AAAAAAAABIE/qazExjHr2-4/s1600-h/untitled.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5303068278943067970" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 349px; CURSOR: hand; HEIGHT: 286px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SZhIgLoLL0I/AAAAAAAABIE/qazExjHr2-4/s400/untitled.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;इन दिनों पाकिस्तान किसी कांच के टुकड़े सा खयालों में चुभता है। पाकिस्तान के झंडे पर बना चांद और एक सितारा बिल्कुल अकेला और मायूस लगता है। मैं और विश्वदीपक रोज़ शाम को जब कॉफ़ी पीने वीडियोकॉन टॉवर से नीचे उतरते हैं, तो आसमान के दक्षिण-पश्चिम में एक सितारा बेतरह चमकता हुआ दिखता है। &lt;strong&gt;(वीडी रोज़ इसी बात को दुहराता है कि वो भी इसी सितारे की तरह चमकना चाहता है...अकेला लेकिन सबसे चमकदार)&lt;/strong&gt;। लेकिन पाकिस्तान के झंडे पर चस्पा वो सितारा आजकल मुझे काफ़ी परेशान कर रहा है। वह सितारा आजकल मद्धम है, उदास है...। बिखर जाने के कगार पर है...और यही मेरे डर की वजह है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जानते हैं क्यूं ?...पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी ने मुल्क को बचाने की गुहार लगाई है। जरदारी की यह गुहार कातर है, दयनीय है। लेकिन इस गुहार में दम है। जरदारी ने तो इतनी कातर गुहार उस वक्त भी नहीं लगाई थी जब बेनजीर की हत्या हुई थी। ऐसा लगा जैसे जरदारी के हाथ से पाकिस्तान किसी गेंद की तरह फिसलने वाला है, और उनको इसका इल्म पहले ही हो चुका है। इस गेंद को फिसलने की हद तक पहुंचाने वाला अमेरिका भी हैरान है, परेशान है। अफ़गानिस्तान को अमेरिका के लिए दूसरा वियतनाम कहा जाने लगा है। तारीख़ एक बार फिर अपने को दुहरा रहा है। एक बार फिर अमेरिका, वियतनाम की तरह ही अफ़गानिस्तान में बुरी तरह फंसा चुका है। 9/11 के बाद अफगानिस्तान में ऑपरेशन इनड्यूरिंग फ्रीडम शुरू करते वक्त जार्ज बुश को इसका जरा भी गुमान नहीं होगा। लेकिन अफगानिस्तान में तेजी से बदलते हुए हालात इसी ओर इशारा कर रहे हैं। यानि वियतनाम- 2 । &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अमरीकी राष्ट्रपति बार-बार इस युद्ध को जीतने की बात शिद्दत से दुहरा रहे हैं। लेकिन ओबामा जानते हैं, जिस मुल्क में अमरीका जा फंसा है, उस अफगानिस्तान को देश या राष्ट्र की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अफगानिस्तान कई टुकड़ों में बंटा हुआ कबीलों का नाकामयाब झुंड है, जहां तालिबान लड़ाके और कबीलाई सरदार, विदेशी ताक़तों के मुखालफत के सदियों से आदी रहे हैं, और जरूरत पड़ने पर सीमा पार पाकिस्तान के सुविधाजनक ठिकानों में जा छुपते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;दुश्मन के रूप में तालिबान, वियतनामी कांग्रेस विद्रोहियों की तरह शक्तिशाली या एकीकृत नहीं है। ये भी असंभव था कि वियतनामी लड़ाके न्यू-यार्क या शिकागो पर हमला करते, लेकिन इसके उलट अफगानिस्तान में ट्रेनिंग प्राप्त आतंकियों ने ही 2000 में 9/11 और पेंटागन पर हमले किए। एक अमरीकी सामरिक विशेषज्ञ का तो यहां तक कहना है कि अमरीका, अफगानिस्तान में जीत कर भी हार जाएगा- कम से कम इस जीत के लिए कोई समय सीमा या बजट का निर्धारण ख़ुद को अंधेरे में रखना होगा। पेंटागन मानता है, अफगानिस्तान में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। वियतनाम युद्ध के दौड़ान राष्ट्रपति कैनेडी वियतनाम से आ रही बुरी ख़बरों को सुनने के आदी हो चले थे, यही हाल कार्यकाल के अंतिम दिनों में बुश का रहा और अब यह ओबामा के परेशानी का सबब भी है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अफ़गानिस्तान में अभी लगभग 30,000 अमेरिकी सैनिक हैं, जो 2010 तक 60,000 तब पहुंच जाएगा। 60,000 की संख्या वियतनाम में भेजे गए पांच लाख सैनिकों की संख्या के सामने बौनी है। अफ़गानिस्तान में 2001 से अब तक 642 अमरीकी सैनिक मारे गए हैं, जो वियतनाम में मारे गए 58,000 सैनिकों कि तुलना में भी काफ़ी कम है। लेकिन चिंताजनक बात यह है कि 2001 में युद्ध शुरू होने के पहले 9 महीनों में मारे गए सैनिकों की तादाद उतनी ही अवधि में वियतनाम में मृत सैनिकों की तुलना में काफ़ी ज्यादा है। और सबसे ज्यादा उलझाने वाली बात यह है कि ओबामा प्राशासन के पास भी इस बात का कोई जवाब नहीं है, कि आख़िर अफ़गानिस्तान में सैनिकों की संख्या क्यूं बढ़ाई जाए। दरअसल, स्याह हक़ीकत तो यही है कि अफ़गानिस्तान में जंग जीतने के लिए अमरीका के पास कोई मुक्कमल योजना है ही नहीं। बुश प्रशासन की तरह, ओबामा के सलाहकार भी किसी रणनीति को सफ़ल बनाने में असफ़ल दिख रहे हैं। किसी रणनीति के आभाव में, अफ़गानिस्तान में सैनिकों की संख्या बढ़ाना मूर्खता है। बल्कि इससे स्थिति और गंभीर होगी। सैनिकों की बढ़ी हुई संख्या आज़ाद खयाल अफ़गानियों के मन में डर पैदा करेगी और वे इसे निश्चित रूप से अपनी स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ मानेंगे। अमरीका से आधी दुनिया दूर वियतनाम, बहुत से अमेरिकियों के लिए एलियन देश था। अफ़गानिस्तान के बारे में भी आम अमरीकियों की धारणा अलग नहीं है। वियतनाम फ्रेंच कॉलोनी रह चुकी थी, लेकिन अफ़गानिस्तान में उपनिवेशवाद का विरोध हमेशा से ज्यादा मुखर रहा है। वो फिर 18वीं शताब्दी में अंग्रेज रहे हों, या फिर 80 के दशक में रूसी फौज- अफगानियों ने अपनी ज़मीन पर किसी बाहरी ताक़त को बर्दास्त नहीं किया है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;भ्रष्ट करजाई सरकार भी अमरीका सफ़लता की राह में रोड़ा साबित हो रही है। 2001 में करजाई को सत्तासीन करते वक्त अमरीका को जरा भी अंदाजा नहीं होगा कि, ये सरकार दुनिया की भ्रष्टतम सरकार होगी। दुनिया भर से मिलने वाले ग्रांट का तीन-चौथाई हिस्सा सराकरी मुलाजिमों के विदेशी बैंक एकाउंट में चली जाती है। ऐसे देश जहां एक आम आदमी 1 डॉलर प्रतिदिन से भी कम में गुजारा करता हो, यह स्थिति वाकई चिंताजनक और शर्मनाक है। न्यूजवीक में छपे एक लेख की मानें तो प्रेत्येक अफगानी नागरिक को हरेक साल 100 डॉलर ब्खशीश (रिश्वत) में सरकार या फिर आतंकियों को देना पड़ता है। इस देश की तल्ख़ हकीकत यह भी है कि नशीले पदार्थों की तस्करी यहां आय का सबसे बड़ा साधन है। इसके अलावा रोजगार का कोई साधन नहीं है। विदेशी सहायता से चल रहे विकास परियोजना, राजधानी काबुल और इसके आसपास के इलाकों तक ही सीमित है। और इसमें भी जमकर सरकारी लूट-खसोट होता है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;2001 में जब अमरीकी नेतृत्व में तालीबान को कुचला गया था, तो आम जनता के मन में एक आशा जगी थी। उन्हें लगा था कि अमरीका उनकी किस्मत बदल देगा। उन्हें अच्छी सड़कें मिलेंगी, बच्चे स्कूल जा सकेंगे, अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट आएगी। लेकिन आठ साल बाद, उनके सपने दम तोड़ते हुए दिख रहे हैं। ग़रीब तो वो पहले भी थे, लेकिन उस गरीबी के साथ-साथ अब उन्हें अमरीकी बमों का शिकार भी बनना पड़ता है। &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;(जारी....)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-7526013200435881957?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/7526013200435881957/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=7526013200435881957&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/7526013200435881957'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/7526013200435881957'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/02/1.html' title='फंस गया है अमरीका - 1'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SZhIgLoLL0I/AAAAAAAABIE/qazExjHr2-4/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-713443288355870949</id><published>2009-02-08T23:54:00.010+05:30</published><updated>2009-02-11T00:00:44.892+05:30</updated><title type='text'>माँ सारदेSS कहाँ तू बीना बजा रही हैSS</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5300495242906266834" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 328px; CURSOR: hand; HEIGHT: 210px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SY8kVxcTbNI/AAAAAAAABHs/G1M1iuBxwoU/s400/image008.jpg" border="0" /&gt;हम बच्चों की पुकार माँ सारदे क्यों सुनतीं, लक्ष्मी ने हमारी प्रार्थना को पहले ही अनसुना जो कर दिया था। बाल विकास इस्कूल के बच्चे रोज़ाना माँ सारदे से पूछते थे कि वो कहाँ बीना बजा रही हैं. नीली कमीज़, खाकी हाफ़पैंट और बहती नाक बाले बच्चों को दून स्कूल, वेलहैम, शेरवुड और स्प्रिंगफ़ील्ड का पता ही नहीं था, जहाँ वे वीणा बजाती हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;माँ सारदे बीना बजाने में व्यस्त रहीं, उनकी कृपा जिन लोगों पर हुई उन्होंने प्राइमरी स्कूल में फ्रेंच, सितार, स्विमिंग और घुड़सवारी भी सीखी। हम ककहरा, तीन तिया नौ, भारत की राजधानी नई दिल्ली है...पढ़कर समझने लगे कि माँ सारदे की हम पर भी कृपा है। हमने सरसती पूजा को सबसे बड़ी पूजा समझा।&lt;/p&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;जाड़े की गुनगुनी धूप में चौथी से लेकर दसवीं क्लास तक हर साल गन्ना चूसते हुए या छीमियाँ खाते हुए प्लान बनाते--'इस बार सरसती पूजा जमके करना है।' तभी शंकालु आवाज़ आती, 'अबे, चंदा उठाना शुरू करो', कोई कहता, 'अभी से माँगोगे तो भगा देंगे लोग', दूसरा कहता, 'कोई बार-बार थोड़े न देगा, पहले ले लो तो अच्छा रहेगा...&lt;/p&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;''सरस्वती पूजा समिति' नाम की खाकी ज़िल्द वाली हरी-नारंगी रसीद-बुक लेकर हमारी टोली निकल पड़ती चंदा उगाहने। हम इक्यावन, इक्कीस, ग्यारह से चलकर दो रुपए पर आ जाते थे. कई दुकानदार चवन्नी निकालते और उसकी भी रसीद माँगते थे. जंगीलाल चौधरी कोयले वाले ने जो बात सन अस्सी के दशक के अंत में कही थी उसका मर्म अब समझ में आता है--'अभी तो ले रहे हो, जब देना पड़ेगा न, तब फटेगा बेटा...&lt;/p&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;'गहरी चिंताओं और आशंकाओं का दौर होता, मूर्ति के लिए पैसे पूरे पड़ेंगे या नहीं, घर से माँगने के सहमे-सहमे से मंसूबे बनते, रात को नींद में बड़बड़ाते-- 'पाँच रुपए से कम चंदा नहीं लेंगे...'। कुम्हार टोली के चक्कर लगते, अफ़वाहें उड़तीं कि इस बार रामपाल सिर्फ़ बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ बना रहा है हज़ार रुपए वाली, दो सौ वाली नहीं...दिल धक से रह जाता, कोई मनहूस सुझाव देता, 'अरे, पूजे न करना है, कलेंडर लगा देंगे।' &lt;/p&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;कलेंडर वाली नौबत कभी नहीं आई, कुछ न कुछ जुगाड़ हो ही गया, सरसती माता ने पार लगा दिया। रिक्शे पर बिठाकर, मुँह ढँककर, 'बोलो-बोलो सरसती माता की जय'...कहते हुए किसी दोस्त के बरामदे पर उनकी सवारी उतर जाती. टोकरियाँ उल्टी रखकर उनके ऊपर बोरियाँ बिछाकर सिल्वर पेंट करके पहाड़ बन जाते, चाचियों-मौसियों-बुआओं की साड़ियों से कुछ न कुछ सजावट हो जाती।&lt;/p&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;p align="justify"&gt;शू स्ट्रिंग बजट&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;, टीम वर्क, मोटिवेशन, प्लानिंग, क्रिएटिव थिंकिंग...जैसे जितने मैनेजमेंट के मुहावरे हैं उनका सबका व्यावहारिक रूप था दस साल के लड़कों की सरसती पूजा। आटे को उबालकर बनाई गई लेई से सुतली के ऊपर कैंची से काटर चिपकाए गए रंगीन तिकोने झंडों के बीच रखी हंसवाहिनी-वीणावादिनी की छोटी-सी मूर्ति. कैसी अनुपम उपलब्धि, हमारी पूजा, हमारी मूर्ति...ठीक वैसी ही अनुभूति, जिसे आजकल कहा जाता है--&lt;strong&gt;&lt;em&gt;'यस वी डिड इट'।&lt;/p&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;पूरे एक साल में एक बार मौक़ा मिलता था मिलजुल कर कुछ करने का, धर्म के नाम पर। क्रिकेट टीम बनाने और सरसती पूजा-दुर्गा पूजा-रामलीला करने को छोड़कर कोई ऐसा काम दिखाई नहीं देता जो निम्न मध्यवर्गीय सवर्ण उत्तर भारतीय हिंदू किशोर के लिए उपलब्ध हो जिसमें सामूहिकता और सामुदायिकता का आभास हो।&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;आंटे के चूरन में लिपटे गोल-गोल कटे गाजर, एक अमरूद के आठ फाँक और इलायची दाना की परसादी। घर में बहुत कहा-सुनी के बाद दोस्तों के साथ पुजास्थल पर देर रात तक रहने की अनुमति. रात को भूतों की कहानियाँ और माता सरसती की किरपा से परिच्छा में अच्छे नंबर लाने के सपने. कैसे जादू भरे दिन और रातें...अचानक कोई कहता, 'अरे भसान (विसर्जन) के लिए रेकसा भाड़ा कहाँ से आएगा?'&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;/p&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;भाड़ा भी आ जाता, जैसे मूर्ति आई थी, सरसती मइया किरपा से सब हो जाता था। रिक्शे पर माँ शारदा को लेकर गंदले तालाब की ओर चलते बच्चों की टोली सबसे आगे होती क्योंकि जल्दी घर लौटने का दबाव होता. माता सरसती की कृपा से पूरी तरह वंचित बड़े भाइयों की अबीर उड़ाती टोली, बैंजो-ताशा की सरगम पर थिरकती मंडली, माता सरस्वती की कृपा से दो दिन के आनंद का रसपान करते कॉलेज-विमुख छात्रों का दल 'जब छाए मेरा जादू कोई बच न पाए' और 'हरि ओम हरि' की धुन पर पूरे शहर के चक्कर लगाता। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;p align="justify"&gt;अगले दिन सब कुछ बड़ा सूना-सूना लगता। &lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8094397945408230814-713443288355870949?l=kissago.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kissago.blogspot.com/feeds/713443288355870949/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8094397945408230814&amp;postID=713443288355870949&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/713443288355870949'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8094397945408230814/posts/default/713443288355870949'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kissago.blogspot.com/2009/02/ss-ss.html' title='माँ सारदेSS कहाँ तू बीना बजा रही हैSS'/><author><name>Rajiv K Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09974292687973179356</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SY8kVxcTbNI/AAAAAAAABHs/G1M1iuBxwoU/s72-c/image008.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8094397945408230814.post-8961293576083430198</id><published>2009-02-02T22:39:00.005+05:30</published><updated>2009-02-02T22:48:19.630+05:30</updated><title type='text'>नीतीश बने पॉलिटिक्स के 'स्लमडॉग'</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5298248528674963362" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 230px; CURSOR: hand; HEIGHT: 230px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_60q7WH1am2A/SYco9ytoP6I/AAAAAAAABHc/LTJB2mcbylU/s400/Nitish%2520Kumar_PIB.jpg" border="0" /&gt;नीतीश कुमार को सीएनएन-आईबीएन ने पालिटिशियन आफ द ईयर का अवार्ड दिया है। कुछ ही दिन पहले बिहार सरकार को बेहतरीन ई-गवर्नेंस के लिए चुना गया। भारत सरकार ने भी प्राथमिक शिक्षा में उल्लेखनीय सुधार के लिए बिहार सरकार की तारीफ़ की थी। उससे पहले केंद्रीय स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास मंत्री भी बिहार सरकार की ताऱीफ कर चुके हैं। जाहिर है नीतीश कुमार के कामकाज की तारीफ करनेवालों में उनके राजनीतिक विरोधी भी कोताही नहीं बरत रहे हैं। ये बात अलग है कि प्रचार के विभिन्न मंचों पर ये खबरें बहुत जगह नहीं बना पाईं है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;नीतीश कुमार को पालिटिशियन आफ द ईयर अवार्ड में शीला दीक्षित से काफी कड़ी टक्कड़ झेलनी पड़ी। लेकिन नीतीश के इन उपलब्धियों को कुछ लोग कई नज़रिये से देखते हैं। बिहार 
