इनकी महत्वकांक्षा तो देखिए....ये दिल्ली के कुत्ते हैं। पटना के कुत्तों को अपनी औकात पता है। कटवारिया सराय के लोकल कुत्ते हैं, ग्रेटर कैलाश या फिर वसंत कुंज के अपने ऐलीट भाईयों की तरह इन्हें होंडा सिटी या मर्सिडीज नसीब कहां। इसलिए मारूती में ही ख़ुश हैं। दरअसल दोष इनका भी नहीं है...हमनें इनके लिए ज़मीन पर जगह छोड़ा ही कहां है।
मोबाइल नहीं, डिजिटल कल्पवास चाहिए
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मोबाइल को जीवन में रस और जीवन के बड़े अर्थ से जोड़ने का उपक्रम सुबह साइकिल
लेकर निकलता हूँ। घरपरिसर में ही गोल गोल चक्कर। साइकिल बहुत तेज नहीं
चलाता—इतनी ही...
4 days ago
4 comments:
दिल्ली के हैं न!!
दिल्ली के हैं न!!
yr sympathy for dogs is really grt !!!
अरे यार कुत्तों की भी क्या गलती है वो भी सोचते हैं कि इन गाड़ियों के भीतर जो दिन भर बैठ के घुमते हैं ऊ तो हमसे भी बड़े कूकर हैं.....
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