Saturday, January 5, 2008

छोरा गंगा किनारे वाला

बचपन और जवानी के शुरुआती वर्ष पटना में बिताए हैं। घर गंगा किनारे था। इसलिए तैराकी जाने-अनजाने ख़ून में ही शामिल था। एक बाँस, दो बाँस से बढ़ते-बढ़ते धीरे-धीर गंगा पार करना बांए हाथ का खेल हो गया। रिस्क लेकर कभी-कभी दोस्तों के साथ बाढ़ में भी गंगा जी को लांघ जाता था। लगातार दो-तीन घंटे तक पानी में तैरते रहना कोई बड़ी बात नहीं थी। लहरों के साथ-साथ, तो कभी बहाव के उलट। प्रोत्साहित किया जाता तो शायद आज राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय स्तर का तैराक आवश्य होता। कौन जानता है, देश के लिए दो-चार मेडल भी जीत लाता। लेकिन तैरते हुए पकड़े जाने पर डांट-पिटाई के सिवाय कुछ भी नसीब नहीं हुआ। कभी भैया, कभी चाचा जी, तो कभी माँ ने। गंगा मैया में नहाने के बदले सबने तबले की तरह बजाया। पता नहीं पिताजी ने कभी कुछ क्यों नहीं कहा। शायद उन्हें अच्छा लगता था कि बेटा दब्बू नहीं है।

आफ़िसयली घर से गंगा में नहाने का सिर्फ़ तीन दिन परमिशन था। गंगा दशहरा, छठ पर्व और मकर संक्रांति। वो भी पेरेंट्स के साथ। लेकिन अनाधिकारिक रूप से लगभग रोज़ नहाता था। रविवार को दोपहर में, बाकि दिन ट्युशन से गच्चा मार कर। बैग में किताबों के साथ छुपाकर तौलिया भी ले जाता था। झाड़ में बैग को छिपाकर छपा-छप। पानी से कुछ ऐसी यारी थी कि गंगा में डुबकी लगाकर तल की मिट्टी निकालकर उतराता था।

सेंट नाम वाले पटना के एक 'नामी' स्कूल में पढ़ता था। स्कूल में अंग्रेजीदा दोस्त ही ज्यादा थे। दोस्त क्या थे, सहपाठी कह लीजिए। वॉश रूम में नहाने वाले उन बच्चो को जब गंगा में स्नान के आनंद के बारे बताता तो वो भी चौंकते। कई बार तो कुछ बच्चों को स्कूल से ले भी आया था।

एक बार पता चला कि किसी सेठ ने गंगा में बोरा भर सिक्का चढ़ाया है। स्कूल से आते ही सीधे अपने गैंग के साथ गंगा घाट जा पहूंचा। छपाक-छपाक कर चार-पाँच दोस्त गंगा में कूद गए। साँस साध कर उस गहरे पानी में से हम लोगों ने बहत्तर रूपए निकाले। पैसे से विकेट और कॉस्को बॉल ख़रीदा गया। कुछ दिनों बाद पैसा छानने की ख़बर घर तक लीक हो गई। जम कर पिटाई हुई थी।

इसी तरह एक बार ख़बर मिली कि गंगा में सेंटरफ्रेश च्युंगम बह रहा है। कार्टन के कार्टन। मैच थम गया और कपड़ा उतार कर गंगा जी में छपाक-छपाक कूद पड़े थे। दोस्तो के साथ मिलकर तीन कार्टन छाना गया था। सभी दोस्तों ने अपने-अपने स्कुल में बर्थ डे मनाया। कुछ दिनों बाद पता चला कि च्युंगम एक्सपायर्ड थे। लेकिन पता नहीं किसी को कुछ हुआ क्यों नहीं। यह बात भी घर वालों के पैनी नज़र से छुप नहीं सकी। धुनाई तो नहीं हुई, लेकिन पिता जी के इज्ज़त की दुहाई देकर माँ ख़ूब रोई थी। बड़ी ग्लानि हुई।

धीरे-धीरे पढ़ाई-लिखाई का दवाब बढ़ा और गंगा मैया से नाता टूटता चला गया। पहले गंगा घाट पर बाबा के साथ बैठकर शान से मुंगफली तोड़ता था। अब घर जाता हूं तो उसी घाट पर छिप-छिपाकर सिगरेट पीता हूं। आदतें बदल गईं हैं शायद और समय भी।

4 comments:

Anuranjan Jha said...

राजीव भाई, आपकी अपबीती हमारे जेनरेशन की ट्रेजडी है। गार्जियन कभी उन चीजों के लिए प्रोत्साहित नहीं करते जिनमें हमारी रूचि थी। सिर्फ़ पढ़ाई। शायद इसलिए हम-आप वो नहीं बन सके जो हमें स्वभाविक रूप से होना चाहिए था। लेकिन चीजें बदल रही हैं।

गति said...

राजीव अच्छा लिखा हैं, लेकिन यह कहना चाहेगे गंगा मैया से रिश्ता टुटा नहीँ छूटा जरुर है। टुटा होता तो अभी भी तुम गंगा किनारे जाने का वक़्त नहीं निकलते। तुम्हारी लिखावट में एक गति होती हैं, जिसके कारण जो भी लिखते हो पढ़ने में अच्छा लगता और दूसरी खासियत यह हैं कि कोई न कोई बचपन कि शरारत भी हमेशा याद दिला देते हो सो तुम्हारे लेखन से और भी आत्मियेता हो जाती है। दोस्त परिवर्तन तो प्रकृति का नियम हैं, फिर उससे शिक़ायत कैसी। अगर तुम गंगा का किनारा छोड़कर दिल्ली नहीं आये होते तो यह किस्सागोई हमलोगों को कैसे नसीब होती।

गुस्ताख़ said...

राजीव भाई, अच्छा लिखने के लिए साधुवाद दे सकता हू। आप में अपरंपार प्रतिभा की गंगा है। लिखते रहें... हमेशा।

gustakh said...

राजीव भाई, अच्छा लिखने के लिए साधुवाद दे सकता हू। आप में अपरंपार प्रतिभा की गंगा है। लिखते रहें... हमेशा।