ये तश्वीर ब्रिटिश अख़बार डेली मेल से ली गई है। ब्रिटेन में इस साल के सबसे भयंकर तूफ़ान ने इस शख़्स को हवा में तीन फीट तक उठा दिया। Sunday, November 15, 2009
अजब गज़ब - हवा में आदमी
ये तश्वीर ब्रिटिश अख़बार डेली मेल से ली गई है। ब्रिटेन में इस साल के सबसे भयंकर तूफ़ान ने इस शख़्स को हवा में तीन फीट तक उठा दिया। Saturday, November 14, 2009
सचिन ग्रेट हैं..लेकिन जीत का चस्का तो गावस्कर ने लगाया था।
आज सचिन अंतराष्ट्रीय क्रिकेट में 20 साल पूरा कर रहे हैं। इन 20 वर्षों में सचिन ने सफ़लता के कई मुकाम खड़े किये। कितनी ही रिकार्डें ध्वस्त की...कई नए कीर्तिमान बनाए...इस खेल की नई परिभाषाएं गढ़ीं। क्रिकेट प्रेमियों का भरपूर मनोरंजन भी किया। लेकिन क्या सचिन इतिहास के सबसे महान क्रिकेटर हैं?? सच है, सचिन ने वन डे और टेस्ट में जो रनों का पहाड़ खड़ा किया है, वो अपने आप में मिसाल है, और आने वाले सालों साल तक कोई खिलाड़ी उनके रिकार्ड के आसपास भी पहुंचता नहीं दिखाई दे रहा है। लेकिन व्यक्तिगत रन और महानतम होना, दो अलग-अलग बातें हैं। मेरे जेनरेशन के लोगों ने सुनिल गावस्कर को कम ही खेलते देखा है। लेकिन मुझे वो सचिन से महान और बेहतरीन बल्लेबाज लगते हैं। ये विचार बिल्कुल ही व्यक्तिगत हैं।
गावस्कर ने ऐसे तेज़ गेंदबाजों का सामना किया जो क्रिकेट इतिहास में पहले कभी नहीं देखा था, न ही आगे देखा। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह थी कि पहली बार कोई देशी जीतने की मांईडसेट से खेलने उतरा था। गावस्कर से पहले हम खेलने के लिए खेलत थे, जीतने के लिए नहीं। मैदान के चारों और लगने वाले गावस्कर के चौकों, छक्कों से कड़कड़ाहट से हमारी तंद्रा टूटी। खेल की भावना तो हमारे अंदर थी, लेकिन जीतने का ख़्वाब पहली बार हमने गावस्कर की आंखों से ही देखा था। गावस्कर पहले भारतीय क्रिकेटर थे, जिन्होंने विरोधी टीम की आंखों में घूरा। जिसकी शाट्स की चमक गेंदबाजों को विस्मृत कर देती...चौधिया देती। आप इसे मनोवैज्ञानिक इंजीयरिंग कह सकते हैं। आज हरभजन या सचिन अगर विरोधियों की आंखों में विजय भाव से घूर सकते हैं, तो इसका श्रेय गावस्कर को ही जाता है। ऐसा भी नहीं है कि उस वक्त हमारी टीम में गावस्कर से बेहतर खिलाड़ी नहीं थे...लेकिन हौसले का आभाव तो था ही। सैकड़ों वर्षों की गुलामी मानसिकता मैदान पर भी दिख जाती। गावस्कर ने इसी जिंक्स को तोड़ा था। पहला खिलाड़ी जिसने आस्ट्रेलिया में आस्ट्रेलिया के ख़िलाफ वॉक आउट करने की हौसला दिखलाया। भारतीय क्रिकेट का प्रथम पुरूष जो अपनी कमजोरियों को समझता था, फिर भी जीतने के लिए ही मैदान में उतरता था। वो विजय भाव से खेलता, हार उसे यकीनन मंजूर नहीं था। जीतने का चस्का हमें गावस्कर ने ही लगाया था।
गावस्कर को क्रिकेट ही नहीं भारतीय मानसिकता के पुनर्जागरण का श्रेय भी जाता है। अगर हमारे लिए क्रिकेट धर्म है...सचिन भगवान हैं...तो गावस्कर निश्चित ही उस भगवान से बड़े हैं। क्रिकेट का पहला विद्रोही...और शायद सेट ट्रेंड से इसी बगावती सोच के कारण गावस्कर ने कभी हेलमेट पहन कर नहीं खेला...कभी नहीं। और कल्पना कीजिए उन्होंने किस तरह के गेदबाजों का सामन किया..माइकल होल्डिंग, एंडी राबर्टस, जोएल गार्नर, डेनिस लिली, जैफ थॉमसन, मैल्कम मार्शल, बॉब विल्स, सर रिचर्ड हैडली, इमरान ख़ान, सरफ़राज नवाज़, वसीम अकरम...। ये सब लगातार 90 की रफ़्तार से तेज़ गेदबाजी करने में सक्षम थे। और एक भी गेंद सन्नी को छू तक नहीं सकी...। क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि सचिन इन गेंदबाजों का सामना बिना हेलमेट के कर पाते।
Thursday, November 12, 2009
आज तो ख़ुश होगा भाई...!
बिजनेस मैग्जीन फोर्ब्स ने आज दुनिया के 100 ताक़तवर लोगों की सूची जारी कर दी है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा नंबर 1 पर हैं। लेकिन पहली बार अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह और अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद इब्राहीम भी इस लिस्ट में आ गया है। वो भी 50 वें पायदान पर...। यह इसलिए भी आश्चर्यजनक है क्योंकि दाउद, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मात्र 14 पायनान नीचे है। प्रधानमंत्री 36वें नंबर पर हैं। दाउद, मुकेश अंबानी से सिर्फ़ 6 पायदान नीचे है। गौरतलब है कि इस सूची में लक्ष्मी मित्तल और रतन टाटा, दाउद से पिछड़ गए हैं। मित्तल और टाटा क्रमश: 55 वें और 59वें स्थान पर हैं। आज तो ख़ुश होगा भाई..।Sunday, November 8, 2009
गीयर वाला रिक्शा
मैट्रीक पास करने पर पिताजी ने गीयर वाली साईकल नहीं दिलाई थी। दो दिनों तक रूठा रहा। फिर समय के साथ स्मृतियां धूमिल होती चली गईं। कार ख़रीदने का प्लान कर रहा हूं। गीयर वाली कार...। दोस्तों नें बताया कि गीयर वाली साईकिल से हवाई जहाज को भी पछाड़ सकता हूं। शर्त यह की मेरे अंदर उतनी एनर्ज़ी होनी चाहिए। पटना में साईकिल चलाते वक्त बगल से गीयर वाली साईकल आगे निकल जाती तो मन में एक कुंठा घर जाती...काश! पिताजी ने यह साईकिल दिला दी होती, कम से कम बीच सड़क पर बेटे की नाक तो नहीं कटती। हां, बाकी कार, स्कूटर, बाईक को अपने साईकिल से आगे होता देख रेस लगा लेता, और पटना की तंग सड़कों ने हमेशा आगे रहने में मदद की। प्लान तो टूर द फ्रांस में हिस्सा लेने का भी था। लेकिन हालात और रोजी रोटी नें विचारों का दम कई साल पहले ही घोंट दिया। चलिए कोई ग़म नहीं...। आज अचानक रायपुर में चलने वाली इस रिक्शे पर नज़र चली गई। क्युट कंपनी का आण्डाकार गीयर...। अब रिक्शा भी तेज़ चलेगी। दो बीघा ज़मीन के शंभू महतो का दम भी नहीं निकलेगा। Friday, November 6, 2009
वरिष्ट पत्रकार प्रभाष जोशी का निधन..।
Sunday, November 1, 2009
'सुरसंग्राम' बनाम बिहारी उपराष्ट्रीयतावाद
भोजपुरी गानों के इस संग्राम में एक से एक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियां दी-लेकिन अतत: मोहन राठौड़ और आलोक पांडे ही अतिम दो में चुन कर आए। मेरी राय में, बल्कि ज्यादातर निरपेक्ष लोगों की मानें तो मोहन राठौड़ में जो बात है वो आलोक में नहीं। वैसे आलोक की गायिकी भी बेजोड़ है, लेकिन जो भोजपुरिया फील, दर्द और बिरह की अभिव्यक्ति मोहन राठौड़ की आवाज में है उसमें शायद आलोक थोड़ा कमजोर ठहरते हैं। लेकिन अभी तक का जो एसएमएस का रिजल्ट आया है उसमें आलोक पांड़े, मोहन राठौड़ से भारी अंतर से आगे हैं।
आखिर इसकी वजह क्या है? ऐसा कैसे हो गया ? भोजपुरी भाषाभाषी आबादी की बात करें तो भले ही भोजपुरी का नामकरण भोजपुर के नाम पर हुआ हो लेकिन भोजपुरी भाषी लोगों की संख्या यूपी में बिहार से कुछ ज्यादा है। इसके आलावा यूपी के भोजपुरी भाषी लोगों का पलायन भी बड़े शहरों खासकर मुम्बई में सबसे ज्यादा है। अगर प्रति व्यक्ति आय, साक्षरता, शहरीकरण और मोबाईल धारकों की फीसदी का अनुमान लगाया जाए तो भी यूपी की भोजपुरी आबादी बीस ठहरती है। यूपी के भोजपुरी इलाकों में बनारस, गोरखपुर, इलाहाबाद(लगभग) जैसे बड़े शहर आते है जबकि बिहार के बड़े शहरों में सिर्फ पटना है जिसे पूरे तौर पर भोजपुरी शहर नहीं कहा जा सकता।
तो फिर ऐसा क्या हो गया कि बिहार के आलोक पांडे एसएमएस रेस में आगे निकल गए? सुरसंग्राम का एसएमएस पोल एक खतरनाक रुझान की तरफ इशारा कर रहा है। यह बताता है कि हाल के सालों में बिहार में क्षेत्रीय भावना किस कदर घर कर गई है। क्या इसे बिहार में पैदा होने वाली नई उपराष्ट्रीयता की भावना मानी जाए या यह वास्तव में एक स्वस्थ प्रतियोगी भावना है?
सुरसंग्राम का यह एसएमएस पोल कई चीजों की ओर इशारा कर रहा है। पहला यह, भोजपुरी भाषा के साथ पूरा बिहार जिस तरह से अपने आपको कनेक्ट कर रहा है शायद पूरा यूपी नहीं। पश्चिमी यूपी के जाटलैंड को गाजीपुर के इस रतन मोहन राठौड़ में शायद कोई दिलचस्पी नहीं है। ऐसा ही शायद ब्रज और बुंदेलखंड में भी है-दरअसल पूरे यूपी में एक यूपी या यूपीबाद या रीजनल फीलिंग का अभाव दिखता है। यूपी अलग-2 खांचे में जीता है जिसकी वजहें इसकी विशालता, आर्थिक विषमता और बड़े स्टेट होने की वजह से एक संतृप्तता की भावना है। ऐसा बिहार में नहीं है, पूरा बिहार चाहे वो मिथिला हो, मगध हो, अंग हो या भोजपुर-अपने आपको एक बिहारी उपराष्ट्रीयता से ग्रस्त पा रहा है। वो आलोक पांडे के साथ खड़ा है। उसमें एक तरह की कम्यूनिटी फीलींग है, वो लगभग ‘घेटो’ की स्थिति में है। इसकी बड़ी वजह बिहार का घनघोर पिछड़ापन और उस वजह से बिहार से बाहर इस सूबे के लोगो का लांछन, अपमान और जिल्लत में जीना है। ये एक कड़वी सच्चाई है जिसकी वजहें बिहार में दशकों से चल रहा भ्रष्ट प्रशासन और कुछ हद तक ऐतिहासिक भौगोलिक परिस्थितियां हैं। बिहार और बिहारीपन सिर्फ संज्ञा नहीं है, बल्कि ये एक सर्वनाम बन चुका है-जिसका मतलब सभी प्रकार के पिछड़े, गरीब और मजदूर लोग होते हैं-भले ही वे किसी भी सूबे से ताल्लुक क्यों न रखते हों।(ये ठीक वैसे ही है जैसे वेस्ट का मतलब अमेरिका हो गया है, भले ही उसका व्यापक मतलब यूरोप और कनाडा भी क्यों न हो)
दूसरी बात जो इस एसएमएस पोल से सामने आई है वो ये कि यूपी से भी आलोक पांडे को तकरीबन 5000 वोट मिले है। ये वे वोट हैं जो यूपी में रहनेवाले अप्रवासी बिहारियों ने आलोक को दिए हैं। जाहिर है, नोएडा, कानपुर, इलाहाबाद, बनारस, अलीगढ, मेरठ और लखनऊ में लाखों की तादाद में प्रवासी बिहारी रहते हैं जिनका सेंटीमेंट यूपी से जुड़ा न होकर बिहार के साथ है। जबकि एक सूबे के तौर पर बिहार चूंकि रोजगार का केंद्र नहीं है इसलिए प्रवासी यूपीवालों की बड़ी तादाद होने का वहां कोई प्रश्न नहीं है।
एक बात और जो गौर करने लायक है वो ये कि हाल के दिनों में मुम्बई और दूसरे जगहों पर जो उत्तर भारतीयों के खिलाफ राज ठाकरे के गुंडों के हमले हुए थे उसमें भी उत्तरभारतीय शब्द फेड आउट होता गया और क्रमश: वो बिहारियों के खिलाफ हमला होता गया। जबकि हकीकत ये है कि मुम्बई में बिहारियों की तुलना में यूपीवालों की तादाद कई गुना ज्यादा है। जाहिर है, बिहारियों को पोलराईज करने में इन चीजों ने अप्रत्यक्ष रुप से ज्यादा योगदान दिया है। हाल के सालों में छठ के अवसर पर जिस तरह की दीवानगी देखने को मिली है वह एक सूबे के तौर पर ब्रांड बिहार और छठ के इमेज को ब्लर करता हुआ प्रतीत होता है-जिसकी अवहेलना बिहार का कोई भी मुख्यमंत्री नहीं कर सकता। छठ के मौके पर बिहार के मुख्यमंत्री का घाटों का परीक्षण करना उसी तरह फैशनेवल होता जा रहा है जिस तरह से नेताओं का इफ्तार में शामिल होना! बहुत संभव है आनेवाले वक्त में ऐसा दिल्ली-मुम्बई में भी दिखे!
एक दूसरे नजरिये से देखें तो ये बिहार के लोगों का ‘खोल’ में सिमटने जैसा है, उनका ‘घेटोआईजेशन’ हुआ है। जो समाज कभी इतना उदार था कि थोक के भाव में गैर-बिहारी नेताओं को लोकसभा में चुनकर भेजता था उसके लिए ये संकेत बहुत खतरनाक और शर्मनाक स्थिति हो सकती है। एक सूबे के तौर पर ये बिहार के पतन की एक और सीढ़ी मानी जा सकती है।
लेकिन ये स्थिति एक दुधारी तलवार जैसी भी है। इसके फायदे भी हैं और नुकसान भी। फायदा ये हो सकता है कि बिहार की जनता जातीय भावना से ऊपर उठकर एक ‘पूरे बिहार’ के लिए भविष्य में प्रयास कर सकती है और भ्रष्ट राजनेताओं को सबक सिखा सकती है-ऐसा हाल तक नहीं देखने में मिला है जैसा बंगाल, तमिलनाडू या पंजाब में देखने को मिलता है। लेकिन इसका स्याह पक्ष ये है कि बिहार की जनता अखिल भारतीय रंगमंच पर क्रमश संकीर्ण हो सकती है और ज्यादा प्रतिक्रियावादी भी। वो पिछड़ेपन और असुरक्षा के माहौल में हर जगह और हर वक्त अपना ‘बिहारीपन’ अपने कलेजे से चिपकाए चलते रहने को मजबूर भी हो सकती है।
बहरहाल, इस विमर्श से अलग महुआ चैनल की प्रोगामिंग भी सवालों के घेरे में आते हैं। टीआरपी के चक्कर में प्रायोजित और भड़काऊ किस्म के बाईट कहां तक उचित हैं जो सरेआम क्षेत्रीय भावना उभाड़ते हैं? सरकार के लिए इस किस्म के प्रोग्राम भले ही मामूली हों लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि ऐसे ही ऋतिक रोशन के एक कथित बाईट के चलते कुछ सालों पहले नेपाल-भारत के रिश्तों में कड़वाहट घुल गई थी।
मुद्दे पर लौटते हुए यहीं कहा जा सकता है कि ऐसी हालत वाकई एक सूबे के तौर पर बिहार के लिए ठीक नहीं होगा-जिसे देश के दूसरे हिस्सों में अपनी इस नस्लवादी-क्षेत्रवादी भावना के चलते अलग-थलग होना पड़ सकता है और कई फायदों से वंचित भी। दरअसल, बिहार की जनता का जो गुस्सा और आक्रोश बिहार की नेताओं के खिलाफ सामने आना चाहिए वो लगभग एक कुंठा के रुप में बिहारी उपराष्ट्रीयतावाद का रुप लेती जा रही है-जो चिंता की बात है। बिहार के नेताओं, युवाओं और बुद्धिजीवियों को इस विषय पर गंभीरता से सोचने की जरुरत है।
© jhasushant\mahuatv.com\01-11-09\del
Wednesday, October 28, 2009
आह हिंदी! वाह अंग्रेज़ी!!
हमने पाया कि क्लास में हिंदी के बच्चे ज़्यादा ज़हीन थे, वे ज़्यादा इंफार्म्ड थे, उनका जीके दुरुस्त था, लेकिन कम्यूनिकेशन में वे मात खा जाते थे। उनमें एक हीन भावना थी। प्रोफेसर और गेस्ट लेक्चरर भी अंग्रेज़ी वालों से ज़्यादा बात करते, उनसे ज़्यादा फेमिलियर होते जबकि उनमें से कइयों को ये पता नहीं था राजस्थान देश के नक्शे पर किधर है। प्रेम से लेकर नौकरी तक हर जगह अंग्रेज़ी वाले सफल थे। क्लास में टाप एक हिंदी वाले ने किया था लेकिन सबसे बेहतरीन नौकरी अंग्रेज़ी वालों को मिली थी। हमें हमारी औकात का एहसास करा दिया गया था।
हमने कसम खायी कि शादी करने की कोशिश अंग्रेज़ी वाली लड़की से ही करेंगे (मेरे एक-आध दोस्त इसमें कामयाब भी हो गये) ताकि जेनरेशन सुधर जाए और अपने होनेवाले एकमात्र बच्चे को अंग्रेज़ी में पढ़ाएंगे। मुझे लगा कि मैं पहला बंदा हूं, जो ये कसम ले रहा है – बाद में पता चला कि देश के तमाम हिंदी पत्रकार सालों और दशकों पहले ये कसम खा चुके हैं।
हर सप्ताह अपने दोस्तों के साथ होनेवाली मीटिंग में हम अपने सूबे के तमाम मुख्यमंत्रियों को गालियां देते रहे कि उन्होने क्लास वन से हमें अंग्रेज़ी क्यों नहीं पढ़ाया। अपने पिता से हम कई बार झगड़े कि जिंदगी भर दिल्ली-पटना का चक्कर लनाने के बावजूद उन्हें इतनी समझ क्यों नहीं आयी। हमें नार्थ-इस्ट और साउथ से आनेवाले अपने सहपाठियों से ईर्ष्या होने लगी कि उनकी अंग्रेज़ी अच्छी क्यों है। हमने लालू, मुलायम और लोहिया (जी) को भी गाली दी कि वे क्यों हिंदी की माला जाप रहे हैं। हमें लगा हमारे पिछड़ेपन की एकमात्र वजह यहीं है कि हम अंग्रेज़ी में कमजोर हैं। गुस्सा और हताशा के उन क्षणों में हमने एक ही साथ न जाने कितने विमर्श कर डाले – गरीब-अमीर, हिंदी-अंग्रेज़ी, शहर बनाम गांव बनाम छोटा शहर बड़ा शहर बनाम कल्चरल इंपेरियलिज्म, उत्तर बनाम दक्षिण बनाम नार्थ ईस्ट बनाम इंडिया – चाइना बनाम न जाने क्या-क्या। यहां उन बातों की चर्चा इस लेख को इंटरनेट पर उबाऊ बना सकती है।
लेकिन एक दूसरा थॉट प्रोसेस भी चल रहा था। मन तो हिंदी पढ़ के ही खुश होता था। होरी महतो और शनिचरा जिस तरीके से दिल को छूता था, ससुरा सिडनी सेल्डन कभी नहीं छू पाया। न जाने बचपन से कितनी शायरी ‘कादंबिनी’ से चुराकर हमने अपने डायरी में लिख रखी थी। सोचा था कि अपनी होनेवाली ‘सिमरन’ को सुनाऊंगा। कभी-कभी कभार कोई लेख पढ़ कर जोश में आ जाता कि हिंदी ‘फैल’ रही है, अब तो बंगलोर के चायवाले भी बोलते हैं और सीईओ भी। (ये बाद में पता लगा कि सीईओ किस्म के लोग पत्रकारों द्वारा रिक्वेस्ट करने पर ही हिंदी में बाइट देते हैं या कृपा कर रहे होते हैं) टीवी, सिनेमा, अखबार, अनुवाद, वायसओवर – हर जगह नये स्कोप खुल रहे हैं। कभी-कभी ख्वाब देखता कि गुलज़ार, जावेद अख्तर, सलीम खान, लालू-मुलायम-अमर सिंह को भी तो काम चलाऊ अंग्रेज़ी ही आती है तो हम क्यों नहीं आगे बढ़ सकते? एक दोस्त ने कहा कि प्रसून जोशी भी हिंदी मीडियम के ही थे। बाद में अंग्रेज़ी सीख ली – अंग्रेज़ी में क्या रखा है – ये बातें तसल्ली देती थीं। हमारे संस्थान के एक प्रोफेसर ने कहा कि दीपक चौरसिया भी तो अंग्रेज़ी में कमजोर थे – दिल खुश हो गया कि दीपक तो बन ही सकते हैं। लेकिन हमें ये मालूम नहीं था कि हम अनुवादक भर रह जाएंगे और सारा ऑफिसियल काम अंग्रेज़ी में करना पड़ेगा। हमें बहुत लेट से ये पता चला कि इस देश में ऑडियो-वीडियो मीडियम भले ही देशी भाषाओं में ज़्यादा चले लेकिन उसका भी आफिसियल काम सारा अंग्रेज़ी में ही होता है। जहां तक छपने वाली भाषा का सवाल है, तो शायद आनेवाले सौ सालों में सारा कामकाज, अध्ययन, रिसर्च और पत्राचार अंग्रेज़ी में ही हो। मेरी ये पंक्ति भयंकर विवाद को जन्म दे सकती है जिसका मैं इंतजार कर रहा हूं।
बहरहाल, जोश और जुनून के उन्हीं पलों में हमने अपने ब्लॉग पर हिंदी के महिमामंडन में एक सिरीज की कल्पना की कि कैसे हिंदी देश में अपना उचित स्थान पा सकती है। उस आइडिया को अतिरंजित करते हुए हमने अपने ब्लाग पर एक सीरीज लिख मारी कि कैसे मरेगी अंग्रेज़ी। कई लोगों ने सराहा, कइयों ने सहानुभूति दिखाते हुए शुभेच्छा व्यक्त की!
पिछले दिनों कई लेखकों को पढ़ा तो एक भाव जो उनमें समान था वो ये कि अंग्रेज़ी दलितों के लिए तारणहार हो सकती है। मुझे लगा कि इस स्तर पर तो दलित मैं भी हूं। मेरे भोगे हुए यथार्थ की झलकियां उसमें दिखायी दी। हमें लगा कि जब कोई अंग्रेज़ी बोलता है, तो हम उसकी जाति की कल्पना भी नहीं करते कि वो वर्मा है या शर्मा। वह एक संभ्रांत वर्ग का होता है, अक्सर प्रभु वर्ग का। अंग्रेज़ी बोलने वाला प्राणी इस देश का असली ब्राह्मण है, जो सिर्फ एक भाषा सीखकर अपने बैंकग्राउंड की तमाम कमियों को छुपा सकता है, अपने इतिहास को बदल सकता है और सिस्टम को सिर के बल खड़ा कर सकता है!
हमने इतिहास खंगाला, हमने भाषाई आंदोलन, हिंदी विरोध, द्रविड़ आंदोलन, हिंदी-ब्राह्मण विरोधी आंदोलन सब कुछ चाट लिया। बचपन में लोहियाजी की पंक्तिया अक्सर गुदगुदाती थीं – कि हिंदी वो भाषा है जिसमें असम के चाय बगान में काम करने वाला बिहारी मजदूर एक उड़िया मजदूर से बात करता है। लेकिन व्यावहारिक जीवन में लोहियाजी हवा हो गये और मैकाले ज़्यादा मुफीद लगे। रेलवे स्टेशनों पर इंदिरा गांधी की उक्ति कि हिंदी ही वो भाषा है जो पूरे देश को एक सूत्र में बांध सकती है – अब मजाक लगने लगा था।
हमने महसूस किया कि आज़ादी के बाद ही जब हम हिंदी के नाम पर आमराय नहीं बना पाये तो अब 21वीं सदी में इसकी संभावना बहुत मुश्किल लग रही है। अंग्रेज़ी का पिछले तीन सौ सालों का ढांचा इतना मज़बूत है जितना शायद ब्राह्मणवाद भी नहीं। जो लोग चीन, कोरिया और जापान का उदाहरण देते हैं उन्हें ये बात याद रखनी चाहिए कि उन देशों के हालात हमारे यहां से बिल्कुल उलट हैं। न तो मंदारिन या कोरियन की तरह हिंदी कभी 90 फीसदी लोगों की भाषा थी न ही नेहरुजी उसे पूरे देश पर थोप सकते थे। अगर हिंदी आज़ादी के बाद से ही पूरे देश की पहली भाषा होती, जिसमें तकनीक से लेकर प्रशासन तक के सारे काम होते, तो अभी तक हम इसे वाकई मजबूत बना लेते लेकिन क्या ऐसा हो पाया या हालात ने ऐसी इजाज़त दी?
ऐसे हालात में, अब लकीर पीटने का कोई फायदा नहीं। हमें इस बात को स्वीकार कर लेना चाहिए कि अगर कारोबार, रोज़गार और रिसर्च में अंग्रेज़ी ही चलनी है तो दलितों को, पिछड़ो को, सवर्णों को अवर्णों को – हर किसी को पागल की तरह अंग्रेज़ी सीखनी चाहिए। हां, इसके साथ ही साथ हिंदी को और भी आसान, व्यावहारिक और रोज़गारपरक बनाने का कोई सुझाव आये तो उसे स्वागत करने में कोई दिक्कत नहीं।
COURTSEY: MOHALLA LIVE
FOR COMMENTS ON THIS ARTICLE: http://mohallalive.com/2009/10/27/sushant-jha-writeup-on-hindi-english-debate/
Monday, October 19, 2009
Thursday, October 8, 2009
मून स्ट्रक
शाम समय इक ऊंची सीढ़ियों वाले घर के आंगन में,चांद को उतरे देखा हमने चांद भी कैसा पूरा चांद!
इंशाजी इन चाहने वाली, देखने वाली आंखों ने
मुल्कों-मुल्कों, शहरों-शहरों , कैसा-कैसा देखा चांद?
हर इक चांद की अपनी धज थी, हर इक चांद का अपना रूप.....
लेकिन ऐसा रोशन-रोशन, हंसता बातें करता चांद?
दर्द की टीस तो उठती थी पर इतनी भी भरपूर कभी?
आज से पहले कब उतरा था , दिल में इतना गहरा
हमने तो किस्मत के दर से जब पाए अंधियारे पाए...
यह भी चांद का सपना होगा, कैसा चांद , कहां का चांद?
Friday, October 2, 2009
ख़ैर, आप क्या सोचते हैं???
शशि थरूर फिर से विवादों में आ गए हैं। गांधी जयंती पर एक सभा को संबोधित करते हुए शशी ने हमारी दुखती रग पर हाथ रख दिया। आलसी तो हम स्वभाव से हैं ही....कितनी भी छुट्टी मिले, हमें अक्सर शिकायत ही रहती है। सरकारी नौकरी का सबसे बड़ा फ़ायदा छुट्टी ही तो है। इधर प्राईवेट मल्टीनेशनल नें हमें कुछ तेज़ तो बनाया है, लेकिन सब मजबूरी है। मौका मिले तो हम साल भर हॉली डे मनाते रहें..। एक तो हमारे यहां त्योहारों की संख्या इतनी है कि महीने में 2-3 तीन एक्स्ट्रा छुट्टी मिल जाती है...फिर दशहरा, होली, समर वेकेशन सब को जोड़ दें तो पूरे साल में हम 200 से ज्यादा दिन काम नहीं करते। ऐसे में शशि के विचार सोचने को मजबूर करते हैं। गांधी जयंती नेशनल हॉली डे नहीं, नेशनल वर्क डे होना चाहिए....आज गांधी ज़िंदा होते तो शायद यही करते..। आप क्या सोचते हैं???? क्या गांधी जयंती नेशनल हॉली डे होना चाहिए????? ऐसे मैं अभी दफ़्तर से ब्लॉग कर रहा हूं....ये भी ग़लत है। यहां मेरे आस-पास इस विषय को लेकर भारी वाद-विवाद चल रहा है। सौरव कह रहा है कि अगर गांधी जयंती नहीं हो तो गांधी लोगों की स्मृति से गायब हो जाएंगे। अभिलाषा मानती हैं कि शशि ग़लत हैं....छुट्टी होनी चाहिए, अमित शशि के समर्थन में हैं....राहुल शशि की बातों से इत्तेफ़ाक नहीं रखते...। ख़ैर आप क्या सोचते हैं??? Thursday, October 1, 2009
60 का हुआ ड्रैगन...
आज दुनिया की नज़र बीजिंग पर टिकी होगी। ड्रैगन अपनी शक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन करेगा। इस वक्त का इंतज़ार चीन वर्षों से कर रहा था। नई दिल्ली से वॉशिंगटन तक सरकारें सांस थामकर चीन के ताक़त का दीदार करेंगी। ऐसा भव्य समारोह दुनिया पहली बार देखेगी। और इसे सफ़ल बनाने के लिए चीनी सरकार ने कोई भी कसर बाकी नहीं छोड़ी है। चीनी सेना की 66 मिनट की ये परेड भले ही प्रतीतात्मक हो लेकिन दुनिया के लिए संदेश स्पष्ट है। चीन मंच पर आ चुका है...। दुनिया मुगालते में न रहे....ड्रैगन यही संदेश दे रहा है। अब से कुछ ही देर में, चीन एक भव्य समारोह के साथ विश्व मंच पर अपने आगमन की घोषणा करेगा। Monday, September 28, 2009
बाबा नीलकंठ के ऑनलाईन दर्शन
आज विजयादशमी है। विजयदशमी के दिन नीलकंठ पक्षी को देखना शुभ माना जाता है। नीलकंठ पक्षी सुंदर और उसका गला नीला होता है, इसी कारण उसे नीलकंठ कहा जाता है। इस पक्षी में लोग विषपायी शिव के दर्शन करते हैं। नीलकंठ! आपको नमस्कार है। Sunday, September 27, 2009
ये ब्लॉग देगी ऐसी ख़बरें जो नजरों से चूक जाती है....
Friday, September 25, 2009
तो, अब कोई नहीं मरेगा...!
‘मृत्यु ही सत्य है, जीवन एक पड़ाव मात्र है।‘ ट्युशन से लौटते वक्त पटना के बांस घाट में लिखे ये शब्द मुझे परेशान करते रहे। साईकिल रोक कर रोज-रोज इस लाईन को पढ़ता। सच कहूं तो ज़िंदगी से विरक्ति होने लगी थी। पटना में गंगा किनारे घर से कुछ ही दूर पर शव-दाह गृह है। इसे संयोग कहिए या कुछ और घर से कुछ ही दूर पर पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पीटल भी है। बचपन से हज़ारों लाशों को हॉस्पीटल के पोस्टमार्टम तक आते देखा है। कभी सिर में गोली लगी लाश, कभी ट्रक के नीचे आकर हुआ मृत शरीर, करेंट से मौत, गंगाजी में डूबने से मौत, 2001 में पटना एयर क्रेश में मरे 60 लोगों की लाश हो या फिर जहानाबाद के लक्ष्मणपुर बाथे या बारा जैसे नरसंहार। लाशों को पटना ही लाया जाता है।पढ़ने-लिखने में ठीक-ठाक ही था। लेकिन इन लाशों को देखकर मन में एक विरक्ति घर कर गई थी। हल्की भाषा में कहूं तो धीरे-धीरे मन में ये बात बैठने लगी थी, “पढ़तंग तो भी मरतंग, न पढ़तंग तो भी मरतंग...तो काहे को पढ़तंग”। जब एक दिन मर ही जाउंगा तो, पढ़ लिख कर क्या होगा। पलायनवादी मानसिकता कह सकते हैं। ख़ैर, ये तो थी मौत की बात....अब जीवन की कहानी।
दरअसल डेली टेलिग्राफ़ में छपी एक ख़बर ने थोड़ा विस्मृत कर दिया है। ख़बर है कि 20 साल बाद मनुष्य अमर हो जाएगा। यह दावा है रे कुर्जविल का। 61 वर्षिय कुर्जविल जाने-माने वेज्ञानिक भविष्यवेत्ता हैं। अपने इस दावे के पक्ष में कुर्जविल ने कई तर्क भी दिए है। उनका मानना है कि जिस रफ़्तार से मानव विज्ञान तरक्की कर रही है, मौत पर 20 वर्षों में काबू कर लिया जाएगा। बात कुछ हद तक सच भी है। कुर्जविल नैनो-तकनीक की बात करते हैं। कहते हैं, कुछ ही वर्षों में वैज्ञानिक हरेक महत्वपूर्ण अंगों का कृत्रिम विकास कर लेंगे। वो चाहे फेंफरा हो, किडनी हो, त्वचा हो, हृदय हो...सबकुछ। रक्त कोशिका के जगह नैनो-ट्बुयल्स आ जाएंगे। दिमाग कंप्युटर से संचालित होगा...और भी बहुत कुछ।हलांकि कुर्जविल का यह दावा सैद्धांतिक है, लेकिन मुझे इसमें दम लगता है। आज से 25-30 वर्ष पहले तक टीवी होना मौत की गारंटी थी। आज यह सर्दी से ज्यादा कुछ भी नहीं है। चुटकी में इलाज़। कृत्रिम हृदय, फेंफरा, किडनी सबकुछ बाज़ार में उपलब्ध है। आज ही एड्स के टीके का सफ़ल परिक्षण हुआ है। कैंसर जैसी बिमारियों का इलाज कुछ सालों में आ जाएगा। पेसमेकर हर्ट को संचालित करने लगा है। यहां तक कि आने वाले समय में सेक्स भी वर्चुअल हो जाएगा। हम साईबार्ग हो जाएंगे....साईबर मैन...। हॉलीवुड की फ़िल्मों में दिखने वाला साईबार्ग हक़ीकत की धरती पर आ जाएगा। इंसान सुपर-मैन होगा, जिसकी ताक़त और समझ की विस्तार असीमित होगी।
अगर कुर्जविल के दावे पर यकीन कर लें तो भी कई ऐसी बातें हैं जो मेरी समझ में अभी से नहीं आ रही है। ये मन जो है उसका क्या होगा, और प्यार...वो कहां से आएगा। भावनाएं होंगी या नहीं, अगर हम मरेंगे नहीं तो हमारी धरती पर रहने के लिए जगह कहां से आएगा। क्या चंद्रमा पर कॉलोनी सचमुच बस जाएगी। क्या तब भी राजीव की मां पटना से रोज़ फोन कर कुशल-क्षेम पूछेंगी, क्या पापा तब भी समझाने आएंगे....और नैतिकता....इस नैतिकता का पैमाना क्या होगा....????? क्या चांद तब भी हमें प्यारा लगेगा? ठंडी हवाएं तब भी हमारे अंदर सिहरन पैदा करेगी...क्या किसी की आंखों में तब भी हम डूबेंगे???? उस व्यवस्था में भगवान का क्या रोल होगा??? कितने ही तो सवाल हैं....लेकिन कोई जवाब नहीं। ऐसे भी भविष्य की गर्भ में झांकना रॉकेट विज्ञान से कम मुश्किल नहीं रहा है। देखते हैं 2030 दूर नहीं है।
©rajivkmishra\25\09\09\del-telegraph-2-3am
A cyborg is a cybernetic organism (i.e., an organism that has both artificial and natural systems). The term was coined in 1960 when Manfred Clynes and Nathan Kline used it in an article about the advantages of self-regulating human-machine systems in outer space.






