Wednesday, July 9, 2008

जर्मन नहीं है जी, जर्मनी की है....

कटवारिया सराय में जहां मैं रहता हूं, उसमे मेंरे नीचे यानी थर्ड फ्लोर पर एक नार्थ-इस्ट का परिवार रहता है। उसमें एक तो मिंया-बीवी है जो दिन भर अपने साल भर के बच्चे को संभालने में व्यस्त रहते हैं, और साथ में एक एक नौजवान भी है..शायद वो छोटा भाई है। यह परिवार पिछले 6 महिने से हमारे नीचे वाले फ्लोर पर रहता है। अपने खास रंग-रुप की वजह से इतना तो हमें पहले दिन ही पता चल गया था कि ये लोग नार्थ-इस्ट के रहने वाले हैं लेकिन हमारी उदासीनता देखिए कि हाल तक हमें ये पता नहीं था कि ये लोग किस राज्य के रहने वाले हैं। न ही हमने कभी ये जानने की कोशिश की कि ये लोग क्या काम करते हैं।

एक आम बिहारी या यूपाईट की तरह हमने ये माना कि दिल्ली "हमारा" शहर है और एक खास-किस्म के रंग-रुप वाले ये लोग मेहमान या बहुत से बहुत प्रजा से ज्यादा नहीं हैं। बिहार या यूपी के लोग इन्हे चिंकी कहते हैं...और इनकी अपेक्षाकृत अच्छी जीवनशैली और अंग्रेजी पर पकड़ की वजह से हीनभावना वश इनसे जलते भी हैं। इनके जीने का अपना एक अलग अंदाज है...कैम्री या बरमूडा पहने हुए...मार्डन किस्म के टी-शर्ट कान में ईयर फोन और हरेक के घर में कम से कम एक गिटार। हमारे लिए ये किसी चिड़ियाघर के प्राणी से कम नहीं...साथ ही हम सोचते हैं कि उधर की लड़किया बड़ी आसानी से उपलब्ध है। हम ये भी सोचते है कि उधर के सब भारत विरोधी ही हैं...और चीन-पाकिस्तान का पैसा खाते है। पता नही ये विचार हरेक उस हिंदुस्तानी के मन में कैसे और कब से बना हुआ है। जबकि सबसे निचले फ्लोर पर कुछ बिहारी लड़के रहते हैं..उनसे हमारी दोस्ती पहले ही दिन हो गई और हमने नातेदारी भी जोड़ ली। लेकिन आज हमें ये जानने का मौका मिल ही गया कि ये परिवार कहां का है...और उसकी दिलचस्प कहानी है।

दरअसल, पिछले कुछ दिनों से थर्ड फ्लोर पर एक गोरी यूरोपीयन लड़की नजर आती है और वो हम सबमें कौतूहल का विषय है। वो लड़की पिछले दिनों नीचे किचन में चाय बनाते दिखी थी...आज वो छत पर मेरे फ्लोर से होकर कपड़ा सुखाने के लिए गई है। मक्खन जैसी त्वचा और तराशा हुआ बदन...ऐसी लड़की तो हमने अंग्रेजी फिल्मों में ही देखी थी। वो जब गुज़रती है तो एक अनजान सी सनसनी हमारे शरीर से होकर दौड़ जाती है। हम अज्ञात खयालों में खो जाते है। हमें अभी तक ये पता नहीं था कि वो लड़की कौन है। हमारे रुम के सारे लड़के ऊल-जलूल खयाल करते हैं। कोई कहता है कि छत पर जाकर उससे हाय-हेलो करते हैं। कोई कहता है कि यूरोपीय लड़कियां अच्छे शरीर सौष्ठव पर मरती है..सो जिसका फिजिक अच्छा हो वो जाए। हम लोग ऐसा सोच ही रहे हैं कि हम देखते हैं कि नीचे वाला वो नार्थ-इस्ट का लड़का उसके कंधा पकड़कर नीचे सीढ़ी से उतर रहा है। उसके पैर से हमारा बाल्टी टकराता है और नीचे गिर जाता है। बाल्टी टूट जाता है। मैं अपने नौकर को डांटता हूं कि कैसे बाल्टी रखा जाता है। वो नीचे वाला लड़का सॉरी बोलता है, साथ ही वो गोरी लड़की भी। हम उसे बड़े नम्र होकर बोलते हैं कोई बात नहीं। वो लड़का उस लड़की के साथ नीचे चला जाता है।

हम लोग के शरीर में फिर से एक बार सनसनाहट दौड़ जाती है। हम एकदूसरे की तरफ देखकर मुस्कराते हैं। हम सोचते हैं कि क्या ये गोरी-लड़की साथ न होती तो हम यूं ही बाल्टी तोड़ने वाले इस लड़के को छोड़ देते। हम बात कर ही रहे हैं कि हमारा नौकर छत से आता है और बोलता है कि जर्मनी की है। मैं बोलता हूं कि अच्छा जर्मन है....! तो मेरा नौकर बोलता है कि जर्मन नहीं है..जर्मनी की है। मैं फिर बोलता हूं कि अच्छा... ज़र्मन है। मेरा नौकर झल्लाते हुए अपना ज्ञान बघारता है कि नहीं...जर्मनी की है और वो लड़का मणिपुर का है। हम एक दूसरे को देख कर मुस्कराते हैं। आजकल हमारा नौकर ताजा-ताजा जवान हुआ है, और पड़ोस की लड़कियों को लाईन मारने के चक्कर में अक्सर छत का रुख करता है। मैं चौककर कहता हूं...अच्छा अब समझ में आया माजरा..ये लड़का रात-रात भर छत पर किससे बतियाता था। लौडे ने सॉलिड माल पटाया है। हम में से एक कहता है कि इनका बच्चा होगा तो तीसरे ही स्टाईल का होगा। हम ये भी कल्पना करते हैं कि लड़की बड़ी 'खुली किस्म' की होगी.. और हम उस नार्थ-इस्टर्न लड़के के नसीब से ईर्ष्या करते हैं। माफ़ कीजिए हमारे रुम के लड़के जाहिल नहीं है। उनमें से सारे के सारे "बुद्धिजीवी" किस्म के हैं जिनकी दुनिया के हरेक मसले पर एक मुकम्मल राय है। वे जेएनयू के पढ़े हैं..और पब्लिक फोरमों पर घनघोर मानवतावादी और सेक्युलर हैं। लेकिन एक चिंकी और गोरी चमड़ीवाली लड़की को देखकर उनकी यही राय है। मैं फिर अपने नौकर की तरफ देखकर मुस्कराता हूं-जर्मनी की है...जर्मन नहीं है।

10 comments:

Manish Kumar said...

ये तो आम भारतीय मर्दों की मानसिकता है इसका ना तो बुद्धिजीवी होने से नाता है ना किसी प्रदेश विशेष से। आपकी साफगोई पसंद आई।

महेंद्र मिश्रा said...

bahut khoob bhai kya bat hai .

pushkar said...

maine bhi us videshi bahuria ko dekha tha.chaliye ab jarman aur jarmani mai farak samajh aa gaya. thank u

Amit Kumar said...

Bhai Waah!!!!!!!!!
Ye Garman aur Garmani se muje ek baat yaad aaye, Mere Ghar ke paas hi ek ladka apne kisi dost ko samja raha tha ki Chin aur China ye alag alag desh hai aur Tajjub ye hai ki uska dost ye maan bhi gaya ki Chin aur china alag-alag desh hai.............

अड्डा said...

जर्मन और जर्मनी .... हा हा हा। कुछ - कुछ वैसा ही जैसा कि मोकामा में एक नाव दुर्घटना में सवार सभी तीस लोग डूब गए। जब पुलिस इंस्पेक्टर ने मल्लाह से पूछा कि कितने लोग सवार थे। उसका जवाब था २५ लोग सवार थे और पांच मारवाड़ी थे। इंस्पेक्टर ने फिर पूछा तो कुल तीस लोग मतलब। मल्लाह का जवाब था , नहीं हुजूर लोगन तो पच्चीसे थे पांच मारवाड़ी थे। अच्छा लिख रहे हैं जारी रखें। खासतौर पर वैसे कथित बुद्धिजीवियों के खाल में छुपे हुए अवसरवादियों को नंगा करने के लिहाज़ से भी लेख अच्छा था। चलिए अंतिम पंक्ति थोड़ी कड़ी है लेकिन चलेगा।

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