Thursday, September 6, 2007

२४०१ अप - पटना - नई दिल्ली मगध एक्सप्रेस - 2


ट्रेन दिल्ली के ओर चल चुकी थी।
मेरा बर्थ साइड लोअर था और ठीक उपर वाला कुणाल का। अधिकतर को-पसेंजर लोकल ही थे। दानापुर, आरा या बक्सर में उतरने वाले, जिनके लिए एक्सप्रेस, मेल, लोकल सब बराबर। प्लेटफार्म पर सामने जो बोगी नज़र आ गई, हो गए उसी में सवार। अगर किसी नें सीट देने में आनाकानी की उसकी सामूहिक धुलाई सौ फ़ीसदी गारंटी। इस बात की हमें जानकारी थी, इसलिए रिस्क नहीं लिया, सम्मानित ढ़ंग से एडजस्ट कर लिया गया। कल तक मैं भी तो लोकल पसेंजर ही था न ! तभी कुणाल नें धीरे से बोला, चिंता मत करो, भीड़ एक-दो स्टेशन के बाद कम हो जाएगी। और हाँ सामने वाला दोनों बर्थ लड़कियों का है। मेरे चेहरे पर अविश्वास का भाव देखते ही झट पाकेट से एक कागज़ निकाल कर मेरे हाथों में थमा दिया। पढ़ लो बेटा...। कागज़ खोलकर देखा तो उसमें लिखा था "रूबी कुमारी, F - 19 और निशा सिंह, F-21, बोर्डिग फ्राम बक्सर"। फिर कुणाल नें बताया कि रिज़र्वेशन चार्ट वो स्टेशन से ही फार लाया था। मैं कुणाल का चेहरा मंत्रमुग्ध भाव से देखने लगा। लगा कि आगे..... बहुत आगे जाएगा लाईफ़ में। लड़के में पोटेंशियल है...।

शाम गहराने लगा था और हर स्टेशन के साथ भीड़ भी कम होती चली गई। बक्सर आया और दो लड़कियाँ सचमुच प्रकट हुईं। लड़कियों को देखते ही कुणाल के अंदर कुछ ज्यादा ही फुर्ती का संचार हो गया। ऐसा नहीं था कि मुझे कन्याओं का को-पसेंजर होने की खुशी नहीं थी। थी..... लेकिन रिएक्शन कुछ संतुलित दिया गया। मतलब ऐसा दिखाने का प्रयास किया गया कि आप हैं तो हैं, मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। लड़कियाँ अपने-अपने जगह पर बैठ गईं थी। गाड़ी बक्सर से खुल गई। कंपार्टमेंट में बिल्कुल शांति, सिर्फ रेलगाड़ी की धड़धड़ाती आवाज़। तभी कुणाल की आवाज़ गुंजी.."ह्वेयर इज़ द मैग्ज़ीन"। अचानक कुणाल के इस ख़ालिश अंग्रेज़ी ने मुझे अंदर तक हिला दिया। अरे कोई चमत्कार हुआ क्या? कल तक अंग्रेज़ी से दुबक कर भागने वाले इस लड़के में एकाएक शेक्सपियर की आत्मा कहाँ से घुस गई। इससे पहले कि मैं रिएक्ट करता कुणाल ने आँख मार दिया। मैं भी समझ गया कि लड़का जुगाड़ में लगा है। ट्रेन में ही जीवन की रेलगाड़ी में आनंद की संभावना तालाश रहा है। चुप रहा, बोलता भी क्या? थोड़ी देर बाद ही कुणाल ने अपना वाक मैन बाहर निकाला लिया। कान में ईयर फ़ोन लगाया और झूमने लगा, बीच-बीच में किसी अंग्रेज़ी गाने का टूटा-फूटा शब्द भी बाहर निकाल रहा था। मुझे नींद आ रही थी और घर की याद भी। इस बीच पता नहीं लगा कि नींद ने कब मुझे आगोश में ले लिया।

एक-डेढ़ घंटे बाद मुसाफ़िरों का शोर सुनकर आँख खुली, पता लगा कि मुगलसराय स्टेशन आ गया है। अगल-बगल नज़र घुमाई तो कुणाल का कोई पता नहीं था। सोचा शायद सिगरेट धूकने प्लेटफार्म पर उतरा होगा। थोड़ा गुस्सा भी आया। कितना लापरवाह लड़का है! कोई सामान उठा ले जाता तो! खिड़की से नज़र ईधर-उधर दौड़ाई लेकिन उसका कहीं पता नहीं था। खैर, थोड़ी ही देर में कुणाल दोनों हाथों में पेप्सी का केन लेकर प्रकट हुआ। इस फ़िजूलखर्ची के बाबत पूछने पर बोला, दिल्ली जा रहे हो, कैट बनने का तैयारी शुरू कर दो। ऐसे काम नहीं चलेगा, अपने देशी संस्करण को इंटरनेशनल बनाओ। "हम" को "मैं" और "तुम" को "तू" बोलो। कहने का मतलब है "इन्डिविडुअलिस्ट" बनो। थोड़ी देर में पता यह भी लग गया कि अब तक भाई साहब ने दोनों लड़कियों से दोस्ती गाँठ ली थी। मैगज़ीन एक्सचेंज हो रहे थे। मेरा इंडिया टुडे, सामने बैठी मोहतरमा का ज्ञान वर्धन कर रहा था। और इधर कुणाल डैन ब्राउन के अंग्रेज़ी जासूसी उपन्यास में खोया था। अब अंग्रेजी उपन्यास उसे कितना समझ में आ रहा था ये बात या तो उसे पता थी या उपर भगवान को। लेकिन ज़नाब लगे हुए थे तन्मयता से। माहौल के गर्माहट को मैं भांप गया था और ऐसे समय में चुप रहना ही मुनासिब था और यही किया। दिल तो मेरा भी उन अप्सराओं से संवाद स्थापित करने का कर रहा था लेकिन कांफिडेंस जवाब दे जाता था। कुछ देर बाद ही पैन्ट्री वाला प्रकट हुआ। लोग खाने का आर्डर देने लगे। कुणाल ने भी धड़धड़ाते हुए आर्डर दे दिया। मैंने कहा घर से माँ ने पूरी-भुजिया और मिठाई पैक कर के दिया है। क्यों नाहक पैसा बरबाद कर रहे हो। लेकिन आर्डर दिया जा चुका था। तभी एक सज्जन मेरे बर्थ पर बचे थोड़े से जगह में बैठ गए। पूछने पर बताया कि रिजर्वेशन कंफ़र्म नहीं हो पाया इसलिए बर्थ नहीं मिल पाया। बातें शुरु हो गईं। पूछने पर ज्ञात हुआ कि बेटे से मिलने दिल्ली जा रहे हैं। कुछ ज्यादा ही बातूनी थे। मेरे संबंध में फुल इनक्वायरी करने के बाद एकाएक पूछ बैठे कि "भाई साहब, इस गाड़ी में कितनी बोगी हैं?" मैंने कहा "होगा कोई बीस-पच्चीस के बीच कुछ भी"। फिर उन्होंने पूछा "हरेक बोगी में कितने लोग सफ़र कर रहे होंगे"? मैंने कहा 'स्लीपर क्लास में 72 बर्थ होता है और इसके अलावा कुछ आप जैसे लोग जिनका टिकट कंफर्म नहीं हो पाता है"। अगला सवाल था कि "गाड़ी पटना और दिल्ली के बीच कितनी बिजली कंज्युम करती होगी"? उनके इन बे सिर पैर के सवालों से मैं चिढ़ सा गया। लेकिन कुछ ज़वाब नहीं सूझ रहा था इसलिए चुप रहा। सवाल-जवाब के इस अंधाधुंध सेशन के बाद भाई साहब कागज़ पर कुछ जोड़-घटाव करने लगे। फिर थोड़ी देर में ही गाड़ी के अर्थशास्त्र का पूरा चिट्ठा सामने रख दिया। उनके कैलकुलेशन के सटीकता को मान लिया जाए तो गाड़ी एक चक्कर में 3-4 लाख के बीच कमाई कर लेती है। करंट का झटका लगा। लगा आदमी ग़लत जगह पर है। इसे तो सरकार का वित्तिय सलाहकार होना चाहिए था। उत्सुकता भी जगी। पूछा कि आप पटना में क्या करते हैं? बतया कि पटना नहीं मुज़फ्फरपुर में रहते हैं। और दो-तीन बस और दो-चार टैक्सी के मालिक हैं। थोड़ी देर में टीटीई आया और भाई साहब ने सौ-पचास देकर बर्थ का जुगाड़ कर लिया। पैंट्री से खाना आ चुका था। खाने के बाद घर से लायी गयी मिठाई खाई गई। खिड़की से आ रही ठण्डी हवा के झोंके अपने साथ नींद भी लेकर आए। अपने बाहों को तकिया बनाकर सो गया। कुणाल देर रात तक लड़कियों से बतियाता रहा।

सुबह नींद खुली तो साढ़े पांच बज रहे थे। गाड़ी अलीगढ़ से आगे निकल आई थी। लड़कियाँ अभी भी सो रही थीं। गौर से देखने पर एक के कानों में कुणाल का इयर फ़ोन भी नज़र आया। खिड़की से बाहर झाँका तो बिहार जैसी हरियाली गायब थी। ज़मीन में नमी की कमी स्पष्ट दिख रही थी। खेतों के मेढ़ों पर से आम के पेड़ भी गायब थे। हाँ खेतो का जोत हमारे यहाँ से थोड़ा बड़ा जरूर था। हरेक चार-पाँच किलोमीटर पर चिमनियों से निकलता काला धुंआ क्षेत्र के औद्योगिक विकास की कहानी भी बयाँ कर रहे थे। हाँ हवा में शीतलता थोड़ी कम थी। गाड़ी दिल्ली पहुँचने वाली थी। तीस-चालीस किलोमीटर रह गए होंगे। खेत आँखों से धीर-धीरे ओझल हो रहे थे। और उनकी जगह छोटे-छोटे घर और और नई बसी कोलनियों ने ले लिया था। कुछ घर रेलवे लाईन से बिल्कुल सटे हुए थे। इन घरों के दीवारों पर तरह-तरह के प्रचार भी लिखे हुए थे। इनमें से अधिकतर सी ग्रेड के प्रोडक्ट और सर्विसेज का ही एडवर्टीजमेंट था। मसलन - नि: संतान दंपत्ति मिलें, ख़ानदानी शफाखाना, यौन रोगों से मुक्ति के उपाय, काला जादु को बेअसर करने के नुस्ख़े, भूत भगाओ बाबा, वशीभूत करने वाला मंत्र आदि आदि। सोचने लगा। कंपनियाँ प्रचार वहीं करती हैं जहाँ उनके प्रोडक्ट का मार्केट हो। लगा कहीं दिल्ली नपुंसकों और अंधविश्वासियों का शहर तो नहीं? गाड़ी गाज़ियाबाद क्रास कर रही थी। लोग भी उतरने की तैयारी करने लगे थे। कुणाल लड़कियों से एड्रेस और फ़ोन नंबर एक्सचेंज करनें में व्यस्त था।

जूते पहन कर मैं भी गाड़ी के गेट पर खड़ा हो गया था। बड़ी-बड़ी ईमारतें नज़र आने लगी थी। यमुना पार करते ही इंद्रप्रस्थ पावर प्लांट, फिर प्रगति मैदान, तिलक ब्रिज़ और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन। मगध एक्सप्रेस बारह नंबर प्लेटफार्म पर पहुँच चुकी थी। ठीक उसी वक्त तमिलनाडु एक्सप्रेस भी ग्यारह नंबर पर पहूँची। सारे कुली उधर ही चले गए। लोगों ने बताया कि बिहार से आने या जाने वाली गाड़ियों में कुली भी इंटरेस्ट नहीं लेते हैं। इन गाड़ियों से कमाई न के बराबर होती है। बिहारी भारी से भारी सामान बाप-बेटे मिलकर स्वयं ढ़ो लेते हैं। राज्य के गरीबी से शायद दिल्ली के कुली भी वाकिफ़ थे।
क्रमश: