Friday, September 7, 2007

हमारा बजाज


हमारा बजाज

ऑफ़िस में अख़बारों के पन्नों पर नज़र दौड़ा रहा था। तभी एक ख़बर नें ध्यान खींच लिया। ख़बर थी की बजाज आँटो ने अपने अकुर्दी स्थित स्कूटर प्लांट बंद करने का निर्णय लिया। मसला चौकाने वाला था। नब्बे के दशक या उसके बाद पैदा हुए लोगों के लिए इस ख़बर का कोई विशेष अहमियत नहीं हो सकता है। लेकिन मेरे या मेरे जैसे और लोग, जो नब्बे के दशक से पहले पैदा हुए थे उनके लिए ख़बर महत्वपुर्ण थी। किसी ज़माने में भारतीय मध्यवर्ग के आकांक्षाओं का आईना बजाज स्कूटर धीरे-धीरे सड़कों से गायब हो जाएगा। बड़े शहरों मे यह पहले ही लुप्तप्राय हो गया है। फैक्ट्री बंद होने पर छोटे शहरों या कस्बों में भी इसके दर्शन दुर्लभ हो जाएंगे। कभी-कभी विंटेज गाड़ियों के प्रदर्शनी में लेंब्रेटा या विजय सुपर के साथ खड़ा मिलेगा। नास्टेलजिक हो गया।

अभी कुछ दिन पहले ही तो बजाज हमारे घर आया था। दूसरी क्लास में था। स्कूल में छुट्टी के बाद गेट पर खड़ा पिताजी का इंतज़ार कर रहा था। उन्हीं के साथ रिक्शे से घर जाता था। उस दिन पिताजी तो नहीं आए, हाँ अपने स्टाफ को जरूर भेज दिया। रास्ते में रिक्शे पर स्टाफ ने बताया कि आज भर रिक्शा पर चढ़ लीजिए। कल से तो स्कूटर से टनटनाते हुए स्कूल आईएगा। आपके पापा स्कूटर लाने गए हैं। इसलिए हमको भेज दिया। पाँच महीनों के इंतज़ार के बाद नंबर आया है। उत्सुकता बढ़ गई और लगा दी सवालों की झड़ी। पूछा॥कौन से रंग का आएगा? कितने पैसे में पापा ख़रीदेंगे? लाल रंग अच्छा रहेगा न? हरा भी बढ़िया है। नही...आगे का आधा लाल और पीछे का हरा। आईना तो रहेगा न गाड़ी में? स्टाफ बोला "बाबू, इतना तो पता नहीं, थोड़ा सब्र कर लीजिए। शाम तक तो पता चल ही जाएगा"। रिक्शे पर ही स्कूटर के ख्वाब आने लगे। कभी आगे खड़ा हो कर मैदान में चक्कर लगा रहा था। तो कभी माँ-पिताजी के साथ मौसी के यहाँ जा रहा था। सोचते-सोचते कब घर आ गया पता ही नहीं चला। घर पर पड़ोस की सिन्हा आंटी पहले से मौजूद थीं। माँ छत पर कपड़े लाने या कह सकते हैं पिताजी को स्कूटर चलाते हुए देखने गई थीं। आंटी ने पूछा। आ गए बेटा। फिर माँ को आवाज़ दिया "सुनती हैं....बेटा स्कूल से आ गया है"। माँ नीचे आ गई। बदलने को कपड़े दिए। कपड़े बदले, बैट उठाया और पहुँच गया फिल्ड में।

दोस्त पहले से इंतज़ार कर रहे थे। इंतज़ार करना उनकी मज़बूरी भी थी। क्योंकि बैट सिर्फ मेरे पास ही था। विकेट ठोके गए। टीम बाँट लिया गया। और दस-दस ओवर का मैच शुरू। खेल में मन लग नहीं रहा था। बरबस आँखें घर के गेट पर जा कर टिक जाती था। फिल्डिंग की बारी आई तो मुकर गया। दोस्तों नें विरोध किया। कहा बेईमानी है। कह दिया कि आज के बदले कल फिल्डिंग कर दूंगा। आज पापा स्कूटर लाएँगे। एक ने पूछा, मोलाने गए हैं कि ख़रीदने गए हैं? कहा....नगद ख़रीदने। विकेट उखाड़ दिए गए। दोस्तों के साथ घर से कुछ ही दूरी पर स्थित कैंपस के मेन गेट पर खड़ा हो गया। सुर्यास्त होने ही वाला था। तभी पिताजी नज़र आए। गहरे नीले रंग के स्कूटर पर। थोड़ी निराशा हुई। पिताजी पीछे बैठे थे। स्कूटर कोई और चला रहा था। मुझे और दो दोस्तों को किसी तरह से आगे-पीछे बिठाकर एडजस्ट कर लिया गया। जो बच गए वो स्कूटर के पीछे मैराथन करने लगे। घर के सामने स्कूटर के रुकते ही दौड़ कर माँ को ख़बर कर आया। पड़ोसी भी गेट पर आ गए थे । माँ थाली में फूल, अक्षत, सिंदुर, अगरबत्ती लेकर बाहर आई। बाहर आते ही पड़ोस की चाची को आवाज़ दी । जल्दी आइये, गाड़ी आ गया है । वो भागती हुई आईं । वो भी बहुत खुश । जैसे उनके घर में ही स्कूटर आया है। गाड़ी की विधिवत पूजा की गई। आगे सिंदुर के पाँच टीके लगाए गए। स्कूटर नें मुहल्ले में हमारी हैसियत भी बढ़ा दी थी। स्कूटर के साप्ताहिक झाड़-पोछ का काम मुझे दिया गया। दसवीं तक पिताजी रोज़ स्कूटर से स्कूल छोड़ने जाते थे।


समय बीता। फिर काँलेज जाते वक्त मैं पिताजी को स्कूटर से आँफ़िस छोड़ने लगा। आज घर में चार चक्के वाली गाड़ी है। बीच में गाड़ियाँ आईं और गईं। समय और पटना की सड़कों ने बजाज को जर्जर ज़रूर बना दिया। लेकिन "हमारा बजाज" आज भी "बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर" पेश कर रहा है।

8 comments:

Sudhir said...

बढ़िया है दोस्त...बजाज मेरे घर भी आया था. स्कूटर का जगह बाईक ने या कार ने ले लिया है। फिर बजाज का सड़को से गायब होना हमारे विकास का बानगी भी तो है.....

Sarika said...

Even we had a Bajaj scooter. Your story made me nostalgic. I left India seven year back but still my heart lays there in Delhi. There are many things that were part of life of an ordinary Indian middle class family. Do write about them too. Best of luck.

Kanishka said...

पुणे के पास अकूर्दी में बजाज ऑटो लिमिटेड के प्लांट को बंद हुए हफ्ते भर बीत चुके हैं। इस प्लांट में काम करने वाले 2700 से ज्यादा कर्मचारियों का भविष्य अधर में लटक गया है। केंद्रीय कृषि मंत्री और इस क्षेत्र के सांसद शरद पवार भी इस संबंध मे कुछ नहीं कर रहे हैं।

sushant jha said...

Lage raho munna...scooter toh chali gayi..ab blog likh ke ladkiyaon ko impress kar rhe ho...yaar dil mein blog padh ke goddy gooddy hone lagi hai!

jagat said...

कोई मुगालता नहीं बजाज पुराना हुआ लेकिन भारत का बुलंद बनाने में अपना योगदान कर गया. राजीव जी, आपकी लेखनी में जो प्रवाह है वो शायद आपके जिद और जूनून का असर है. निरंतरता बनी रहे ताकि साहित्य को अपना योगदान आप हमेशा करते रहें एवं मेरे जैसे नए पाठक इससे लाभान्वित होते रहें. यथेष्ट शुभकामनाओं के साथ.....

Shaghil said...

Bjaj itihaas ka ek panna ban kar reh jayega, sunkar thoda afsoos to mujhe bhi hua. Dar asal 80's main jab globalisation ka daur nahi tha to hamare pas har product ke bahut thode se options the.Jo the, unhe visualise/idealize karte hue hi hum bade hue. Jaise, Car-Maruti, toothpaste-colgate, soap-lifebuoy ya Lux, wsahing powder-Nirma ya Surf, ideal-father ya mother, Ladki-Parivarik; Vichar-Sansarik
Jab bhi inme se kisi bhi subject par baat hoti thi, to sabse pehle dil main inhi options ka khayaal aata. Isi wajah se hamein in bejan/jandaar cheezon se bhi beinteha masuum aur dili muhabbat paida ho gayi. Bajaaj bhi usi muhabbat ka ek hissa tha.
Globallisation badha aur options bhi badte gaye. Har cheez ki verities ki bheedh mach gayi. Bheedh bad gayi to muhabbat bhi confuse hokar hazar khano main bat gayi. Bazaar main naye products aaye, aur acche bhi lage. Lekin unmein woh Bajaj wali muhabbat ki maasuumiyat kahan thi. Nayi cheezon se hamne muhabbat to ki magar fasla bhi rakha. Jaise ke muhabbat to mujhe kai baar hui, lekin har baar nai ladki se muhabbat karne mein woh pehle iqraar ki masuumiyat kahan rahi.
Bajaj, scooter ke taur par hamara pehla pyaar tha, jo waqt ke sath pheeka to pad jayega, magar purane dino ko yaad karte hi hamari saansoon main kafuur ki tarah ek dum phel jayega. Isi ummed ke saath Bajaj par likhi is tribute ko main do sheroon ke saath khatm karta huun
1.Wapsi ke irade se ja raha huun magar
Safar, safar hai, mera intezar mat karna
2.Ghar mera uunchi emaartoon se ghir gaya
Kuch log mere hisse ka suuraj bhi kha gaye
Bjaj itihaas ka ek panna ban kar reh jayega, sunkar thoda afsoos to mujhe bhi hua. Dar asal 80's main jab globalisation ka daur nahi tha to hamare pas har product ke bahut thode se options the.Jo the, unhe visualise/idealize karte hue hi hum bade hue. Jaise, Car-Maruti, toothpaste-colgate, soap-lifebuoy ya Lux, wsahing powder-Nirma ya Surf, ideal-father ya mother, Ladki-Parivarik; Vichar-Sansarik
Jab bhi inme se kisi bhi subject par baat hoti thi, to sabse pehle dil main inhi options ka khayaal aata. Isi wajah se hamein in bejan/jandaar cheezon se bhi beinteha masuum aur dili muhabbat paida ho gayi. Bajaaj bhi usi muhabbat ka ek hissa tha.
Globallisation badha aur options bhi badte gaye. Har cheez ki verities ki bheedh mach gayi. Bheedh bad gayi to muhabbat bhi confuse hokar hazar khano main bat gayi. Bazaar main naye products aaye, aur acche bhi lage. Lekin unmein woh Bajaj wali muhabbat ki maasuumiyat kahan thi. Nayi cheezon se hamne muhabbat to ki magar fasla bhi rakha. Jaise ke muhabbat to mujhe kai baar hui, lekin har baar nai ladki se muhabbat karne mein woh pehle iqraar ki masuumiyat kahan rahi.
Bajaj, scooter ke taur par hamara pehla pyaar tha, jo waqt ke sath pheeka to pad jayega, magar purane dino ko yaad karte hi hamari saansoon main kafuur ki tarah ek dum phel jayega. Isi ummed ke saath Bajaj par likhi is tribute ko main do sheroon ke saath khatm karta huun
1.Wapsi ke irade se ja raha huun magar
Safar, safar hai, mera intezar mat karna
2.Ghar mera uunchi emaartoon se ghir gaya
Kuch log mere hisse ka suuraj bhi kha gaye

nishant said...

I dont know to type in Hindi ..but as someone says it correctly--Bhasha ke liye koi deewar nahin hoti.
Apke blog ko padh kar bahut he anand aya .Main to asmanjas mein tha ki kis par comment likhoon mujhe sare ke sare achhe lage but Hamara Bajaj was the best among them.
Aap apna ye prayas jari rakhiye hamari subhkamnayein aapke saath hain.

nishant said...

I m from an advertising background,and had been through a lot of case study about Bajaj and how it aspire the dream of the then Middle class.Even in our creative classes we have been taught to create a Tagline which goes insync with the consumers mind.........but never had I realised that the Brand bajaj is so much eponymous to the growing middle class which even after such a long duration remembers it with reverence and respect.
Rajeev u really did a commendable work,the way u have put emotion ,societal binding and thinking of typical Indian family-----pillion for wife and kid, front space for another kid, basket for daily groceries.
But one important thing u missed in the whole story was that, it was the only scooter which starts when tilted , in fact this phenomnon is used by most of the scooters across India even though it hardly have eny effect------- this is the Bajaj effect which not only changed the Man but machine too.