Thursday, February 14, 2008

क्या यही प्यार है....!

बहुत बार सोचता हूं कि आख़िर क्या है प्यार, ये कैसे और क्यों होता है? क्या प्यार आनन फ़ानन में होता है या फिर होते-होते होता है। इन सवालों के जवाब वैज्ञानिकों ने अपने तरह से हारमोन के केमिकल कंपोजीशन को तोड़-मरोड़ कर पेश किया, तो वहीं मनोविज्ञान ने इसकी व्याख्या अंतरंगता, समर्पण, आवेश आदि शब्दों से करना चाहा। लेकिन सच तो यह है कि प्यार को डिफ़ाईन करना इश्वर को प्राप्त कर लेने के समान है। प्यार का परफेक्ट डिफिनेशन हो ही नहीं सकता, जैसे इश्वर का! एक डिफिनेशन देंगे तो सौ एक्सेप्शन सामने आ जाएंगे। ये विश्लेषणात्मक दर्शन और गहन मनोविज्ञान का मिश्रण है जिसे सुलझाने में आप ख़ुद ही उलझ जाएंगे। समय के सापेक्ष भी प्यार का डिफिनेशन बदल रहा है। दादा जी जिसे प्यार समझ बैठते होंगे वो हमारे लिए आकर्षण से ज्यादा शायद ही कुछ और हो। आने वाला जेनरेशन भी शायद ही हमारे प्यार के डिफिनेशन से इत्तेफ़ाक रखे। इसलिए प्यार पर बहस और रिसर्च दोनों युग-युगान्तर तक चलेंगी। ख़ैर, मेरा मकसद भी इस बहस में पड़ने का कतई नहीं है। लेकिन प्यार के कितने वेराईटीज़ हो सकते हैं यह बात हिंदी सिनेमा से बढ़िया और कहाँ दिख सकता है।

क्या प्यार होने के लिए एक दूसरे को समझने-बूझने का मौक़ा भी चाहिए या यह यूँ ही हो जाने वाला फेनोमेना है। क्या प्रेमियों को एक-दूसरे की कमियों या कमज़ोरियों को भी जानने की ज़रूरत होती है, या उनमें सब कुछ अच्छा ही होता है, जैसा कि फ़िल्म 'सलाम नमस्ते' में देखने को मिलता है।

1971 में बनी 'अमर प्रेम' को याद कीजिए। फ़िल्म में नायक को एक ऐसी स्त्री से प्यार हो गया जो वेश्यावृत्ति करती थी। क्या प्यार सांसारिक बंधनों से सचमुच मुक्त है। समाजिक मान्यताओं से इतर क्या कोई प्रेमी यह कहने की हिम्मत रखता है कि 'कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना....'?

1955 की फ़िल्म 'श्री 420' में राज कपूर - नर्गिस की बरसाती रात में छतरी वाला सीन याद है न। किसी ज़माने में यह तस्वीर प्यार करने वाले जवां दिलों की आदर्श थी। हरेक प्रेमी युगल अपना अक्स राज और नर्गिस में ख़ोज़ लेता था। क्या 2008 में प्रेम करने वाले अपनी परछाई इस तसवीर में देख पाएंगे।

फिल्म 'डर' में राहुल (शाहरुख ख़ान) के एकतरफा प्यार को क्या नाम दिया जाए। लोग कहते हैं उस प्यार में समर्पण की भावना तो कहीं नहीं था......वह प्यार तो बेहद स्वार्थी था! राहुल अपने प्यार को पाने के लिए कुछ भी कर सकता था। मानना था कि प्यार में क्या ज़ायज़ और क्या नाज़ायज। एवरीथिंग इज़ फेयर इन लव एंड वार। अपने प्यार को पाने की सनक कुछ ऐसी की अंत में उसे अपने जान से ही हाथ धोना पड़ता है। मौत भी प्यार के लिए। तो क्या उसे प्यार के श्रेणी में नहीं रखा जा सकता? राहुल की अपनी एक दुनिया थी, जो सिर्फ उसकी और उसके प्यार की थी। उसमें किसी अजनबी को दाख़िल होने का हक़ नहीं था। क्या डर का नायक अपनी जगह ग़लत था। प्यार करना ग़लत हो सकता है क्या? अब नायिका उसे नहीं चाहती थी तो इसमें उसका क्या कसूर था? और अपने प्यार को पाने के लिए किसी भी हद से गुज़र जाना ही तो प्यार की कसौटी है। हाँ, उसे पाने के तरीके पर सवाल तो उठाया जा सकता है लेकिन इरादे तो बिल्कुल पाक थे। इसलिए मर कर भी वह प्यार करने वालों के लिए एक नया पैमाना तय कर गया। कह सकते हैं हार कर भी वह जीत गया। फ़िल्म अंजाम के विजय और पूजा की कहानी भी कुछ-कुछ ऐसी ही थी।

'कभी-कभी' में अमित और पूजा की कुर्बानी तो याद है न। "हम अपने माँ बाप की इच्छाओं को कुचलकर अपने सपनों का महल खड़ा नहीं कर सकते" कहकर दो प्रेमी दूर हो गए थे, अलग-अलग शादियाँ रचा लीं। इससे क्या प्यार ख़त्म हो गया? या और बढ़ गया।

फ़िल्म 'सिलसिला' को अमिताभ बच्चन, जया बच्चन और रेखा की निजी ज़िंदगी में उन दिनों चल रहे जज़्बातों से मेल खाने के लिए भी जाना जाता है। फिल्म की कहानी ने तो प्यार पर एक तरह से बहस ही छेड़ दी थी। कहाँ तक जायज़ हैं विवाहेतर संबंध? पत्नी घर में है और प्रेमिका के साथ 'तुम होतीं तो ऐसा होता, तुम होतीं तो वैसा होता' आख़िर क्या जताना चाहता था। लेकिन था तो यह भी प्यार ही ना।

1991 में बनी फ़िल्म 'लम्हे' की विवादित प्रेम कहानी में कहाँ तक व्यवहारिकता थी। फ़िल्म में नायिका को अपनी माँ के प्रेमी से ही प्यार हो जाता है। हद तो यह कि नायक एक तरह से उसके पिता की भूमिका निभा रहा था। ऐसे शख़्स से प्यार को कहाँ तक जायज़ ठहराया जा सकता है। क्या यह महज फिल्मी रोमांस था या फिर फ्रॉयड के सिद्धांत का एक अनुठा उदाहरण?

फ़िल्म 'हम दिल दे चुके सनम' के प्यार को आप क्या नाम देंगे। प्यार किसी से और शादी किसी दूसरे से। पुराने प्यार को भुलाने की लाख कोशिशों के बावजूद वह रह-रह कर आँखों के सामने आ जाता है। और पति की महानता देखिए कि उसने पत्नी को उसके पुराने प्रेमी के लिए मुक्त कर दिया। लेकिन तब तक प्रेमिका का प्यार फिर से बदल जाता है। तो क्या प्यार एक क्षणिक फेनोमेना है....जो समय और व्यक्ति के साथ बदलता रहता है? अधिकतर तो ऐसा होता है कि किसी को प्यार हो गया लेकिन उसे प्यार को स्वीकारने में मुद्दत गुज़र जाता है।

गुरूदत्त की 'साहब, बीबी और गुलाम' अपनी पूर्णता में कालजयी है। एक तरह का प्यार फिल्म में छोटी बहु का भी है। यातना की हद तक उपेक्षा। पति को सुधारने के चक्कर में खुद ही नशे के गिरफ्त में आ जाना। फिर भी सब कुछ सहते जाना। क्या सब कुछ सहते जाने का नाम भी प्यार ही है.........?????

2 comments:

Shreya said...

कुछ फिल्मों को शायद आप भूल गए. क़यामत से क़यामत तक, मैंने प्यार किया.....हलांकि इनकी कहानी असाधारण नहीं थी, लेकिन जब भी प्यार पर आधारित फिल्मों की बात आएगी तो इनका नाम जरूर आएगा.

Sandeep Jain said...

'मोहब्बत है क्या च़ीज हमको बताओ, ये किसने शुरू की हमें भी बताओ'....शानदार लेख है। हलांकि कुछ नाम और भी जोड़े जा सकने की गुंजाईश है।