Wednesday, March 12, 2008

वो जानी पहचानी अजनबी

उसे पहली बार कब देखा था, याद नहीं। हाँ, ये अच्छी तरह याद है कि वो मुझ से एक क्लास जूनियर थी। उसका नाम क्या था...याद है....नहीं भी। हम दोनों एक ही स्कूल में थे। वो मुझे अच्छी क्यों लगती थी, इसका भी जवाब आज तक नहीं ढ़ूढ़ पाया। गोरा रंग, गोल चेहरा, बड़ी-बड़ी बेक़रार आँखें, सफ़ेद रीबन में करीने से गूंथे हुए काले लंबे बाल, पतले गुलाबी होंठ और उन होठों पर हज़ारों मोनालिज़ा की मुस्कुराहटें। मैं आठवीं कक्षा में था और वह सातवीं में। वह गुजराती थी। उसके पिताजी दवा के बड़े व्यापारी थे। जामनगर से पटना आए और फिर वहीं के होकर रह गए। उसका घर स्कूल के क़रीब ही था। वो मुझे अच्छी लगती थी। उस अच्छे लगने को प्यार तो हरगिज़ नहीं कहा जा सकता था। अच्छी लगती थी बस। वो अच्छा लगना तर्कों के बंधनों से एकदम मुक्त था। स्कूल में उसे दिन में तीन बार देख पाता था। सुबह जब वो बैग लटकाए पापा के पीछे-पीछे स्कूल आती थी। लंच में जब वो हाथ धोने बाहर आती थी। और छुट्टी के वक्त जब वो गेट पर पापा का इंतज़ार करती....। सिर्फ़ उसकी एक झलक के लिए, मैं स्कूल पहले आ जाता और उसके चले जाने के बाद ही घर की ओर रुख करता था। उसे देख कर दिल को एक अज़ीब सा सुकून मिलता। उस वक्त के सपने भी अजीब थे। सोचता रहता था कि वो तैयार हो जाए तो साथ में सर्कस देखने जाएं, क्रिकेट खेलें, गोलगप्पे खाएं, तितलियां पकड़ें, गंगाजी में नहाएं और भी कई अच्छी-अच्छी बातें।

यह सिलसिला साल भर यूं ही बदस्तूर जारी रहा। फिर हम दोनों एक-एक क्लास ऊपर आ गए। स्कूल में नौवीं के बच्चों को मानिटरिंग करने जूनियर क्लासों में भेजा जाता था। यह सौभाग्य दसवीं के बच्चों को बोर्ड परीक्षा नज़दीक होने के चलते नहीं मिला था। रोज़ भगवान से यही मांगता कि काश, आज उसके क्लास में मानिटरिंग मिल जाए। कभी-कभी मिल भी जाता था। उसे मैं कैसा लगता था, इसका रहस्य भी बना ही रहा। लेकिन ये तो तय था कि उसके क्लास में मेरा जाना उसे पसंद था। यह अलग बात थी कि मेरे सामने वो नर्वस हो जाती थी और अंट-संट हरकतें करने लगती। ग़लती या जानबूझ कर आँखें मिल गईं तो वह शर्म से लाल हो जाती। घबड़ाहट तो मुझे भी होती, लेकिन उसे पता नहीं चल पाया होगा।... या वो सब समझती होगी, कह नहीं सकता। धीरे-धीरे उसके पड़ोस में रहने वाले एक लड़के से दोस्ती हो गई। स्कूल से घर पहुंचते ही जल्दी से कपड़े बदल कर साईकिल उठाता और उस नए दोस्त के घर पहुंच जाता। फिर उस लड़की के घर के सामने वाले मैदान में क्रिकेट जम जाता। वो भी अपनी खिड़की से पर्दा हटाकर देखती रहती। पिताजी रोज़ डांटते कि घर के सामने इतना बड़ा मैदान है फिर भी गोविंद मित्रा रोड क्यों जाते हो? लेकिन उस डांट के असर को उस लड़की का ख़्याल अक्सर बेअसर करता रहा। उसके पापा मुझे आवारा समझते होंगे, शायद इसीलिए मुझे देखते ही वो उसे बिना किसी कारण के जोर-जोर से डांटने लगते। यह बात मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी। उसके पापा घर में हैं या नहीं ये मुझे खिड़की के पर्दे से ही पता चल जाता। अगर पर्दा हटा हुआ है तो इसका मतलब वो दुकान में हैं। और पर्दा बंद होना उनके घर में मौजूदगी को बयां कर देता। अक्सर सोचता कि आज उससे बात कर ही लूंगा, जो होगा देख लिया जाएगा। लेकिन उसके सामने आते ही सब कुछ शून्य हो जाता। गला रूंध जाता, दिमाग साथ छोड़ने लगता और दिल की धड़कनें अपनी पूरी रफ्तार से चलने लगतीं। फिर सोचता कि अभी नहीं, मैट्रिक पास हो जाने के बाद उससे बात करूंगा।


समय तेज़ी से बीतता चला गया। बोर्ड परीक्षाएं नज़दीक आ गईं। स्कूल जाना बंद हो गया। पढ़ते-लिखते दिन में वो दो-तीन बार ज़रूर याद आती। लेकिन अच्छे नंबर पाने की धुन में क़िताबों से फुरसत ही नहीं मिलती। परीक्षा के बाद दोस्तों के साथ दिल्ली घूमने आ गया। फिर लखनऊ, इलाहाबाद करते-करते दो महीने बीत गए। इस बीच परीक्षा के परिणाम भी आ गए। राज्य के सबसे अच्छे कॉलेज में एडमीशन मिल गया। साईकिल की जगह स्कूटर ने ले ली। उसके मुहल्ले में सप्ताह में दो-तीन दिन जाता। लेकिन वो नहीं दिखती थी। दोस्त ने बताया कि शायद बोर्ड परीक्षा की तैयारी में व्यस्त हो। बाद में पता चला कि वो प्लस टू करने अपने मामा के पास अहमदाबाद चली गई है। मैं भी अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गया। साल, दो साल करते हुए पाँच साल बीत गए। मैं ग्रेजुएट हो गया।



2004 में मेरा एडमीशन दिल्ली स्थित भारतीय जन संचार संस्थान में हो गया। एडमिशन से पहले अपना कुछ सर्टिफिकेट लेने स्कूल जाना पड़ा। वो भी किसी काम से आई थी। छह साल बाद हम फिर मिले थे। उसे देख कर बेइंतहा खुशी हुई थी। हिम्मत करके उसे हाय कहा। उसने भी मुस्कुरा कर हाथ हिलाया था। बहुत सुंदर दिख रही थी। मैंने उसे बताया कि दिल्ली जा रहा हूं। पता नहीं क्यों, यह सुन कर वो उदास हो गई थी। स्कूल का काम निपटाने के बाद हम दोनों साथ-साथ गेट तक आए थे। हम दोनों ने ई-मेल भी एक्सचेंज किया था। हम दोनों ग़मगीन थे। उसने रुख़्सत होने के बहाने अपना हाथ मेरे हाथों में दे दिया था। और मेरी आँखों में इस तरह आँखें डालकर देखा कि मेरे दिल में कोई शको-सुबहा ब़ाकी नहीं रह गया। दिल्ली से साल भर बाद पटना गया तो दोस्तों ने बताया कि उसके पिताजी की मृत्यु हो गई है और वह पूरे परिवार के साथ वापस जामनगर चली गई। मन उदास हो गया। एक ऐसी लड़की जो न कभी मेरी जिंदगी में आई, न ही गई। हाँ सपनों में आई थी और वहीं ठिठक गई.....।

13 comments:

राजीव जैन Rajeev Jain said...

बडी ही संवेदनशील प्रेम कहानी लिखी आपने।
बॉस इसीलिए तो कहते हैं कि बस और लडकी को तुरंत पकडना चाहिए वर्ना छूट जाती है।
अब मेल पर संपर्क होता है कि नहीं।
उनसे आपकी बातचीत बनी रहे और कुछ आगे बात बढे तो बताइयेगा।

Mithlesh said...

हर जवां धड़कते दिल की दास्तां कह दी आपने। जाईए साहब उन्हें ढ़ूढ़ लाईये। वो भी आपको जरूर याद करती होंगी।

राखी सिन्हा said...

हथेली पर तुम्हारा नाम लिखते है और मिटाते हैं। तुम्हीं से प्यार करते हैं, तुम्हीं से फिर क्युं छुपाते हैं। पहले तुम, पहले तुम के चक्कर में कितने दिल टूटे होंगे। यह हम सब की कहानी है। पता कीजिए वो कैसी हैं, क्योंकि पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त। आपके इस अनकहे प्यार पर कुर्बान हो जाने को मन करता है।

Tarun said...

तुम्हारी कही कहानी हर जवाँ दिल की कहानी है, ईमेल तो है ही आपके पास। दुआ सलाम होती है कि नही क्योंकि जैसा राखी ने कहा पिक्चर अभी बाकि है मेरे दोस्त

Rohit Tripathi said...

Kasam se kya likha hai sir, bahut hi sundar bich bich mein to aisa lag rahah tha jaise koi meri hi kahani suna raha hai :-)

Nitin said...

नहीं, वह सपना नहीं हक़ीकत थी। आप कहते हैं कि आपको प्यार नहीं था। फिर क्या था वह? प्यार बता कर तो नहीं होता है। आप उसे प्यार करते थे और वो भी आपको चाहने लगी थी। आप दोनों की जुबां ख़ामोश थे, लेकिन दिल तो एक दूसरे का हो ही चुका था।

आनंद said...

बधाई हो, आपने प्‍यार कहलाने वाले अद्भुत अनुभव से गुजरें हैं। आपकी प्रेम कहानी में सस्‍पेंस भी है, ट्रेजेडी भी है। अब बताइए कि आज की क्‍या पोजीशन है। जामनगर कोई दूर नहीं है...। किसी भी प्रकार के हौसलाफजाई की ज़रूरत हो, तो हम आपके साथ हैं...।

Neerja said...

किसी को ऐसे छोड़ जाना अच्छी बात नहीं है। प्यार हो गया हो और उसे स्वीकार करने में ज़माना गुजर जाए। यह कहानी हम सब की है। एक ख़ूबसूरत अहसास, जिससे हर व्यक्ति अपने जीवन में एक न एक बार जरूर गुजरता है। वो उनका देखना, और दोनों का शर्म से लाल हो जाना। सिर्फ एक झलक पाने की बेकरारी....उफ्......ये उल्फत।

Vineet Nigam said...

यादें सताती हैं, लेकिन कभी-कभी उन यादों को जीने में मज़ा आता है। और यादें हसीन हों तो फिर क्या कहने। समय को थोड़ा पीछे सरकाएं। कई अच्छी-बुरी यादें धीरे से छू कर निकल जाएंगी।

Sandhya said...

Rajiv Sir, Love should be declared before it's too late. But even if late, still must it be said. True it is that when memories are all that remain, we cling to those with all our strength. The first touch of Love is often the most powerful force we'll ever feel. Beautiful….and the rest as they say is history……! Hopefully u ll get it.
Sandhya Jyoti,
New Hampshire (US)

Manoj Mehta said...

कितनी खट्टी-मीठी यादें उम्र भर हमारे साथ चलती हैं। ठहर कर पीछे मुड़कर देखने की फुरसत ही कहाँ होती है। और जब पीछे देखते हैं तो हज़ारों यादें हमारे पीछे-पीछे दौड़ी चली आ रही होती है। रुकिए....इन यादों को समेट लें।

विरेंद्र गर्ग said...

सब उम्र का दोष है भाई। इस तरह की प्यारी गलतियां हम सभी कर बैठते हैं। आपकी कहानी आम भारतीय युवा की प्रेम बायोग्राफी है। प्यार तो करते लेकिन इजहार करने से डरते हैं।

Shilpi Shrivastava said...

आ तेरी मैं मांग सजाऊं, तू दुल्हन बन जा। कैसे छोड़ दिया आपने उस मासूम को? दिल से कह रही हूं। ढ़ूढ़ लाईये उसे।