Friday, September 25, 2009

तो, अब कोई नहीं मरेगा...!

‘मृत्यु ही सत्य है, जीवन एक पड़ाव मात्र है।‘ ट्युशन से लौटते वक्त पटना के बांस घाट में लिखे ये शब्द मुझे परेशान करते रहे। साईकिल रोक कर रोज-रोज इस लाईन को पढ़ता। सच कहूं तो ज़िंदगी से विरक्ति होने लगी थी। पटना में गंगा किनारे घर से कुछ ही दूर पर शव-दाह गृह है। इसे संयोग कहिए या कुछ और घर से कुछ ही दूर पर पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पीटल भी है। बचपन से हज़ारों लाशों को हॉस्पीटल के पोस्टमार्टम तक आते देखा है। कभी सिर में गोली लगी लाश, कभी ट्रक के नीचे आकर हुआ मृत शरीर, करेंट से मौत, गंगाजी में डूबने से मौत, 2001 में पटना एयर क्रेश में मरे 60 लोगों की लाश हो या फिर जहानाबाद के लक्ष्मणपुर बाथे या बारा जैसे नरसंहार। लाशों को पटना ही लाया जाता है।

पढ़ने-लिखने में ठीक-ठाक ही था। लेकिन इन लाशों को देखकर मन में एक विरक्ति घर कर गई थी। हल्की भाषा में कहूं तो धीरे-धीरे मन में ये बात बैठने लगी थी, “पढ़तंग तो भी मरतंग, न पढ़तंग तो भी मरतंग...तो काहे को पढ़तंग”। जब एक दिन मर ही जाउंगा तो, पढ़ लिख कर क्या होगा। पलायनवादी मानसिकता कह सकते हैं। ख़ैर, ये तो थी मौत की बात....अब जीवन की कहानी।
दरअसल डेली टेलिग्राफ़ में छपी एक ख़बर ने थोड़ा विस्मृत कर दिया है। ख़बर है कि 20 साल बाद मनुष्य अमर हो जाएगा। यह दावा है रे कुर्जविल का। 61 वर्षिय कुर्जविल जाने-माने वेज्ञानिक भविष्यवेत्ता हैं। अपने इस दावे के पक्ष में कुर्जविल ने कई तर्क भी दिए है। उनका मानना है कि जिस रफ़्तार से मानव विज्ञान तरक्की कर रही है, मौत पर 20 वर्षों में काबू कर लिया जाएगा। बात कुछ हद तक सच भी है। कुर्जविल नैनो-तकनीक की बात करते हैं। कहते हैं, कुछ ही वर्षों में वैज्ञानिक हरेक महत्वपूर्ण अंगों का कृत्रिम विकास कर लेंगे। वो चाहे फेंफरा हो, किडनी हो, त्वचा हो, हृदय हो...सबकुछ। रक्त कोशिका के जगह नैनो-ट्बुयल्स आ जाएंगे। दिमाग कंप्युटर से संचालित होगा...और भी बहुत कुछ।

अगर यह दावा सच हो जाए तो क्या होगा। 25 साल के भीतर हम एक साँस में हज़ार मीटर वाली ओलंपिक रेस दौड़ सकेंगे, बिना ऑक्सीजन के चार घंटों तक स्कूबा डायविंग कर सकेंगे। क़िताब के लाखों पन्ने हमारी जुबान पर होगी। मिनटों में हम किताब लिख सकेंगे। गणित का भय हमें नहीं सताएगी....और भी बहुत कुछ ऐसा जो शायद आज हमारी सोच-समझ की सीमाओं से परे है।


हलांकि कुर्जविल का यह दावा सैद्धांतिक है, लेकिन मुझे इसमें दम लगता है। आज से 25-30 वर्ष पहले तक टीवी होना मौत की गारंटी थी। आज यह सर्दी से ज्यादा कुछ भी नहीं है। चुटकी में इलाज़। कृत्रिम हृदय, फेंफरा, किडनी सबकुछ बाज़ार में उपलब्ध है। आज ही एड्स के टीके का सफ़ल परिक्षण हुआ है। कैंसर जैसी बिमारियों का इलाज कुछ सालों में आ जाएगा। पेसमेकर हर्ट को संचालित करने लगा है। यहां तक कि आने वाले समय में सेक्स भी वर्चुअल हो जाएगा। हम साईबार्ग हो जाएंगे....साईबर मैन...। हॉलीवुड की फ़िल्मों में दिखने वाला साईबार्ग हक़ीकत की धरती पर आ जाएगा। इंसान सुपर-मैन होगा, जिसकी ताक़त और समझ की विस्तार असीमित होगी।

अगर कुर्जविल के दावे पर यकीन कर लें तो भी कई ऐसी बातें हैं जो मेरी समझ में अभी से नहीं आ रही है। ये मन जो है उसका क्या होगा, और प्यार...वो कहां से आएगा। भावनाएं होंगी या नहीं, अगर हम मरेंगे नहीं तो हमारी धरती पर रहने के लिए जगह कहां से आएगा। क्या चंद्रमा पर कॉलोनी सचमुच बस जाएगी। क्या तब भी राजीव की मां पटना से रोज़ फोन कर कुशल-क्षेम पूछेंगी, क्या पापा तब भी समझाने आएंगे....और नैतिकता....इस नैतिकता का पैमाना क्या होगा....????? क्या चांद तब भी हमें प्यारा लगेगा? ठंडी हवाएं तब भी हमारे अंदर सिहरन पैदा करेगी...क्या किसी की आंखों में तब भी हम डूबेंगे???? उस व्यवस्था में भगवान का क्या रोल होगा??? कितने ही तो सवाल हैं....लेकिन कोई जवाब नहीं। ऐसे भी भविष्य की गर्भ में झांकना रॉकेट विज्ञान से कम मुश्किल नहीं रहा है। देखते हैं 2030 दूर नहीं है।

©rajivkmishra\25\09\09\del-telegraph-2-3am


A cyborg is a cybernetic organism (i.e., an organism that has both artificial and natural systems). The term was coined in 1960 when Manfred Clynes and Nathan Kline used it in an article about the advantages of self-regulating human-machine systems in outer space.

2 comments:

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

विज्ञान के दृ्ष्टिकोण से देखा जाए तो ऎसी बातों को पढकर अब कुछ खास विस्मय नहीं होता......लेकिन देखा जाए तो प्रकृ्ति के आगे आजतक किसकी चली है। आज के इस वैज्ञानिक युग में भी इन्सान चाहे तो कुछ भी बन सकता है,लेकिन भगवान नहीं बन सकता!!!!

Anonymous said...

ये जीना भी कोई जीना है..दुनिया को बदल डालो..