बिना शब्दों के मेरी बिजली की साइकिल का प्रशंसक
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सवेरे के पौने नौ बजे थे। द्वारिकापुर गंगा-घाट से लौटते समय धूप कुछ
उनींदी-सी थी। जनवरी की सुबहें वैसी ही होती हैं—आधी जागी, आधी सपनीली। बिजली
की साइकिल पर ...
16 hours ago



1 comment:
Guru kamal ka liya....
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