Sunday, September 21, 2008

मिशन लोकसभा 2009 - बात मुद्दों की

देश में चुनावी मौसम आने ही वाला है। नवंबर में छह राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं। और इसके कुछ ही महीनों बाद आम चुनाव होंगे। पार्टियां मुद्दों की तलाश में है, जिसके सहारे वे चुनावी बैतरनी को पार कर सकें। अब सवाल यह कि आख़िर आने वाले चुनावों में कौन-कौन से इश्यूज़ होंगे। विजन 2020, बढ़ती आर्थिक असमानता, समानता के साथ विकास, मौसम में आ रहे बदलाव, साक्षरता, कृषि या तकनीक...हमारी राजनीति अभी इतनी मेच्योर नहीं हुई है। तो बात गठबंधन की....ये कुछ-कुछ महाभारत युद्ध या बुश के वार ऑन टेरर की तर्ज़ पर अभी से शक्ल लेने लगा है। महाभारत में देश का हर एक राजा या तो पांडवों या फिर कौरवों के साथ हो गया था। कुछ इसी तरह वार ऑन टेररिज्म शुरू होने से पहले बुश ने विश्व बिरादरी से कहा था, "आईदर यू आर विद् अस, आर यू आर अगेंस्ट अस"....यानि निरपेक्ष देशों के लिए कोई जगह नहीं..। आगामी आम चुनावों में भी कुछ-कुछ ऐसा ही होने वाला है, अंतर सिर्फ़ इतना की इस चुनावी महासमर में तीन गठबंधन होंगे। यूपीए, एनडीए और थर्ड फ्रंट यानि तीसरा मोर्चा।

तीनों गठबंधन अपने अलग-अलग मुद्दों के साथ जनता से वोट मांगने जाएंगे। जहाँ एनडीए मौजूदा सरकार की विफलताओं को गिनाएगा वहीं यूपीए अपनी बेस्ट रिपोर्ट कार्ड के साथ जनता से रूबरू होगी। देश की जनता सभी पार्टियों के एजेंडे को तीन कसौटियों पर परखेगी, पेट से, दिल से और सबसे अंत में दिमाग से..।

बात पेट की...मंहगाई और रोटी
सबसे पहले बात पेट की यानि रोटी, जिसका सीधा रिश्ता मंहगाई से है। एनडीए और थर्ड फ्रंट का ब्रह्मास्त्र यही मुद्दा होगा। आसमान छूती मंहगाई पर काबू पाने में मौजूदा सरकार बुरी तरह विफल रही है। पहले से डबल डिजिट में दर्ज़ हो रहे इंफ्लेशन पर छठे वेतन आयोगी की सिफारिशों के लागू हो जाने से आने वाले समय में मंहगाई की आग और भड़केगी। शुक्र है अंतराष्ट्रीय बाजारों में घट रहे कच्चे तेलों के दाम का, जिसने सरकार को कुछ राहत दी है, वर्ना मुद्रा स्फीति की दर निश्चित तौर पर 20 के उपर चली गई होती। इस बात से बिल्कुल इंकार नहीं किया जा सकता है कि आम जनता मंहगाई की मार से त्रस्त है। यह अटकल लगाना भी, कि एनडीए अपने बेहतर योजना से मुद्रास्फीति से निपट लेगी बेमानी होगी। कहने का लब्बोलुआब यह कि मंहगाई के मुद्दे पर आम आदमी सरकार से बहुत खुश नहीं है। इस विफलता में एंटी इंकंबेंसी फैक्टर को जोड़ दिया जाए तो सरकार का जाना लगभग तय दिखता है। गौरतलब है कि चार साल के दौरान देश की औसत आर्थिक विकास दर 8.9 फीसदी के स्तर पर दर्ज की गई है जो एनडीए के छह साल के कार्यकाल की आर्थिक विकास दर के औसत से काफी ज्यादा है। लेकिन विकास दर का असमान वितरण और मंहगाई सरकार की इस उपलब्धि को निगल ले रही है।

दिल से...अमरनाथ, राम सेतु...और आतंकवाद
बात आम आदमी के दिल की...। देश का आम आदमी असुरक्षा की भावना में जी रहा है। यूपीए सरकार बार-बार आतंकवाद विरोधी लड़ाई के मोर्चे पर कमज़ोर नज़र आ रहा है। हालिया आतंकी हमलों के चलते देशभर में आतंक विरोधी कदमों को और कठोर करने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है। कांग्रेस व यूपीए के अन्य घटक दल शुरू से ही पोटा जैसे किसी अन्य सख्त कानून के खिलाफ राय देते रहे हैं, वहीं देशभर में लगातार हो रही आतंकी घटनाओं से लोगों मे रोष बढ़ता जा रहा है। गौरतलब है कि एनडीए शासन काल में आतंकी हमलों में 4027 लोग मारे गए थे, जो वर्तमान सरकार के कार्यकाल में घट कर 1900 के करीब आ गया। लेकिन आम चुनाव से कुछ ही महीने पहले हुए जयपुर, बंगलोर, अहमदाबाद, दिल्ली सीरियल ब्लास्ट ने जनता में असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है और इसका असर चुनाव में निश्चित रूप से देखने को मिलेगा। दूसरी बात यह कि कांग्रेस व यूपीए के अन्य घटक दल राजनीतिक मजबूरी के तहत पोटा जैसे किसी अन्य सख्त कानून के ख़िलाफ राय देते रहे हैं। इससे आम आदमी के बीच में ग़लत संदेश जा रहा है। आम आदमी आतंकवाद से लड़ने की मौजूदा सरकार के संकल्प को शक की निग़ाह से देख रहा हैं। ज़ाहिर है कि ऐसी स्थिति का राजनीतिक फ़ायदा उठाने में भाजपा कोई कसर नहीं छोडे़गी। ऐसा नहीं है कि पोटा और टाडा जैसी कानून पुलिस के हाथों में देने में कम रिस्क है। हमारा अनुभव रहा है कि इनका ग़लत इस्तेमाल व्यक्तिगत रंजिश निकालने के लिए किया जाता रहा है। लेकिन आम आदमी को इससे कोई मतलब नहीं है। वो आतंकवाद से निपटने के लिए सरकार द्वारा कड़े कानून की उम्मीद करता है। ये भी सच है कि आतंकवाद से लड़ना और आतंकवाद के ख़िलाफ़ नारे बुलंद करना दो अलग-अलग बात है। एनडीए के शासन काल में ही लाल किला और संसद पर हमले हुए थे। भले ही एनडीए आतंकवाद से लड़ने में मौजूदा सरकार जैसी ही साबित हुई थी, लेकिन तत्कालीन सरकार नें आतंकवाद के ख़िलाफ ख़ूब नारे बुलंद किए थे। निश्चित रूप से आम चुनाव में आतंकवाद सबसे मुखर मुद्दा होगा। हाल में मीडिया नें दिल्ली ब्लास्ट के दिन गृह मंत्री के बार-बार कपड़े बदलने पर उनका काफ़ी मज़ाक उड़ाया था। शिवराज का कहना था कि साफ-सुथरा रहना कोई ग़लत बात नहीं है। गृह मंत्री को सोचना चाहिए कि अगर वे लगातार हो रहे आतंकी घटनाओं को रोकने में सफ़ल होते तो शायद ही कोई उनके कपड़े पर सवाल उठाता।

आतंकवाद से इतर अमरनाथ श्राइन बोर्ड, अफ़जल गुरु और राम सेतु विवाद भी आगामी चुनावों के मुद्दे होंगे। यहाँ भी यूपीए डिफेंसिव ही रहेगी। विवादित रामसेतु के मुद्दे को एनडीए धार्मिक आस्था का मामला बताएगी और राम सेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने की बात भी होगी। साथ ही अमरनाथ मंदिर बोर्ड और अमरनाथ यात्रा के मार्ग के राष्ट्रीयकरण करने की बात भी भाजपा के एजेंडे में होगा।

जनता सोचती क्या है..बात दिमाग की
यहाँ यूपीए के लिए कुछ राहत हो सकती है। भारत-अमेरिका परमाणु करार ही सरकार के लिए एक करार की बात होगी। भले ही परमाणु समझौता कांग्रेस के लिए चुनावी मुद्दा हो लेकिन विपक्षी पार्टी भाजपा इसे शायद चुनावी मुद्दा न बनाए। परमाणु समझौता और इसके व्यापार के लिए 45 सदस्यीय एनएसजी से छूट हासिल करना सचमुच भारतीय कूटनीति के लिए मील का पत्थर है। इस समझौते नें एक सशक्त नेता के रूप में मनमोहन सिंह को भी स्थापित कर दिया। लेकिन, यह समझौता आम आदमी की चिंताओं से कोसों दूर है और एनडीए भी इस बात को समझती है। इसलिए वह आम चुनावों में मतदाताओं को लुभाने के लिए आतंकवाद और महंगाई पर काबू पाने में यूपीए सरकार की विफलता पर ध्यान केंद्रित करने पर ही ज्यादा जोर देगी। बात सही भी है.....आगरा या पटना में मतदाता परमाणु करार के बारे में चिंता नहीं कर रहा है। वह जरूरी वस्तुओं और खाद्यों के दामों में बेतहाशा बढ़ोतरी की चिंता करता है। यूपीए को कांउटर करने के लिए एनडीए (भाजपा) प्रधानमंत्री पर देश को गुमराह करने का आरोप लगाएगी, साथ ही वह परीक्षण का अधिकार छिनने जैसी बातों को भी जनता के सामने रखेगी।

मनमोहन, सोनिया, आडवाणी या मायावती...
अब यह लगभग स्पष्ट हो गया कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही यूपीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। वहीं एनडीए खेमे से आडवाणी पीएम इन वेटिंग हैं। तीसरा मोर्चा मायावती का नाम बुलंद कर रहा है। इन तीनों नेताओं की छवि भी अगले चुनाव के मुद्दे होंगे। मनमोहन सिंह की कमजोर प्रधानमंत्री वाली छवि भारत-अमेरिका परमाणु करार के बाद थोड़ी मजबूत हुई है। संसद में विश्वास मत हासिल करने के बाद मनमोहन सिंह एक परिपक्व राजनेता के तौर पर उभरे हैं। उन पर करप्शन का भी कोई आरोप नहीं है। आडवाणी कट्टर नेता के रूप में देखे जाते थे, लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना को ‘सेक्यूलर’ बता कर उन्होंने अपनी छवि को सेक्यूलर बनाने की कोशिश की है। आडवाणी पर भी भ्रष्टाचार का कोई मामला नहीं है। बची बहन मायावती....करीब 25 सालों से राजनीति में सक्रिय मायावती ने आम लोगों के बीच दलित महिला की छवि को प्रतिष्ठित किया है। मायावती चाहती हैं कि दलित की बेटी की अपनी पहचान को हिन्दुस्तान की बेटी में तब्दील कर सकें। इसी ख्वाहिश ने उन्हें बहुजन से उपर उठकर सर्वजन की बात करने के लिए मजबूर कर दिया है। अपनी प्रशासनिक कुशलता के बावजूद मायावती की छवि बहुत साफ-सुथरी नहीं है। उन पर भ्रष्टाचार के कई मामले चल रहे हैं। एक सवाल यह भी है कि भाजपा के लिए मनमोहन और सोनिया में से कौन ज्यादा मजबूत उम्मीदवार है।

कहीं एक रिपोर्ट पढ़ रहा था। शायद 24 अकबर रोड और 11 अशोका रोड में बैठे हुए राजनेताओं की नज़र भी इस पर जरूर गई होगी। रिपोर्ट बताती है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों चिंतित है, उन्हें यह डर सता रहा है कि कहीं अगली सरकार दोनों में से किसी की न हो तो क्या होगा। एक संभावना यह भी बनती है कि अगले आम चुनाव में छोटी-छोटी क्षेत्रीय पार्टियां छा जाएं। और कांग्रेस भी उन्ही छोटी पार्टियों में से एक हो....!

2 comments:

Sanjay Singh said...

सटीक विश्लेषण, मंहगाई, आतंकवाद ही चुनावी मुद्दे होंगे। मायावती डार्क हार्स साबित हो सकती हैं। और लिखें, पार्टियां क्या तैयारी कर रही हैं, कौन होगा प्रधानमंत्री?

Udan Tashtari said...

बढ़िया विश्लेषण!!