Monday, September 22, 2008

सर, आप बहुत याद आएंगे.....

आज प्रोफ़ेसर शुक्ला की बहुत याद आ रही है। याद आते ही उनपर बेइंतहा प्यार आने लगता है। हलांकि, कॉलेज के दिनों में मैंने भी दूसरे लड़कों की तरह दीवारों के पीछे छुपकर उन पर आवाज़ें लगाई है, लेकिन शुक्ला जी ने कभी लड़कों के फिकरों पर मुड़कर नहीं देखा। गर्दन झुकाए आते थे और गर्दन झुकाए जाते थे। मैं कभी उनके घर नहीं गया, मुझे यह भी नहीं मालूम कि उनकी ज़िंदगी में कैसी-कैसी नाकामियाँ और हसरतें थीं। शायद ख़्वाहिशों का गला वे बहुत पहले ही घोंट चुके होंगे, और ट्यूशन सिर्फ़ इसलिए पढ़ाते होंगे कि उनकी छोटी सी तनख़्वाह उनके लिए नाकाफ़ी होगी और बच्चे अच्छी शिक्षा से महरूम रहते होंगे। प्रोफ़ेसर शुक्ला पिताजी के जानने वालों में थे। पिताजी बताते थे कि शुक्ला जी की पाँच बेटियाँ हैं, और पत्नी कनजेनाईटल हर्ट डिज़ीज से पीड़ित हैं। बेटियों को उन्होंने बड़े संस्कारों और लाड़ में पाला था। सभी बच्चीयाँ पढ़ने में अव्वल, यहाँ तक की पाँच में से तीन आईआईटी पहुंच गई थीं। शायद इसी से प्रभावित होकर पिताजी नें मुझे उनसे ट्यूशन पढ़ने भेजा होगा। लेकिन आर्गेनिक केमेस्ट्री मेरे बूते से बाहर की बात थी। विज्ञान का छात्र था लेकिन राजनीति शास्त्र पढ़ना ज्यादा अच्छा लगता था। होमवर्क कभी नहीं करता, नतीजतन शुक्ला जा रोज़ पिताजी की नाम की दुहाई देकर समझाते, "मिसिर (मिश्रा) जी के लड़के हो, तुम्हारे पापा का पूरे यूनिवर्सिटी में कितना सम्मान है। क्या तुम उनके नाम को हंसवाना चाहते हो।" "ब्राह्मण घर से हो, नहीं पढ़ोगे तो ज़िंदगी कैसे चलाओगै।" सच कहूं तो उस वक्त उनकी बातें काटती थीं। क्या बकवास कर रहे हैं...! शुक्ला सर को गुस्से में कभी किसी नें नहीं देखा होगा। आर्थिक हालात ठीक नहीं थी, फिर भी बादाम वाले को रोककर सभी छात्रों को खिलाते थे। मैं वहाँ 6 महीने ही टिक पाया। उसके बाद जब कभी भी कहीं मिल जाते, बड़ी प्यार से समझाते। पिताजी ने भी कई बार कहा, कि "पढ़ने क्यों नहीं जाते, शुक्ला जी तुम्हें ख़ोज रहे थे।" मैं कोई न कोई बहाना कर बात को टाल देता था। परीक्षा में अच्छे अंक आए और शुक्ला सर के विषय में तो 50 में से 46 अंक आए थे। शायद कॉलेज में सबसे ज्यादा...! आशिर्वाद लेने गया तो उन्होने गले लगा लिया था। बाद में विज्ञान छोड़ आर्ट्स का छात्र हो गया। तब भी कहीं मिलते तो बड़ी रूचि लेकर आर्थिक-सामाजिक हालत पर बात करते। पिछले नवंबर में घर गया था। शुक्ला सर दवा की दुकान से निकल रहे थे। चेहरे का रंग गायब हो चुका था। कई वर्षों के बाद मिला, लेकिन देखते ही पहचान गए। मैंने पांव छुआ तो फिर से गले लगा लिया। उनके हाथ कांप रहे थे। बहुत पूछने पर भी उन्होंने अपनी तबीयत के बारे में कुछ ख़ास नहीं बताया। उलटे मुझ से सवाल पूछते जा रहे थे। मैंने बताया कि आईआईएमसी से पास आउट होने के बाद आज तक चैनल में काम कर रहा हूं। इतने खुश हुए कि मेरी आँखें नम हो आई। शायद मैं समझदार हो गया था। शुक्ला जी ने इस बार मिठाई खाने का आग्रह नहीं किया। क्यों, उस वक्त नहीं समझ पाया। उन्होंने बताया कि वे अब विश्वविद्यालय से रिटायर हो गए हैं। पेंसन की फ़ाईल सरकारी तंत्र में उलझा पड़ा है। "जरा पापा से कहना, कि वो कुछ करें।" नौकरी में जब भी पैसे की जरूरत हुई, उन्होंने बहुत मदद की है। अब रिटायर हो गया हूं, कुछ दिन और निभा दें।" मैं समझ गया था कि सर का पॉकेट खाली है। नहीं तो इतना स्वाभिमानी व्यक्ति कम से कम मुझे तो इस बात के लिए नहीं कहता। घर पहुंचने पर पिताजी से बात हुई। उन्होंने बताया कि सर कैंसर से पीड़ित हैं। तीन बेटियों की शादी हो गई है। दो अभी बाकी हैं, पहले ही वे अपनी ग्रेच्युटी और पीएफ के सारे पैसे निकाल चुके हैं। पेंशन का मामला हाई कोर्ट में फँसा है, उसके क्लियरेंस के बिना वे भी कुछ नहीं कर पाएंगे। साथ ही पिताजी ने आश्वासन दिया कि दो-तीन लाख रुपए शुक्ला जी का विश्वविद्यालय पर निकलेगा, वे जल्द ही फ़ाईलों पर दस्तख़त कर देंगे। बाद में मैं दिल्ली आ गया....और शुक्ला सर की यादें धीरे-धीरे धुंधली होने लगी थीं।

आज सुबह घर (पटना) फ़ोन किया तो माँ ने बताया कि पिताजी सर के अंतिम संस्कार में गए हैं। मन गीला सा हो गया। उनकी सारी यादें एक-एक कर आँखों के सामने आ गईं। भावुक हूं, पर रोया नहीं....क्यों पता नहीं। आज अगर सर मिल जाएं तो मैं उनके पैर छूकर गुस्ताख़ियों की माफ़ी माँगूं, उन्हें इल्म भी न होगा, और उनकी ट्यूशन के लिए तमाम उम्र उनसे डांट खाता रहूँ और उफ़ भी न करूं। सर आपको भावभीनी श्रद्धांजलि....।

8 comments:

उन्मुक्त said...

हम सब के जीवन में कोई न कोई शुक्ला सर हैं।

Udan Tashtari said...

सही कह रहे हैँ उन्मुक्त जी..हमारी ओर से भी श्रृद्धांजलि.

Ashok said...

बहुत अच्छी श्रद्धांजली....मेरा भी श्रद्धा सुमन.

Pragyan said...

आप जैसा शिष्य की चाहत हर प्रोफेसर शुक्ला को होगी

विवेक गुप्ता said...

गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागूँ पाय। बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय। गुरु-शिष्य का संबंध तर्क के बजाय आस्था, श्रद्धा और भक्ति पर केंद्रित होता है। शुक्ला सर को श्रद्धांजली..।

सुप्रतिम बनर्जी said...

पोस्ट पढ़ कर भावुक हो गया। मेरे भी एक तिवारी सर थे। मैथ्स पढ़ाया करते थे। मैं समझता हूं हम जो कुछ भी हैं। ऐसे सरों की बदौलत ही हैं।

सुप्रतिम बनर्जी said...

मेरे भी एक तिवारी सर थे। मैथ्स पढ़ाया करते थे। बहुत ज्ञानी थे। लेकिन मैं मैथ्स आज तक नहीं समझ पाया। बहरहाल... आज हम जो भी हैं ऐसे ही शुक्ला और तिवारी सरों की वजह से ही हैं।

machine said...

चलिए शुक्र है आपने अपने सर को याद ते किया नहीं तो आज की इस आपाधापी में किस के पास इतना समय है कि पीछे मुड कर उन शिक्षकों को याद करे जिनकी वजह से वो आज कुछ बन पाए हैं.. इस मुकाम पर पहुंचे हैं.. हम में से कितने हैं जो अपने स्कूल या कॉलेज जा कर अपने शिक्षकों को अपने करियर के बारे में बताते है... अच्छा लगा जनकर कि आज के इस दौर में भी आप पीछे मुडकर देखते हैं....